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मोहन भागवत का बड़ा बयान, यूजीसी के नए नियमों पर कहा- यह कानून नहीं बनेगाराजस्थान
15 सित॰ 2026, 8:39 pm (9 दिन पहले)· 0

मोहन भागवत का बड़ा बयान, यूजीसी के नए नियमों पर कहा- यह कानून नहीं बनेगा

मोहन भागवत ने भीलवाड़ा में जैन संत आचार्य पुलकसागर महाराज से मुलाकात के दौरान कहा कि यूजीसी के प्रस्तावित नियम अभी कानून नहीं बने हैं और न ही बनेंगे। देश भर में इन नियमों को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच उनका यह बयान सामने आया है।

भीलवाड़ा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रस्तावित नियमों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि ये नियम केवल एक प्रस्ताव के रूप में हैं और इनका कानून बनना तय नहीं है। राजस्थान समेत पूरे देश में इन प्रस्तावित संशोधनों को लेकर काफी हलचल और विरोध देखने को मिल रहा है।

भीलवाड़ा में जैन संत से मुलाकात

सोमवार को राजस्थान के भीलवाड़ा शहर में मोहन भागवत ने जैन संत आचार्य पुलकसागर महाराज से शिष्टाचार भेंट की। दोनों के बीच यह बैठक लगभग 40 मिनट तक चली, जिसमें उच्च शिक्षण संस्थानों से जुड़े इन नए प्रावधानों के अलावा देश की सामाजिक समरसता और जाति व्यवस्था जैसे गंभीर विषयों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।

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कानून न बनने का दिया आश्वासन

इस मुलाकात के दौरान आचार्य पुलकसागर महाराज ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के इन प्रस्तावित नियमों का विशेष रूप से मुद्दा उठाया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मोहन भागवत ने उन्हें आश्वस्त किया कि वर्तमान स्थिति में यह केवल एक प्रस्ताव भर है जिसे अभी तक पारित नहीं किया गया है। उन्होंने दो टूक कहा कि न तो यह कानून का रूप ले चुका है और न ही भविष्य में ऐसा होगा।

क्या हैं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रस्तावित नियम

गौरतलब है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में किसी भी प्रकार के भेदभाव पर रोक लगाने के उद्देश्य से नए प्रावधान तैयार किए थे। इन बदलावों का मुख्य लक्ष्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के परिसरों में जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान या अन्य किसी भी आधार पर होने वाले पक्षपात को पूरी तरह समाप्त करना है। इसके साथ ही इसका उद्देश्य छात्रों की शिकायतों के निवारण तंत्र को अधिक मजबूत बनाना भी था।

क्यों मचा हुआ है देश भर में बवाल

इन नियमों के सामने आते ही देश भर के शिक्षण जगत और विभिन्न संगठनों के बीच तीखा विवाद खड़ा हो गया। कई संगठनों का यह गंभीर आरोप रहा है कि सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के हितों की रक्षा और उनकी शिकायतों के निस्तारण को लेकर प्रावधानों में स्पष्टता का अभाव है। आलोचकों को इस बात का भी अंदेशा सता रहा है कि इन नियमों की आड़ में शिक्षण संस्थानों में झूठी या निराधार शिकायतें दर्ज कराने का सिलसिला शुरू हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

इन नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा और शिकायतों की पूरी प्रक्रिया को लेकर कई तरह के सवाल खड़े किए गए। यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा, जहाँ अदालत ने शुरुआती सुनवाई में इन नियमों के कई हिस्सों को अस्पष्ट करार दिया और इनके कार्यान्वयन पर फिलहाल रोक लगा दी। इस अदालती हस्तक्षेप के बाद केंद्र सरकार ने भी इन प्रावधानों पर फिर से विचार करने की बात कही है।

