1947 के विभाजन की त्रासदी पर आधारित फिल्म 'बंटवारा 1947' के इस रिव्यू में निर्देशक राजकुमार संतोषी की संवेदनशीलता और मुख्य कलाकारों के सशक्त प्रदर्शन का गहराई से विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। भारत के इतिहास में वर्ष 1947 का बंटवारा एक ऐसा दर्दनाक अध्याय है, जिसकी टीस आज भी महसूस की जाती है। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनने वाली अधिकांश फिल्मों में आमतौर पर हिंसा, नफरत और वैमनस्य को मुख्य रूप से उभारा जाता है। हालांकि, दिग्गज फिल्म निर्माता राजकुमार संतोषी ने अपनी इस नई पेशकश के जरिए एक बेहद अलग और नाजुक दृष्टिकोण अपनाया है। यह सिनेमाई रचना केवल दो देशों के बीच खींची गई भौगोलिक सीमाओं की दास्तान नहीं है, बल्कि उस उथल-पुथल भरे दौर में सरहद के उस पार बिखरी इंसानियत, आत्मीयता और अटूट मानवीय संवेदनाओं की एक दिल छू लेने वाली कहानी बयां करती है। इस फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार की रेटिंग दी गई है।
विभाजन के खौफनाक दौर में पनपती इंसानियत की अनूठी कहानी
फिल्म का कथाक्रम दर्शकों को वर्ष 1947 के लाहौर की तंग गलियों और जलते हुए बाजारों में ले जाता है, जहां चारों तरफ सांप्रदायिक तनाव और नफरत का माहौल फैला हुआ था। कहानी का मूल केंद्र यह यक्ष प्रश्न खड़ा करता है कि वर्षों से एक ही साए में साथ रहने वाले पड़ोसी अचानक धर्म की वेदी पर एक-दूसरे के जानी दुश्मन कैसे बन जाते हैं। इस उथल-पुथल के बीच कहानी के मुख्य नायक सिकंदर मिर्जा का आगमन होता है। जब चारों ओर कट्टरता और उन्मादी भीड़ का कब्जा हो जाता है, तब सिकंदर अपनी जान की परवाह किए बिना एक असहाय और बुजुर्ग हिंदू महिला 'माई' का रक्षक बन खड़ा होता है। सिकंदर का यह साहसी कदम उस दौर की जहरीली राजनीति और नफरत को सीधी चुनौती देता है। फिल्म का यह पहलू एक मुस्लिम पुरुष और एक वृद्ध हिंदू महिला के बीच अनायास ही पनपे पवित्र मां-बेटे के आत्मीय संबंध को इतनी खूबसूरती से दर्शाता है कि दर्शक भावुक हो उठते हैं।
सनी देओल और शबाना आजमी का अविस्मरणीय अभिनय
अभिनय के मोर्चे पर यह फिल्म अपने कलाकारों के उत्कृष्ट प्रदर्शन की वजह से नई ऊंचाइयों को छूती है। पिछले कुछ समय से सनी देओल के करियर को लेकर कमबैक की चर्चाएं होती रही हैं, लेकिन इस फिल्म में वह एक बिल्कुल ही अलग और अप्रत्याशित रूप में सामने आते हैं। निर्देशक राजकुमार संतोषी ने सनी देओल की पारंपरिक 'एक्शन स्टार' वाली उग्र छवि से हटकर उनकी खामोशी और आंखों की लाचारी का अद्भुत इस्तेमाल किया है। सिकंदर के किरदार में सनी देओल अपनी चीख-पुकार के बजाय अपनी शांत गरिमा और रोती हुई आंखों से दर्शकों को रुलाने में पूरी तरह सफल रहते हैं। वहीं दूसरी ओर, शबाना आजमी ने 'माई' के किरदार में अपनी अदाकारी से जान फूंक दी है। उनके अभिनय में जिद्दीपन, मिठास, गहरी समझ और अपनी मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम का ऐसा अनूठा संगम दिखता है कि हर दर्शक उनसे सीधा जुड़ाव महसूस करने लगता है। शबाना आजमी पर्दे पर सिर्फ एक किरदार नहीं लगतीं, बल्कि भारतीय परिवारों की किसी आदरणीय दादी या नानी की जीवंत छवि प्रस्तुत करती हैं।
