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नीट परीक्षा धांधली प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई से गहराया जनाक्रोश, सोनम वांगचुक के अनशन का दिया गया हवालाभारत
27 जुल॰ 2026, 3:57 pm (19 दिन पहले)· 0

नीट परीक्षा धांधली प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई से गहराया जनाक्रोश, सोनम वांगचुक के अनशन का दिया गया हवाला

जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिसिया कार्रवाई को लेकर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। एक नागरिक ने सोनम वांगचुक के अनशन और गोपालदास नीरज की कविता का संदर्भ देते हुए लोकतंत्र में दमन के बजाय संवाद कायम करने की मांग की।

राष्ट्रीय राजधानी के जंतर-मंतर पर नीट परीक्षा धांधली को लेकर प्रदर्शन कर रहे युवाओं के खिलाफ की गई पुलिसिया कार्रवाई ने एक नया मोड़ ले लिया है। इस दमनकारी रवैये से दुखी होकर एक नागरिक ने सरकार की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक रवैये पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग किए जाने से आहत व्यक्ति ने अपना गुस्सा और दर्द जाहिर करते हुए कहा कि अपने जायज अधिकारों और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे छात्रों के साथ इस तरह का कठोर व्यवहार बेहद पीड़ादायक है। लोकतंत्र की बुनियाद संवाद पर टिकी होती है, लेकिन इसके विपरीत विरोध प्रदर्शन करने वालों की आवाज को लगातार दबाने की कोशिश की जा रही है, जो बेहद चिंताजनक स्थिति है।

संवाद बनाम तानाशाही: ऐतिहासिक उदाहरणों के साथ तीखा हमला

विरोध दर्ज कराने वाले नागरिक ने सत्ता पक्ष के रवैये को लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ करार दिया है। उन्होंने कहा कि किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में शासन का रवैया अहंकारी नहीं होना चाहिए, बल्कि बातचीत की गुंजाइश हमेशा दोनों तरफ से खुली रखनी चाहिए। इतिहास का हवाला देते हुए उन्होंने याद दिलाया कि किस तरह पूर्ववर्ती सरकारों ने आंदोलनों के दौरान संवाद का रास्ता चुना था। यूपीए शासनकाल के दौरान जब अन्ना हजारे भूख हड़ताल पर बैठे थे, तब उन्हें सरकार की ओर से नारियल पानी पिलाकर अनशन तुड़वाया गया था। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और ब्रिटिश हुकूमत के समय महात्मा गांधी के सत्याग्रहों के दौरान भी बातचीत का दौर जारी रखा जाता था।

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नागरिक ने भारत के संविधान में दी गई शपथ का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान राष्ट्र की एकता और अखंडता के साथ-साथ प्रत्येक नागरिक की गरिमा की रक्षा का आश्वासन देता है। जब प्रदर्शनकारी छात्रों पर लाठियां चलाई जाती हैं या उनके साथ दुर्व्यवहार होता है, तब व्यक्ति की गरिमा पूरी तरह से तार-तार हो जाती है। सरकार को दमनकारी रुख अपनाने के बजाय संवेदनशीलता दिखाते हुए शांतिपूर्ण बातचीत के जरिए समाधान निकालने का प्रयास करना चाहिए।

सोनम वांगचुक का संदर्भ और शिक्षा प्रणाली पर सवाल

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने प्रसिद्ध शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक के हालिया अनशन का प्रमुखता से जिक्र किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सोनम वांगचुक देश की चरमराती और लाचार शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर पूरे 20 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठे रहे थे। वह अपने निजी स्वार्थ के लिए कोई मांग नहीं कर रहे थे। उन्होंने न तो लुटियंस दिल्ली में 200 गज का कोई प्लॉट मांगा था, न ही राज्यसभा की कोई सीट मांगी थी और न ही केंद्रीय मंत्रिमंडल में किसी पद की इच्छा जताई थी। उनकी एकमात्र मांग देश की बदहाल शिक्षा प्रणाली को दुरुस्त करने, शासन द्वारा अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने और विफलता पर पद से इस्तीफा देने की थी।

शिक्षा व्यवस्था की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए नागरिक ने कहा कि जब देश के युवा अपनी पढ़ाई और भविष्य को बचाने के लिए सड़कों पर उतरते हैं, तो उनकी मांगें बहुत छोटी और पारदर्शी होती हैं। इसके बावजूद प्रशासनिक तंत्र उन पर ध्यान देने के बजाय दमन का रास्ता चुनता है, जो कि किसी भी तरह से तर्कसंगत नहीं है।