सवाल-जवाब

मोहन भागवत ने यूजीसी नियमों पर क्या बयान दिया?
उन्होंने कहा कि यूजीसी के प्रस्तावित नियम अभी केवल एक प्रस्ताव हैं और न तो यह कानून बने हैं और न ही कभी बनेंगे।
मोहन भागवत की यह मुलाकात कहाँ हुई थी?
यह मुलाकात राजस्थान के भीलवाड़ा शहर में जैन संत आचार्य पुलकसागर महाराज के साथ हुई थी।
यह मुलाकात कितने समय तक चली?
मोहन भागवत और आचार्य पुलकसागर महाराज के बीच यह मुलाकात करीब 40 मिनट तक चली थी।
यूजीसी के नए नियमों का मुख्य उद्देश्य क्या था?
इन नियमों का मकसद उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना था।
इन नियमों को लेकर क्या विवाद था?
सामान्य वर्ग के छात्रों की सुरक्षा को लेकर स्पष्टता न होने और झूठी शिकायतें दर्ज होने के डर से इन नियमों पर विवाद खड़ा हो गया था।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कदम उठाया?
सुप्रीम कोर्ट ने नियमों के कुछ हिस्सों को अस्पष्ट मानते हुए इनके फिलहाल लागू होने पर रोक लगा दी थी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Laxmi Gupta@laxmi-gupta·9 दिन पहले

अंक ज्योतिषीय और सामाजिक संतुलन के दृष्टिकोण से, जब भी किसी बड़े नीतिगत बदलाव में पारदर्शिता का अभाव होता है, तो वह अंक 7 और 8 के नकारात्मक प्रभावों यानी भ्रम और कानूनी गतिरोध को जन्म देता है। यूजीसी के इन नियमों पर उपजा यह तीव्र विवाद और न्यायपालिका का हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि नीति निर्माण में सामूहिक सहमति और स्पष्टता का होना कितना अनिवार्य है। भविष्य में इस प्रकार के सुधारों को लागू करने से पहले सामाजिक ताने-बाने और सभी वर्गों के हितों का संतुलन साधना होगा, अन्यथा यह प्रशासनिक और वैचारिक संघर्ष को और अधिक बढ़ाएगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·9 दिन पहले

यह घटनाक्रम नीति निर्माण और राजनीतिक संतुलन के बीच के संवेदनशील तालमेल को उजागर करता है। जब उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने के प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन हों और वैचारिक संगठनों द्वारा आपत्ति जताई जा रही हो, तब कार्यपालिका और विधायिका के स्तर पर इस पर पुनर्विचार होना तय है। आगामी दिनों में सरकार इन नियमों को अधिक स्पष्ट और व्यापक सर्वसम्मति के साथ दोबारा पेश कर सकती है ताकि न्यायिक और सामाजिक दोनों स्तरों की चिंताओं का समाधान हो सके।

Ravikash Gupta@ravikash·9 दिन पहले

यह घटनाक्रम नीतिगत अनिश्चितता और विनियामक जोखिमों को स्पष्ट करता है, जो उच्च शिक्षा के बुनियादी ढांचे के साथ-साथ कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व और संस्थानों के वित्तीय प्रबंधन पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है। जब नियामक ढांचे में इस तरह का वैधानिक गतिरोध पैदा होता है, तो निवेशकों और संस्थानों दोनों के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक योजना बनाना और अनुपालन जोखिमों का आकलन करना अत्यधिक जटिल हो जाता है। आगामी समय में इन दिशानिर्देशों का पुनरीक्षण यह तय करेगा कि प्रशासनिक स्थिरता और सामाजिक समानता के बीच किस प्रकार का संतुलन स्थापित किया जाता है।

Rohan Verma@rohan-verma·9 दिन पहले

यूजीसी के इन प्रस्तावित नियमों पर उपजा यह विवाद केवल शिक्षा परिसरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उच्च शिक्षण संस्थानों में सामाजिक संतुलन और न्याय की बहस को नया मोड़ दे रहा है। सुप्रीम कोर्ट की रोक और सरकार के पुनर्विचार के संकेत के बीच, मोहन भागवत का यह स्पष्ट आश्वासन राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बढ़ते तनाव को थामने की एक रणनीतिक कोशिश है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या सरकार इन प्रावधानों में ऐसा संशोधन कर पाती है जिससे बिना किसी वर्ग को आहत किए परिसरों में भेदभाव को प्रभावी ढंग से रोका जा सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·9 दिन पहले

कानूनी और प्रशासनिक मोर्चे पर, सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक और केंद्र सरकार के पुनर्विचार के संकेत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मसौदे की कानूनी भाषा और परिभाषाओं में गंभीर खामियां थीं। जब तक भेदभाव की परिभाषा और शिकायत निवारण तंत्र को पूरी तरह पारदर्शी नहीं बनाया जाता, तब तक अदालती और सामाजिक दोनों स्तरों पर टकराव टलना मुश्किल है। अब यह देखना होगा कि विधायी प्रक्रिया में इन विसंगतियों को कैसे दूर किया जाता है।

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