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नैनीताल का ऐतिहासिक नन्दा देवी मेला: 124 साल में लोहे के बर्तनों से जर्मन हैंगर तक ऐसे बदला स्वरूपउत्तराखंड
17 सित॰ 2026, 3:21 pm (5 दिन पहले)· 1

नैनीताल का ऐतिहासिक नन्दा देवी मेला: 124 साल में लोहे के बर्तनों से जर्मन हैंगर तक ऐसे बदला स्वरूप

नैनीताल का प्रसिद्ध श्री नन्दा देवी महोत्सव अपने 124 वर्षों के इतिहास में कई बड़े बदलावों का गवाह रहा है। पारंपरिक रूप से केले के पेड़ से बनने वाली मूर्तियों की आस्था के साथ-साथ अब मेले का बाजार भी टीन के खोखों से बदलकर आधुनिक जर्मन हैंगर के रूप में सजने लगा है।

उत्तराखंड के प्रसिद्ध पर्वतीय पर्यटन स्थल नैनीताल में आयोजित होने वाला ऐतिहासिक श्री नन्दा देवी महोत्सव अपनी शानदार विरासत के 124 साल पूरे कर चुका है। यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह इस पहाड़ी क्षेत्र के बदलते सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने का एक जीवंत दस्तावेज भी है। दशकों के इस लंबे सफर में मेले की सूरत काफी हद तक बदल चुकी है। जहां कभी स्थानीय जरूरत की चीजें बिकती थीं, वहां अब आधुनिक ब्रांड और मनोरंजन के साधन दिखाई देते हैं। हालांकि, इन बदलावों के बीच मां नन्दा-सुनन्दा के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था आज भी वैसी ही बनी हुई है।

मूर्तियों के निर्माण की पारंपरिक यात्रा

श्री राम सेवक सभा के वरिष्ठ पदाधिकारियों के अनुसार, इस ऐतिहासिक उत्सव के शुरुआती दिनों में मां नन्दा-सुनन्दा की मूर्तियों को बनाने के लिए चांदी का उपयोग किया जाता था। समय बीतने के साथ, इस परंपरा में प्रकृति का समावेश हुआ और केले के पेड़ों तथा अन्य प्राकृतिक सामग्रियों से मूर्तियां बनाने की प्रथा शुरू हुई। आज भी इसी पारंपरिक पद्धति का कड़ाई से पालन किया जाता है। मूर्ति निर्माण के लिए केले के पेड़ों को लाने से लेकर उनके विसर्जन तक की प्रक्रिया बेहद पवित्र मानी जाती है और इसमें सभी पारंपरिक नियमों का पालन किया जाता है।

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तिरपाल की झोपड़ियों से लेकर आधुनिक बाजारों तक

इस मेले का इतिहास केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि पुराने समय में यह इस पूरे क्षेत्र का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। श्री राम सेवक सभा के मुकेश जोशी (मंटू), जो पिछले चार से पांच दशकों से इस मेले को बहुत करीब से देख रहे हैं, बताते हैं कि उनके बचपन के दिनों में मेले का नजारा आज से बिल्कुल अलग था। उस समय दुकानें बहुत सीमित होती थीं और उन्हें बांस, पॉलीथिन तथा तिरपाल की मदद से तैयार किया जाता था। इसके बाद के वर्षों में लोहे के टीन की चद्दरों से बनी दुकानों का दौर आया, जो कई दशकों तक मेले की मुख्य पहचान बनी रहीं।

घरेलू सामान की खरीदारी का सबसे बड़ा जरिया

मुकेश जोशी याद करते हैं कि पुराने समय में लोग इस मेले का इंतजार सालभर करते थे, क्योंकि यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं था बल्कि घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने का एकमात्र जरिया था। उस दौर में मेले में लोहे की कड़ाही, टब, विभिन्न प्रकार के बर्तन, खेती-किसानी के औजार और घरेलू उपयोग की अन्य वस्तुएं सबसे ज्यादा बिकती थीं। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के लिए यह आवश्यक सामान खरीदने का सबसे बड़ा अवसर होता था। बच्चों के लिए गुब्बारे और लकड़ी व मिट्टी के साधारण खिलौने ही सबसे बड़ा आकर्षण हुआ करते थे। लेकिन आज इस बाजार में कपड़ों, आधुनिक सजावटी सामानों, प्लास्टिक के खिलौनों और विविध व्यंजनों की भरमार है।