सहयोगी कलाकारों का संतुलन और प्रभावी प्रदर्शन
फिल्म में मुख्य जोड़ी के अलावा सहयोगी स्टारकास्ट ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है। सनी देओल जैसी विशाल स्क्रीन प्रेजेंस वाले स्थापित अभिनेता के सामने युवा कलाकार करण देओल अपनी एक अलग और प्रभावकारी पहचान बनाने में सफल रहे हैं। करण देओल ने अपने पिता की अभिनय शैली की नकल करने के बजाय अपने किरदार में अद्भुत ईमानदारी, ठहराव और आत्मविश्वास दिखाया है। इसके साथ ही, अभिनेत्री प्रीति जिंटा की स्क्रीन पर उपस्थिति पूरी फिल्म में एक अनोखी गर्माहट और सकारात्मकता घोल देती है। अभिनेता अली फजल का शांत और परिपक्व किरदार कहानी को एक बेहतरीन संतुलन प्रदान करता है। वहीं, खलनायक की भूमिका में अभिमन्यु सिंह ने 'याकूब पहलवान' के रूप में कट्टरता और सांप्रदायिक उन्माद के भयानक और खौफनाक चेहरे को बेहद असरदार ढंग से पर्दे पर उतारा है।
राजकुमार संतोषी का निर्देशन और तकनीकी भव्यता
निर्देशक राजकुमार संतोषी ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वह सिर्फ धमाकेदार एक्शन और कोर्टरूम ड्रामा के ही उस्ताद नहीं हैं, बल्कि मानवीय भावनाओं के सुक्ष्म पहलुओं को पर्दे पर उकेरने की भी उनमें अद्वितीय क्षमता है। संतोषी ने यह पूरी सावधानी बरती है कि विभाजन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर आधारित यह फिल्म किसी भी प्रकार के सांप्रदायिक एजेंडे या भड़काऊ माहौल का शिकार न बने। फिल्म का पहला हाफ धीरे-धीरे किरदारों की पृष्ठभूमि तैयार करता है और दर्शकों को 1947 के यथार्थवादी वातावरण में स्थापित करता है। वहीं फिल्म का दूसरा हाफ इतना तीव्र और भावनात्मक है कि दर्शकों को हतप्रभ कर देता है। फिल्म का प्रोडक्शन डिजाइन और सिनेमैटोग्राफी अंतरराष्ट्रीय स्तर की लगती है। पुरानी गलियां, पुराने मकान, जलते हुए बाजार और उस जमाने की पोशाकें दर्शकों को सीधे 1947 के दौर में ले जाती हैं।
संगीत, संपादन और अंतिम निर्णय
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर इसकी आत्मा को और अधिक मजबूती प्रदान करता है। तनाव और हिंसा वाले दृश्यों में संगीत बेचैनी बढ़ाता है, जबकि सिकंदर और माई के भावनात्मक क्षणों में पार्श्व में बजने वाली उदास धुनें दर्शकों की आंखें नम कर देती हैं। हालांकि, फिल्म में कुछ मामूली कमियां भी नजर आती हैं। किरदारों को स्थापित करने के चक्कर में फिल्म का पहला हाफ कुछ स्थानों पर थोड़ा धीमा महसूस होता है। यदि संपादन की मेज पर 10 से 15 मिनट की कटौती की जाती, तो फिल्म की गति और अधिक कसी हुई हो सकती थी। इसके अलावा कुछ दृश्यों में 90 के दशक का हल्का मेलोड्रामा दिखाई देता है। इसके बावजूद, 'बंटवारा 1947' एक ऐतिहासिक दस्तावेज से बढ़कर इंसानियत का गहरा संदेश देती है। यह फिल्म 5 में से 3.5 स्टार की हकदार है और इस साल की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में शुमार होती है।


















