नर्मदा नदी के किनारे बसे मंडलेश्वर कस्बे में खड़ा सैकड़ों साल पुराना एक विशाल किला आज अपनी बदहाली की कहानी खुद बयां कर रहा है. कभी यह मराठा साम्राज्य के बाजीराव पेशवा की सत्ता और ताकत का प्रतीक हुआ करता था, लेकिन वक्त के साथ इसकी पहचान कई बार बदली है. संरक्षण की कमी और देखरेख के अभाव में अब इसकी दीवारें और ढांचा जर्जर होकर खंडहर में तब्दील होने की कगार पर पहुंच गए हैं. दिलचस्प यह है कि आज़ादी के करीब आठ दशक बीत जाने के बाद भी यह ऐतिहासिक इमारत जेल के रूप में ही इस्तेमाल हो रही है, जो इसे खरगोन जिले की सबसे अनोखी लेकिन कम चर्चित विरासतों में शुमार करता है.
पेशवा ने बनवाया, जहागीरदार परिवार को सौंपा
इतिहासकारों के मुताबिक इस भव्य किले की नींव करीब 300 साल पहले बाजीराव पेशवा (प्रथम) के दौर में रखी गई थी. निर्माण पूरा होने के बाद पेशवाओं ने इसे महाराष्ट्र से आए एक जहागीरदार परिवार के हवाले कर दिया. इस परिवार को मंडलेश्वर के काशी विश्वनाथ मंदिर की नियमित पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी सौंपी गई थी और बदले में उन्हें किले में रहने की इजाजत मिली. यह परिवार लंबे अरसे तक यहां रहा, किले की देखरेख करता रहा और मंदिर की परंपराओं को आगे बढ़ाता रहा. लेकिन अंग्रेजी हुकूमत की दस्तक के साथ ही किले की तकदीर पूरी तरह पलट गई.
दत्तक पुत्र के बहाने छीनी गई जागीर
इतिहासकार दुर्गेश राजदीप के मुताबिक जहागीरदार परिवार की जागीर भी उसी तरह छीनी गई, जिस तरह झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को दत्तक पुत्र अपनाने की वजह से उनके पद से हटा दिया गया था. अंग्रेजों ने ठीक इसी आधार का सहारा लेते हुए जहागीरदार परिवार का दत्तक उत्तराधिकार अमान्य ठहराया और उनकी जागीर समाप्त कर दी. जागीर खत्म होते ही पूरा किला अंग्रेजों के प्रत्यक्ष अधिकार में चला गया. इस तरह जो इमारत कभी मराठा गौरव और स्थानीय परंपराओं की निशानी थी, वह अब औपनिवेशिक सत्ता के एक औजार में बदल चुकी थी.
पहले खजाना, फिर बनी आधिकारिक जेल
किले पर कब्जे के फौरन बाद अंग्रेजों ने सबसे पहले इसे सरकारी खजाना सुरक्षित रखने के काम में लिया, क्योंकि मोटी दीवारों वाला यह किला इस मकसद के लिए मुफीद था. उस दौर में मंडलेश्वर निमाड़ इलाके में अंग्रेजों की एक बेहद अहम सैन्य छावनी हुआ करता था, जहां बड़ी तादाद में सैनिक, घुड़सवार दस्ते और बड़े अफसर तैनात रहते थे. इसके बाद साल 1890 में इस किले को विधिवत रूप से जेल घोषित कर दिया गया. हालांकि इससे भी काफी पहले, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही अंग्रेज इस इमारत का इस्तेमाल कैदियों को रखने के लिए जेल के तौर पर कर चुके थे.
सुरसी बाई की शहादत और क्रांतिकारियों का हमला
निमाड़ क्षेत्र के जिन स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेज गिरफ्तार करते थे, उन्हें अक्सर इसी किले की जेल में बंद रखा जाता था. प्रसिद्ध क्रांतिकारी भीमा नायक की मां सुरसी बाई को भी इसी जेल में कैद किया गया था. बताया जाता है कि अंग्रेजों की यातनाओं को झेलते हुए ही उनकी मौत हुई. सुरसी बाई की मौत की खबर फैलते ही इलाके के क्रांतिकारी भड़क उठे और उन्होंने किले पर सीधा हमला बोलकर अंग्रेजों को वहां से खदेड़ दिया. यह घटना निमाड़ के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक अहम मोड़ मानी जाती है.
होलकर शासन में भी जेल का सिलसिला जारी
इस हमले के कुछ समय बाद, साल 1864 में यह किला दोबारा होलकर रियासत के अधीन आ गया, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि होलकर शासकों ने भी इसका इस्तेमाल जेल के रूप में ही जारी रखा. देश की आज़ादी के बाद इसका दर्जा बदलकर इसे सेंट्रल जेल से जिला जेल का रूप दे दिया गया. कुछ समय बाद जब जिला मुख्यालय खरगोन स्थानांतरित हुआ, तो मंडलेश्वर की इस इमारत को सब जेल में तब्दील कर दिया गया. यानी पेशवा काल से लेकर आज तक, कभी न कभी इस इमारत का इस्तेमाल बंदियों को रखने के लिए ही होता रहा है और वर्तमान में भी यह जेल के रूप में काम कर रहा है.
संरक्षण के अभाव में खंडहर बनती विरासत
करीब तीन सदियों का इतिहास समेटे यह किला पेशवा शासन, अंग्रेजी हुकूमत, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम और होलकर काल की तमाम अनकही कहानियां अपने भीतर समेटे खड़ा है. लेकिन बरसों से समुचित संरक्षण न मिलने के चलते अब इसकी कई दीवारें और मूल ढांचा लगातार क्षतिग्रस्त होता जा रहा है. स्थानीय नागरिकों और इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों का मानना है कि पुरातत्व विभाग को आगे आकर इस ऐतिहासिक धरोहर को अपने संरक्षण में लेना चाहिए और इसे व्यवस्थित रूप से एक पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित किया जाना चाहिए. उनका कहना है कि ऐसा होने से न सिर्फ निमाड़ के गौरवशाली अतीत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजा जा सकेगा, बल्कि इलाके को पर्यटन के नक्शे पर भी एक नई और मजबूत पहचान मिलेगी.



