जर्मन हैंगर और कैनोपी से मिला नया लुक

मेले की व्यवस्था और उसके स्वरूप में आया सबसे बड़ा बदलाव हाल के वर्षों में देखा गया है। मुकेश जोशी के अनुसार, लंबे समय तक चलने वाली टीन की दुकानों की जगह अब आधुनिक कैनोपी और जर्मन हैंगर ने ले ली है। इस बदलाव का श्रेय तत्कालीन जिलाधिकारी वंदना सिंह को जाता है, जिनके प्रयासों से मेले के आयोजन को एक नया और बेहद व्यवस्थित ढांचा मिला। जर्मन हैंगर लगने से न केवल दुकानदारों को पहाड़ों में होने वाली अचानक बारिश से सुरक्षा मिली है, बल्कि मेले का पूरा लेआउट भी बेहद आकर्षक और अंतरराष्ट्रीय स्तर का दिखने लगा है। अब देश के कोने-कोने से बड़े कारोबारी अपनी दुकानों के साथ यहां पहुंचते हैं।

निबंधों में बसती थी मेले की यादें

अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए मुकेश जोशी बताते हैं कि स्कूल के दिनों में बच्चों को नन्दा देवी महोत्सव पर निबंध लिखने के लिए कहा जाता था। इस गृहकार्य के माध्यम से बच्चे मेले के हर पहलू से गहराई से जुड़ते थे। उन्हें निबंध में यह लिखना होता था कि केले के पेड़ कैसे लाए जाते हैं, मूर्तियों का निर्माण कैसे होता है और मेले का सामाजिक महत्व क्या है। इस शैक्षणिक गतिविधि के कारण नई पीढ़ी अपनी समृद्ध संस्कृति और लोक परंपराओं के प्रति जागरूक और उत्सुक बनी रहती थी।

बदलते वक्त के साथ बदलती पसंद

श्री राम सेवक सभा के एक अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी डॉ. ललित तिवारी बताते हैं कि पिछले 124 वर्षों में मेले के व्यावसायिक स्वरूप में भारी बदलाव आया है। वे एक बेहद दिलचस्प उदाहरण साझा करते हुए बताते हैं कि लगभग 15 साल पहले मेले में लोहे के परात की भारी मांग हुआ करती थी। लोग दूर-दूर से विशेष रूप से लोहे के परात खरीदने यहां आते थे। यह दिखाता है कि किस तरह समय के साथ लोगों की प्राथमिकताएं और बाजार की मांग बदलती रही है। आज भले ही लोहे के बर्तनों की जगह आधुनिक घरेलू उपकरणों और फैशनेबल उत्पादों ने ले ली हो, लेकिन नन्दा देवी मेले का यह भव्य बाजार, रोमांचक झूले और स्वादिष्ट व्यंजनों के स्टॉल आज भी नैनीताल की सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए हैं।

सवाल-जवाब

नैनीताल का नन्दा देवी मेला कितने साल पुराना है?
यह ऐतिहासिक मेला अपनी 124 साल पुरानी समृद्ध परंपराओं के साथ आयोजित किया जा रहा है।
मेले में मां नन्दा-सुनन्दा की मूर्तियां किस सामग्री से बनाई जाती हैं?
शुरुआत में मूर्तियां चांदी से बनाई जाती थीं, लेकिन वर्तमान में इन्हें केले के पेड़ और अन्य प्राकृतिक तत्वों से पारंपरिक विधि द्वारा तैयार किया जाता है।
मेले की दुकानों के बुनियादी ढांचे में हाल ही में क्या बदलाव आया है?
मेले में पुरानी टीन की दुकानों की जगह अब आधुनिक कैनोपी और मौसम-अनुकूल जर्मन हैंगर लगाए गए हैं।
तत्कालीन जिलाधिकारी वंदना सिंह ने मेले के लिए क्या प्रयास किए थे?
उनके प्रयासों से मेले की पुरानी अव्यवस्थित दुकानों को हटाकर कैनोपी और जर्मन हैंगर की व्यवस्थित व्यवस्था शुरू की गई थी।
करीब 15 साल पहले मेले में किस घरेलू सामान की बहुत ज्यादा मांग थी?
उस दौर में मेले में लोहे के परात की बहुत ज्यादा मांग हुआ करती थी, जो समय के साथ अब बदल चुकी है।
मुकेश जोशी (मंटू) के अनुसार पुराने समय में दुकानें किस चीज से बनती थीं?
उनके बचपन के दिनों में मेले की दुकानें बहुत सीमित होती थीं और वे केवल पॉलीथिन तथा तिरपाल से बनाई जाती थीं।
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टिप्पणियाँ 5

