बिहार के बेगूसराय जिले में स्थित मंसूरचक गांव अपनी जीवंत मूर्तियों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण देश भर में 'स्टेच्यू विलेज' के नाम से जाना जाता है। ऐतिहासिक पाल राजवंश के समय से चली आ रही इस पारंपरिक कलाकृति का केंद्र आज गंभीर प्रशासनिक संकट और उपेक्षा का सामना कर रहा है। गांव के सैकड़ों मूर्तिकार अपनी सदियों पुरानी कला को संजोने के बावजूद केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी पीएम विश्वकर्मा योजना के लाभों से वंचित हैं। कागजी औपचारिकताओं और तस्वीरों के खिंचवाने के महीनों बाद भी स्थानीय कलाकारों के हाथ खाली हैं, जिससे पारंपरिक शिल्पकारों में गहरा असंतोष व्याप्त है।
पाल कालीन ऐतिहासिक विरासत और 70 लाख रुपये का सालाना कारोबार
मंसूरचक में मूर्ति निर्माण की परंपरा कोई हालिया शुरुआत नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें प्राचीन पाल काल के इतिहास से जुड़ी हुई हैं। वर्तमान समय में गांव के लगभग 200 परिवार पूरे साल मिट्टी और अन्य सामग्रियों से भव्य मूर्तियां बनाने का काम करते हैं। इन कुशल हाथों द्वारा निर्मित कलाकृतियों की मांग केवल बिहार के विभिन्न जिलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई अन्य राज्यों में भी यहां की मूर्तियों की भारी मांग रहती है।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो एक ही मुख्य सीजन के दौरान यह गांव लगभग 70 लाख रुपये मूल्य की मूर्तियों का निर्माण और बिक्री कर लेता है। इतने बड़े पैमाने पर होने वाली आर्थिक गतिविधियों और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान दर्ज कराने के बावजूद, इस कला केंद्र को न तो आधुनिक सुविधाएं मिल सकी हैं और न ही बुनियादी ढांचागत सहायता दी गई है।
फोटोग्राफी और आवेदन के बाद भी पीएम विश्वकर्मा योजना का लाभ नहीं
गांव के पारंपरिक मूर्तिकार लंबे समय से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपनों की आदर्श योजना, यानी पीएम विश्वकर्मा योजना से आर्थिक व तकनीकी मदद की उम्मीद लगाए बैठे हैं। स्थानीय मूर्तिकार दीपक पंडित का कहना है कि करीब एक वर्ष पूर्व प्रशासनिक कर्मियों द्वारा इस योजना के तहत उनका आवेदन फॉर्म भरवाया गया था। उस समय कलाकारों को आश्वासन दिया गया था कि उन्हें कारोबार के विस्तार के लिए वित्तीय सहायता, आधुनिक औजार और संस्थागत प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा।
हालांकि, आवेदन प्रक्रिया पूरी होने के बाद किसी भी अधिकारी ने जमीनी स्तर पर आकर स्थिति का जायजा नहीं लिया। जब निराश ग्रामीणों ने प्रखंड कार्यालय पहुंचकर संपर्क साधने की कोशिश की, तो वहां मौजूद कर्मियों ने उचित जानकारी देने के बजाय उन्हें वापस लौटा दिया। जटिल कागजी प्रक्रियाओं और सही मार्गदर्शन के अभाव में वास्तविक पात्र कलाकार योजना के लाभों से दूर बने हुए हैं।
कागजी खानापूर्ति और अधिकारियों की बेरुखी से बढ़ा जन आक्रोश
योजना के क्रियान्वयन पर सवाल उठाते हुए युवा मूर्तिकार मनीष कुमार पंडित और राहुल कुमार ने बताया कि कुछ समय पहले सरकारी प्रतिनिधि गांव पहुंचे थे। उन्होंने ग्रामीणों के फॉर्म भरवाए, कई कोणों से तस्वीरें लीं और प्रक्रिया पूरी होने का दावा करके चले गए। इसके बाद प्रक्रिया किस चरण में है या आगे क्या कदम उठाना है, इस संबंध में कोई पारदर्शी जानकारी साझा नहीं की गई।
बाद में जब ग्रामीण विभागीय कार्यालयों में अपनी स्थिति जानने गए, तो अधिकारियों ने सीधे तौर पर लाभ देने से इनकार कर दिया। राहुल कुमार के अनुसार, सरकारी तंत्र को योजनाओं के नियमों और आवेदन के चरणों के बारे में सरल भाषा में जन-जागरूकता फैलानी चाहिए, ताकि ग्रामीण कलाकारों को पता चल सके कि सहायता प्राप्त करने का सही तरीका क्या है। इसके अतिरिक्त, चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले स्थानीय जनप्रतिनिधियों और विधायकों ने भी चुनाव जीतने के बाद इस गांव की सुध लेना बंद कर दिया है, जिससे ग्रामीणों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है।
बीडीओ से डीएम स्तर तक जांच और पुनर्सत्यापन की मांग
प्रशासनिक शिथिलता के खिलाफ आवाज उठाते हुए मूर्तिकार उपेंद्र पासवान और उनके साथियों ने उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) से लेकर जिला अधिकारी (डीएम) के स्तर पर बरती जा रही लापरवाही की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने मांग रखी है कि गांव के योग्य और पात्र मूर्तिकारों की एक नई व पारदर्शी सूची तैयार की जाए, जिससे वास्तविक हकदारों तक पीएम विश्वकर्मा योजना की मदद पहुंच सके।
स्थानीय शिल्पकारों का स्पष्ट मानना है कि यदि सरकार उन्हें समय पर आधुनिक प्रशिक्षण, सस्ती दर पर ऋण, वित्तीय सहायता और बेहतर संसाधन उपलब्ध कराए, तो इस पारंपरिक हस्तशिल्प को एक संगठित और बड़े उद्योग में बदला जा सकता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जिला प्रशासन कब अपनी सुस्ती छोड़ता है और फाइलों में दबे इस 'स्टेच्यू विलेज' के विकास के वादे धरातल पर उतरते हैं।





















