मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कानूनी मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक वकील ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े शीर्ष अदालत के फैसलों की कथित अवहेलना को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आपराधिक अवमानना का मुकदमा चलाने की आधिकारिक अनुमति मांगी है।
अवमानना याचिका के मुख्य आधार
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने 24 सितंबर को भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को एक पत्र भेजा। इस पत्र में उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने निर्वाचन आयोग के कामकाज और दिशा-निर्देशों से संबंधित शीर्ष अदालत के फैसलों की जानबूझकर अवहेलना की है। नियमानुसार किसी भी संवैधानिक संस्था के प्रमुख या उच्च पदस्थ अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक अवमानना याचिका दायर करने से पहले अटॉर्नी जनरल की औपचारिक सहमति लेना जरूरी होता है।
प्रशासनिक अधिकार और एसआईआर से जुड़ा विवाद
यह कानूनी कदम ऐसे समय उठाया गया है जब निर्वाचन आयोग के कई फैसलों को लेकर लगातार सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इस विवाद में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों यानी ईआरओ की शक्तियों में कथित बदलाव का मामला प्रमुखता से उठा था। गोवा से सात दिनों में आठ ईमेल भेजे जाने और उस पर आयोग की तरफ से कोई जवाब न मिलने का मामला भी चर्चा में रहा है। इन प्रशासनिक कार्यप्रणालियों को लेकर कई हलकों में आयोग की भूमिका पर उंगलियां उठाई गई थीं।
विपक्ष का रुख और पूर्व कानूनी नजीरें
मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकारों की सीमा को लेकर कानूनी विशेषज्ञों द्वारा टीएन शेषन बनाम भारत सरकार के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया जाता रहा है। उस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त के पास कोई असीमित विशेषाधिकार नहीं हैं और आयोग के सभी आयुक्तों की स्थिति समान होती है। इससे पहले भी ज्ञानेश कुमार को लेकर संसद के उच्च सदन में तीखा विरोध देखा गया था, जब राज्यसभा के 73 विपक्षी सांसदों ने उन्हें पद से हटाने का नोटिस दिया था। इसके अलावा माकपा जैसे विपक्षी दलों ने भी उनके पद पर बने रहने की वैधता पर सार्वजनिक रूप से सवाल खड़े किए थे।