दिल्ली पुलिस के रवैये और आयुक्त पर टिप्पणी

जंतर-मंतर पर हुए लाठीचार्ज और पुलिस कार्रवाई पर कड़ा प्रहार करते हुए नागरिक ने दिल्ली पुलिस के नए आयुक्त अनुराग कुमार के कार्यकाल और उनके प्रशासनिक फैसलों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पुलिस के डंडे और जूतों के बल पर एक सुंदर और जीवनंत लोकतंत्र को कुचलने की कोशिश की जा रही है। इस प्रकार की कठोर कार्रवाई किसी भी सूरत में प्रशंसा के योग्य नहीं हो सकती। व्यंग्य करते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के दमनकारी कृत्यों को देखकर इतिहास के अत्याचारी शासक भी खुश हो जाते, मानों उनके दरबार में इस काम के लिए कोई बड़ा इनाम दिया जा रहा हो।

उन्होंने जंतर-मंतर पर हुई एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि जब उन्हें खबर मिली कि उनके साथी दिपके को पुलिस ने पीटा है और वह रो पड़े हैं, तो वह खुद भी पीछे नहीं रहे। वह तुरंत जंतर-मंतर की ओर भागे ताकि वह भी अपने साथियों के साथ पुलिस की लाठियों का सामना कर सकें। उन्होंने कहा कि पुलिस के पास बड़ी व्यवस्था, ताकत और धनबल हो सकता है, लेकिन बल प्रयोग कभी भी लोकतंत्र का सही रास्ता नहीं हो सकता।

गोपालदास नीरज की कविता के जरिए दर्द का इज़हार

प्रशासनिक तंत्र की बेरुखी और लाचारी से व्यथित होकर उन्होंने प्रसिद्ध कवि गोपालदास नीरज की प्रसिद्ध कविता की पंक्तियां उद्धृत कीं। उन्होंने कहा कि जब इंसान पूरी तरह से हताश और निराश हो जाता है, तब नीरज जी की पंक्तियां ही उसकी वास्तविक भावना को बयां करती हैं। कविता की पंक्तियां प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि किस तरह सपने फूल की तरह झड़ जाते हैं और साथी शूल की तरह चुभने लगते हैं, जबकि इंसान बेबस होकर गुबार देखता रह जाता है। समय बीत जाता है, धूप ढल जाती है और चाहत पूरी हुए बिना उम्र निकल जाती है।

उन्होंने कविता का अर्थ समझाते हुए कहा कि नीरज ने ये पंक्तियां किसी ख्वाब में नहीं लिखी थीं। उन्होंने समाज के उस दौर को देखा था जहां वक्त के साथ कई लोग आए और गए, लेकिन अंत में केवल धूल और गुबार ही हाथ आया। आज प्रदर्शनकारी युवाओं के साथ भी यही स्थिति बनी हुई है, जहां उनकी मांगें सुनने वाला कोई नहीं है।

लोकतंत्र में असहमति का अधिकार और आगे का रास्ता

अपनी बात के अंत में उन्होंने भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करना या सरकार के फैसलों से असहमत होना कोई अपराध नहीं है। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है। लोकतंत्र लगातार सिमटता जा रहा है क्योंकि बातचीत की मेज से असहमति की आवाजों को दूर किया जा रहा है।

उन्होंने सरकार और प्रशासन से अपील की कि वे अहंकार छोड़कर संवाद की मेज पर आएं। यदि प्रदर्शनकारियों की बातों में कोई गलती है या कोई भ्रांति है, तो उसे बातचीत के जरिए दूर किया जा सकता है। हिंसा, लाठीचार्ज और दमनकारी नीतियों से किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सकता, केवल आपसी बातचीत से ही लोकतंत्र को मजबूत बनाया जा सकता है।

सवाल-जवाब

जंतर-मंतर पर किस मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहा था?
जंतर-मंतर पर छात्र और नागरिक नीट परीक्षा धांधली और पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे।
प्रदर्शन के दौरान सोनम वांगचुक का नाम क्यों लिया गया?
सोनम वांगचुक ने शिक्षा प्रणाली में सुधार की मांग को लेकर 20 दिनों तक भूख हड़ताल की थी, जिसका उदाहरण देकर प्रदर्शनकारियों की निस्वार्थ मांगों को रेखांकित किया गया।
प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई पर क्या सवाल उठाए?
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस लाठी और बल प्रयोग के जरिए शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध और असहमति की आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है।
बातचीत के संदर्भ में किन ऐतिहासिक घटनाओं का जिक्र किया गया?
यूपीए शासन में अन्ना हजारे के अनशन, इंदिरा गांधी के दौर और महात्मा गांधी के सत्याग्रह का उदाहरण देकर बताया गया कि लोकतंत्र में दमन के बजाय संवाद का रास्ता चुना जाना चाहिए।
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