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नवोदय विद्यालय पर सुप्रीम कोर्ट की तमिलनाडु को दो टूक, कहा- हर राज्य मनमानी करेगा तो देश कैसे चलेगातमिलनाडु
17 सित॰ 2026, 10:33 pm (39 दिन पहले)· 5

नवोदय विद्यालय पर सुप्रीम कोर्ट की तमिलनाडु को दो टूक, कहा- हर राज्य मनमानी करेगा तो देश कैसे चलेगा

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को नवोदय विद्यालयों के लिए हर जिले में जमीन तलाशने का सख्त निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि यदि राज्य केंद्र की नीतियां नकारने लगेंगे, तो देश का संघीय ढांचा बिखर जाएगा।

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने नवोदय विद्यालय योजना को लेकर तमिलनाडु सरकार के रुख पर गहरी नाराजगी जताई है। अदालत ने राज्य को अपनी मानसिकता बदलने की कड़ी हिदायत दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि देश का हर राज्य केंद्र सरकार की नीतियों को मानने से इनकार कर देगा, तो संपूर्ण संघीय ढांचा पूरी तरह चरमरा जाएगा। इसी कड़े संदेश के साथ अदालत ने राज्य सरकार को अपने प्रत्येक जिले में नवोदय विद्यालय की स्थापना के वास्ते जमीन की शिनाख्त का अनिवार्य आदेश दिया है। राज्य की ओर से पूर्व के आदेश को वापस लिए जाने का जो आग्रह किया गया था, उसे भी न्यायपीठ ने सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने तमिलनाडु प्रशासन को जमीन की पहचान की यह प्रक्रिया पूरी करने के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय प्रदान किया है। वर्तमान कानूनी विवाद मूल रूप से मद्रास हाई कोर्ट के वर्ष 2017 के उस फैसले से जुड़ा हुआ है, जिसे राज्य ने चुनौती दी थी।

संघीय ढांचे की रक्षा और आपसी सहयोग पर जोर

सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने भारत के फेडरल स्ट्रक्चर की गरिमा और सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता प्रकट की। न्यायपीठ ने सख्त लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि आने वाले समय में केंद्र सरकार समवर्ती सूची के अंतर्गत कोई नीति लागू करती है और प्रत्येक राज्य यह तर्क देना शुरू कर दे कि वह उस नीति को स्वीकार नहीं करेगा, तो हमारे संघीय ढांचे का भविष्य क्या होगा। जस्टिस नागरत्ना ने राज्य के प्रतिनिधियों को याद दिलाया कि भारतीय लोकतंत्र की मूल आत्मा सहकारी संघवाद यानी को-ऑपरेटिव फेडरलिज्म पर टिकी हुई है। किसी भी राज्य को केंद्र सरकार से खुद को पूरी तरह अलग-थलग या कटा हुआ नहीं मानना चाहिए। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और चेन्नई के बीच संवाद का एक मजबूत और सुचारू पुल कायम रहना बेहद जरूरी है। अदालत ने इस बात पर खास जोर दिया कि राज्य के मेधावी छात्रों को देश स्तर के आधुनिक शिक्षण संस्थानों और उच्चस्तरीय स्कूलों से वंचित रखना किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता है।

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दिसंबर के आदेश को वापस लेने की याचिका खारिज

तमिलनाडु की तरफ से अदालत में पेश हुए सीनियर वकील जयदीप गुप्ता ने दलील दी कि 15 दिसंबर 2025 को पारित किए गए आदेश को वापस लेने के लिए एक औपचारिक आवेदन दाखिल किया गया है। उक्त आदेश के तहत राज्य के हर एक जिले में मात्र छह हफ्ते की अवधि के भीतर जमीन तलाशने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस मांग को सुनते ही तुरंत प्रभाव से खारिज कर दिया। पीठ ने साफ शब्दों में दो टूक कहा कि अदालत अपने उस पूर्व आदेश को किसी भी कीमत पर वापस नहीं ले रही है। न्यायपीठ ने इस बात को भी प्रमुखता से रेखांकित किया कि संबंधित आदेश जारी होने के बाद से राज्य की राजनीतिक सत्ता में भले ही बदलाव आ चुका हो, लेकिन केवल सरकार के बदलने से किसी भी अदालती आदेश का कानूनी प्रभाव स्वतः समाप्त नहीं हो जाता है। राजनीतिक परिस्थितियां चाहे जो भी हों, राज्य प्रशासन को निर्धारित समय-सीमा के भीतर जमीन की पहचान का काम पूरा करना ही होगा। हालांकि, अदालत ने अपनी बात स्पष्ट करते हुए यह भी जोड़ा कि यह पूरी प्रशासनिक कवायद स्पेशल लीव पिटीशन के अंतिम न्यायिक निर्णय के अधीन रहेगी।

