मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) के कामकाज के तौर-तरीकों को चुनौती देने वाली याचिका के खिलाफ चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए अपना विस्तृत पक्ष रखा है। शीर्ष अदालत में दाखिल किए गए काउंटर एफिडेविट में आयोग ने इस पूरी याचिका की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया और कहा कि यह वाद पूरी तरह से केवल एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर खड़ा किया गया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि वर्तमान कानूनी स्थिति और संवैधानिक मर्यादाओं को देखते हुए इस तरह की अर्जियां अदालत में टिकने योग्य नहीं हैं।
एसआईआर के फैसलों और आंतरिक प्रक्रियाओं पर आयोग का रुख
चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में जानकारी दी कि जून 2025, अक्टूबर 2025 और मई 2026 के विशेष सारांश संशोधन (एसआईआर) से जुड़े तमाम निर्देश मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की पूर्ण सहमति से जारी किए गए थे। आयोग के अनुसार, शीर्ष स्तर पर मौजूद तीनों अधिकारियों ने मिलकर ही इस हलफनामे को भी मंजूरी दी है। चुनाव निकाय ने साफ किया कि किसी भी प्रशासनिक फाइल पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त या अन्य चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई व्यक्तिगत टिप्पणियों, शंकाओं, सवालों या सुझावों को आयोग का अंतिम आधिकारिक निर्णय नहीं माना जा सकता। अंतिम नीति वही होती है जिसे सामूहिक तौर पर अनुमोदित किया जाए।
मतदाता पंजीकरण से जुड़े फॉर्म 6 के विषय में आयोग ने अदालत को बताया कि इसके मूल प्रारूप में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं किया गया है, क्योंकि नियमों में संशोधन करने का विधिक अधिकार केवल केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। हालांकि, डिजिटल पोर्टल पर दिख रहे फॉर्म को लेकर यह स्वीकार किया गया कि वह पहली नजर में संशोधित स्वरूप जैसा प्रतीत हो सकता है। इसी व्यवस्था को स्पष्ट और सुगम बनाने के लिए 21 अक्टूबर से ऑनलाइन आवेदन पत्र और घोषणा पत्र को अलग-अलग श्रेणी में विभाजित कर दिया गया है।
मतदाता सूची सत्यापन और गोवा का उदाहरण
मतदाताओं के सत्यापन की जमीनी प्रक्रिया को लेकर आयोग ने स्पष्ट किया कि अनमैप्ड मतदाताओं को अपनी पहचान साबित करने के लिए व्यक्तिगत तौर पर पेशी या सुनवाई के लिए बुलाना अनिवार्य नहीं है। इसके बजाय बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) सीधे नागरिकों के घरों पर जाकर आवश्यक दस्तावेज एकत्र करते हैं। आयोग ने यह भी रेखांकित किया कि ईसीआईनेट प्रणाली के भीतर किसी भी मतदाता का नाम जोड़ने अथवा हटाने की कार्रवाई केवल संबंधित निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) के वैध आदेश के बाद ही संभव होती है, जिससे किसी भी तरह की मनमानी की गुंजाइश खत्म हो जाती है।
हलफनामे में आंकड़ों के साथ यह दर्शाया गया कि मतदाता सूची में विसंगतियों के आरोप कितने निराधार हैं। गोवा का उदाहरण पेश करते हुए बताया गया कि वहां जिन 97 मतदाताओं के नाम छूट जाने का दावा किया गया था, उनमें से 88 लोगों के नाम पहले से ही वैध मतदाता सूची में दर्ज थे। शेष बचे 9 नामों में से 6 लोग विदेश में रह रहे हैं, जबकि 3 नागरिकों के पास पुर्तगाली पासपोर्ट पाया गया है।
सीईसी को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया और अन्य मामले
मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पद की स्वतंत्रता को रेखांकित करते हुए चुनाव आयोग ने रेखांकित किया कि सीईसी को हटाने की प्रक्रिया भारतीय संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज को हटाने के समान ही कठोर और विशिष्ट है। इस वैधानिक व्यवस्था के चलते किसी याचिका के जरिए उनके नियमित कामकाज पर रोक लगाने की मांग कानूनी तौर पर विचारणीय नहीं है। आयोग ने यह भी साफ किया कि उसकी ओर से किसी भी आंतरिक गोपनीय नोट अथवा प्रशासनिक फाइल को सार्वजनिक माध्यमों में प्रसारित करने की मंजूरी नहीं दी गई थी। दशहरा अवकाश के कारण फिलहाल संक्षिप्त उत्तर दाखिल किया गया है और आयोग ने विस्तृत बिंदुवार जवाब देने के लिए अदालत से अनुमति मांगी है।
इससे पहले, महाराष्ट्र में मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया भी शीर्ष अदालत की दहलीज तक पहुंच चुकी है। याचिकाकर्ता अरुण आनंदागिरी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने अदालत के समक्ष दलील दी थी कि महाराष्ट्र में लगभग 9 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं, जिनमें से करीब 33 प्रतिशत नाम सूची से हटा दिए गए हैं। इस मामले में केंद्र, राज्य सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किए जा चुके हैं, जिसकी अगली सुनवाई 5 नवंबर को तय है।














