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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की मांग, अटॉर्नी जनरल से मांगी गई मंजूरीभारत
24 सित॰ 2026, 12:50 pm (4 घंटे पहले)· 0

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की मांग, अटॉर्नी जनरल से मांगी गई मंजूरी

वकील ब्रजेश सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की सहमति मांगी है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कानूनी मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक वकील ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े शीर्ष अदालत के फैसलों की कथित अवहेलना को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आपराधिक अवमानना का मुकदमा चलाने की आधिकारिक अनुमति मांगी है।

अवमानना याचिका के मुख्य आधार

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने 24 सितंबर को भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को एक पत्र भेजा। इस पत्र में उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने निर्वाचन आयोग के कामकाज और दिशा-निर्देशों से संबंधित शीर्ष अदालत के फैसलों की जानबूझकर अवहेलना की है। नियमानुसार किसी भी संवैधानिक संस्था के प्रमुख या उच्च पदस्थ अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक अवमानना याचिका दायर करने से पहले अटॉर्नी जनरल की औपचारिक सहमति लेना जरूरी होता है।

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प्रशासनिक अधिकार और एसआईआर से जुड़ा विवाद

यह कानूनी कदम ऐसे समय उठाया गया है जब निर्वाचन आयोग के कई फैसलों को लेकर लगातार सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इस विवाद में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों यानी ईआरओ की शक्तियों में कथित बदलाव का मामला प्रमुखता से उठा था। गोवा से सात दिनों में आठ ईमेल भेजे जाने और उस पर आयोग की तरफ से कोई जवाब न मिलने का मामला भी चर्चा में रहा है। इन प्रशासनिक कार्यप्रणालियों को लेकर कई हलकों में आयोग की भूमिका पर उंगलियां उठाई गई थीं।

विपक्ष का रुख और पूर्व कानूनी नजीरें

मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकारों की सीमा को लेकर कानूनी विशेषज्ञों द्वारा टीएन शेषन बनाम भारत सरकार के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया जाता रहा है। उस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त के पास कोई असीमित विशेषाधिकार नहीं हैं और आयोग के सभी आयुक्तों की स्थिति समान होती है। इससे पहले भी ज्ञानेश कुमार को लेकर संसद के उच्च सदन में तीखा विरोध देखा गया था, जब राज्यसभा के 73 विपक्षी सांसदों ने उन्हें पद से हटाने का नोटिस दिया था। इसके अलावा माकपा जैसे विपक्षी दलों ने भी उनके पद पर बने रहने की वैधता पर सार्वजनिक रूप से सवाल खड़े किए थे।

सवाल-जवाब

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अवमानना की अनुमति किसने मांगी है?
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने 24 सितंबर को अटॉर्नी जनरल से यह अनुमति मांगी है।
अटॉर्नी जनरल की मंजूरी क्यों जरूरी होती है?
आपराधिक अवमानना कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट में किसी व्यक्ति पर सीधे अवमानना का केस चलाने से पहले अटॉर्नी जनरल की वैधानिक सहमति आवश्यक होती है।
ज्ञानेश कुमार पर मुख्य रूप से क्या आरोप लगाया गया है?
उन पर चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और फैसलों की जानबूझकर अवहेलना करने का आरोप है।
इस विवाद में टीएन शेषन फैसले का क्या संदर्भ है?
उस ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त के पास कोई अतिरिक्त विशेषाधिकार नहीं हैं और वे अन्य आयुक्तों के समान ही हैं।
क्या पहले भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कोई राजनीतिक कदम उठाया गया था?
हां, पूर्व में राज्यसभा के 73 विपक्षी सांसदों ने उन्हें पद से हटाने के लिए नोटिस पेश किया था।
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टिप्पणियाँ 5

Dr. Aditya Sharma@aditya-sharma·3 घंटे पहले

अदालत के आदेशों की अनदेखी का आरोप हर बार सच हो, यह ज़रूरी नहीं। कई बार प्रशासनिक फैसले और कानूनी व्याख्या में फर्क होता है, जिसे सीधे अवमानना मान लेना थोड़ा जल्दबाजी लगता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·3 घंटे पहले

अटॉर्नी जनरल इस मामले में आगे बढ़ने की मंजूरी देंगे या नहीं, यह देखना दिलचस्प होगा?

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·3 घंटे पहले

अर्जुन, बिल्कुल सही कहा आपने! अब अटॉर्नी जनरल का रुख ही तय करेगा कि आगे क्या होगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·3 घंटे पहले

अटॉर्नी जनरल की हरी झंडी मिली तो मामला कोर्ट तक पहुँचेगा। चुनाव आयोग पर पहले ही उंगलियाँ उठ रही थीं, अब यह कानूनी पेंच और भारी पड़ेगा।

Ravikash Gupta@ravikash·3 घंटे पहले

करण, सही कहा आपने। कॉरपोरेट गवर्नेंस की तरह ही संवैधानिक संस्थाओं में भी जवाबदेही तय होनी ही चाहिए, तभी निवेशकों और जनता का भरोसा बना रहता है।

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