भाषा विवाद और त्रि-भाषा फार्मूले पर तीखी बहस

तमिलनाडु की धरती पर नवोदय विद्यालयों के प्रवेश का विरोध मुख्य रूप से त्रि-भाषा फार्मूले को लेकर होता रहा है। राज्य सरकार का यह पारंपरिक तर्क रहा है कि इस व्यवस्था के माध्यम से उन पर जबरन हिंदी भाषा थोपने का प्रयास किया जा रहा है। इस संवेदनशील मुद्दे पर कड़ी टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि सबसे पहले राज्य को अपनी सोच के नजरिए में बदलाव लाना होगा। यदि कोई यह दलील देता है कि वह नवोदय विद्यालय इसलिए नहीं चाहता क्योंकि वह तमिलनाडु की माटी पर हिंदी पढ़ाई जाने की अनुमति नहीं देगा, तो यह उचित दृष्टिकोण नहीं है। इस पर सफाई पेश करते हुए राज्य के वकील ने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु कतई हिंदी का विरोधी नहीं है। उन्होंने अदालत को जानकारी दी कि राज्य के कई अन्य विद्यालयों में पहले से ही हिंदी भाषा पढ़ाई जा रही है। इस दलील के जवाब में अदालत ने कहा कि नवोदय विद्यालयों के आने से तमिलनाडु के पहले से ही उन्नत उच्च शिक्षा मानकों को और अधिक मजबूती प्राप्त होगी। इससे राज्य की संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था किसी भी स्तर पर कमजोर नहीं होगी, बल्कि उसका दायरा और विस्तृत होगा।

विवाद सुलझाने के लिए वित्तीय राहत और समन्वय का प्रस्ताव

केंद्र सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने अदालत को पूरी तरह आश्वस्त किया कि इस योजना के लागू होने से राज्य सरकार पर किसी भी तरह का अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा। उन्होंने यह साफ किया कि तमिलनाडु सरकार को केवल विद्यालय के निर्माण और स्थापना के लिए जमीन उपलब्ध करानी है। इसके अतिरिक्त, स्कूल के भवन निर्माण से लेकर उसके संचालन तक का सारा वित्तीय खर्च केंद्र सरकार द्वारा स्वयं वहन किया जाएगा। भाषा नीति को लेकर जनता या प्रशासन के मन में जो भी संशय या मतभेद हैं, उन्हें भी आपसी बातचीत और विचार-विमर्श के जरिए आसानी से हल किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को सलाह दी कि वे आपसी तालमेल बिठाकर इस गतिरोध को समाप्त करने का कोई रचनात्मक रास्ता निकालें। बेंच ने यह भी टिप्पणी की कि चेन्नई के नागरिकों को दिल्ली से और दिल्ली के नीति निर्धारकों को चेन्नई से किसी भी प्रकार का अलगाव महसूस नहीं होना चाहिए। दोनों ही पक्षों को मिलकर इस पुराने विवाद को सुलझाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने इस महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई के लिए 14 दिसंबर की तारीख मुकर्रर की है।

चार दशक पुराना तनाव और नवोदय विद्यालयों का इतिहास

भारत में नवोदय विद्यालय योजना की शुरुआत वर्ष 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत की गई थी। इस महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य उद्देश्य देश के ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले प्रतिभाशाली बच्चों को उच्च गुणवत्तायुक्त और आधुनिक शिक्षा प्रदान करना है। इसके बावजूद, तमिलनाडु देश का एकमात्र ऐसा राज्य बना हुआ है, जहां आज के दिन तक एक भी नवोदय विद्यालय नहीं खुल पाया है। इसकी मुख्य वजह यह है कि तमिलनाडु दशकों से अपनी पारंपरिक दो-भाषा नीति यानी केवल तमिल और अंग्रेजी का कड़ाई से पालन करता आ रहा है। राज्य की स्थानीय राजनीति में भाषा हमेशा से एक अत्यंत संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दा रही है। नवोदय विद्यालयों के नियम के अनुसार कक्षा छह से आठवीं तक कुल तीन भाषाएं पढ़ाई जाती हैं, जिसमें हिंदी भी एक अनिवार्य विषय के रूप में शामिल होती है। इसी नियम और प्रावधान के कारण राज्य की विभिन्न सरकारें लगातार केंद्र सरकार के इस मॉडल का विरोध करती आई हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के इस बेहद सख्त और स्पष्ट रुख ने राज्य सरकार के सामने एक बहुत बड़ी कानूनी तथा नीतिगत चुनौती खड़ी कर दी है।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को क्या सख्त निर्देश दिया है?
अदालत ने राज्य के हर जिले में नवोदय विद्यालय के लिए तीन महीने के भीतर जमीन की पहचान पूरा करने का सख्त आदेश दिया है।
तमिलनाडु सरकार ने किस आदेश को वापस लेने की मांग की थी?
राज्य सरकार ने 15 दिसंबर 2025 के उस आदेश को वापस लेने की अर्जी दी थी जिसमें छह हफ्ते में जमीन तलाशने को कहा गया था।
तमिलनाडु में नवोदय विद्यालयों का विरोध क्यों किया जाता है?
राज्य सरकार त्रि-भाषा फार्मूले और स्कूलों में हिंदी पढ़ाए जाने के प्रावधान को लेकर इसका विरोध करती रही है।
नवोदय विद्यालयों के निर्माण और संचालन का खर्च कौन उठाएगा?
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि स्कूल के निर्माण और संचालन का सारा खर्च केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाएगा।
इस मामले की अगली सुनवाई कब तय की गई है?
शीर्ष अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 14 दिसंबर की तारीख मुकर्रर की है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Neha Verma@neha-verma·39 दिन पहले