Michael Anderson@michael-anderson·3 दिन पहले

नैनीताल के नन्दा देवी मेले का 124 साल का यह सफर पारंपरिक संस्कृति और आधुनिक बाजार के बीच के अनूठे संतुलन को दर्शाता है। लोहे के बर्तनों से लेकर जर्मन हैंगर तक का यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि सांस्कृतिक पर्व बदलते समय और आर्थिक विकास के साथ कैसे अनुकूलित होते हैं, जबकि उनकी मूल आस्था और धार्मिक अनुष्ठान पूरी तरह अपरिवर्तित रहते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

नैनीताल के नन्दा देवी मेले का यह आर्थिक और सांस्कृतिक रूपांतरण इस बात का प्रमाण है कि पारंपरिक उत्सव किस प्रकार आधुनिक उपभोग संस्कृति और स्थानीय अर्थव्यवस्था के साथ तालमेल बिठा रहे हैं। टीन के शेड से लेकर आधुनिक जर्मन हैंगर तक की यह यात्रा ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ती क्रय शक्ति, बुनियादी ढांचे के विकास और व्यापारिक विविधीकरण को दर्शाती है। भविष्य में इस प्रकार के सांस्कृतिक आयोजनों का डिजिटलीकरण और स्थानीय कारीगरों के लिए ई-कॉमर्स का एकीकरण पर्वतीय आर्थिकी को एक नया आयाम दे सकता है, जिससे पारंपरिक विरासत और आधुनिक बाजार का संतुलन और मजबूत होगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

यह रूपांतरण केवल सौंदर्य या बाजार का बदलाव नहीं है, बल्कि पहाड़ी अर्थव्यवस्था की बदलती प्राथमिकताओं का संकेत है। पारंपरिक घरेलू औजारों की जगह आधुनिक उपभोक्ता वस्तुओं का आना यह बताता है कि पर्वतीय क्षेत्रों में आय के स्रोत और जीवनशैली में बदलाव आया है। भविष्य में नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे इस सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करते हुए स्थानीय पर्यटन और शिल्प कला को वैश्विक मंच प्रदान करें, ताकि पारंपरिक पहचान पर आँच आए बिना आर्थिक लाभ मिल सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

एक अपराध और सार्वजनिक सुरक्षा संवाददाता के रूप में, मैं इस बदलाव को केवल सौंदर्यशास्त्र नहीं बल्कि सुरक्षा के नजरिए से देखता हूँ। बांस, तिरपाल और टिन के खोखों से जर्मन हैंगर की ओर बढ़ना भीड़ प्रबंधन और अग्नि सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम है। पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े आयोजनों में ढांचागत सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। आधुनिक ढांचे हादसों की आशंका को कम करते हैं, जिससे पुलिस और प्रशासन को कानून-व्यवस्था व सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने में मदद मिलती है। ऐतिहासिक आस्था के साथ-साथ सार्वजनिक सुरक्षा का यह आधुनिकीकरण सराहनीय है।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

करण की बात को आगे बढ़ाते हुए, मैं इसे सुशासन और बुनियादी ढांचे के नीतिगत बदलाव के रूप में देखता हूँ। जब पारंपरिक मेले जर्मन हैंगर जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाते हैं, तो यह केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा देता है। पहाड़ी राज्यों में ऐसे सुदृढ़ अस्थायी ढांचे तैयार करना प्रशासनिक योजना का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। यह बदलाव स्थानीय व्यापारियों को एक सुरक्षित मंच प्रदान करता है और प्रशासन को एक व्यवस्थित वातावरण स्थापित करने में मदद करता है, जो सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और आर्थिक विकास दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

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