यह कानूनी गतिरोध केवल प्रशासनिक नीति का नहीं, बल्कि देश के भविष्य और शिक्षा के संघीय संतुलन का है। तमिलनाडु के ग्रामीण और मेधावी छात्रों को राष्ट्रीय स्तर के नवोदय विद्यालयों से वंचित रखना और केंद्र-राज्य संवाद में दूरी पैदा करना शैक्षणिक अवसरों को सीमित करता है। यदि समय रहते दिल्ली और चेन्नई के बीच यह संवादहीनता समाप्त नहीं हुई, तो इसका दूरगामी असर देश की युवा प्रतिभाओं के विकास और समावेशी शैक्षिक ढांचे पर पड़ेगा।

Ravikash Gupta@ravikash·39 दिन पहले

सर्वोच्च अदालत की यह सख्त टिप्पणी भारत के संघीय ढांचे और सहकारी संघवाद की महत्ता को रेखांकित करती है। जब नीतियां राजनीतिक विरोध की भेंट चढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर राज्यों की वित्तीय प्राथमिकताओं और शिक्षा के बुनियादी ढांचे पर पड़ता है। हालांकि इस विवाद का असर केवल प्रशासनिक नीतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे केंद्र-राज्य वित्तीय संतुलन और विकासात्मक फंड के आवंटन पर भी दीर्घकालिक दबाव बन सकता है, जिससे भविष्य में कॉर्पोरेट निवेश और क्षेत्रीय आर्थिक गतिशीलता भी प्रभावित हो सकती है।

Rohan Gupta@rohan-gupta·39 दिन पहले

यह कानूनी गतिरोध केवल प्रशासनिक और शैक्षणिक मोर्चे तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे तमिलनाडु की उस डिजिटल और तकनीकी आर्थिकी पर भी असर पड़ सकता है जो भविष्य के ग्लोबल हब के रूप में उभर रही है। यदि केंद्र और राज्य के बीच संवाद इसी तरह अवरुद्ध रहा, तो एआई और तकनीकी शिक्षा से जुड़े बुनियादी ढांचे के लिए केंद्रीय अनुदान और इनोवेशन फंड्स के आवंटन में अनावश्यक देरी हो सकती है। अंततः, इस राजनीतिक रस्साकशी का सीधा नुकसान राज्य के उन मेधावी युवाओं को उठाना पड़ेगा जो अगली पीढ़ी के टेक स्टार्टअप्स और डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनने वाले हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·39 दिन पहले

यह फैसला सहकारी संघवाद की महत्ता को रेखांकित करता है। यद्यपि यह मामला दक्षिण भारत का है, किंतु इसका असर देश के अन्य राज्यों पर भी पड़ सकता है जहाँ केंद्र-राज्य के बीच नीतिगत मतभेद हैं। यदि क्षेत्रीय राजनीति राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों पर हावी होती है, तो इसका सीधा नुकसान स्थानीय विद्यार्थियों के भविष्य को भुगतना पड़ेगा। आने वाले तीन महीनों में तमिलनाडु सरकार को इस कानूनी और प्रशासनिक गतिरोध का क्या व्यावहारिक समाधान निकालना होगा, इस पर सबकी नज़रें टिकी रहेंगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·39 दिन पहले

यह कानूनी आदेश इस बात की ओर इशारा करता है कि प्रशासनिक और राजनीतिक असहमति के चलते अदालतें अब छात्रहित से जुड़े मामलों में कड़ा रुख अपनाने लगी हैं। यदि निर्धारित तीन महीने की अवधि में राज्य प्रशासन जमीन चिन्हित करने की प्रक्रिया को पूरा नहीं करता है, तो शीर्ष अदालत की अवमानना की कार्रवाई से बचने के लिए कानूनी व प्रशासनिक स्तर पर नए सिरे से मंथन करना होगा। इस प्रकरण से यह भी स्पष्ट होता है कि केंद्र और राज्य के नीतिगत टकराव में न्यायिक हस्तक्षेप ही व्यवस्था को पटरी पर लाने का मुख्य माध्यम बन रहा है।

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