श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर नेपाल के भीतर एक बड़ा चमत्कार देखने को मिला है। नेपाल में लगभग 170 मीटर की गहराई पर बनी एक सुरंग के अंदर पिछले दस दिन से फंसे दो पनबिजली कर्मियों को कल सकुशल बाहर निकाल लिया गया। इस सुरंग के भीतर सूरज की रोशनी तक नहीं पहुंच पाती थी और चारों तरफ सिर्फ कीचड़ भरा हुआ था। वहां न तो पीने के लिए पानी उपलब्ध था, न ही खाने को कुछ था और न ही सांस लेने के वास्ते पर्याप्त हवा थी। ऐसे हालात में भी दस दिन तक जीवित बचे रहना किसी चमत्कार से कम नहीं माना जा रहा है।
अंधेरे और कीचड़ के बीच दस दिन का संघर्ष
जिस स्थान तक पहुंचने के लिए बचाव दलों को दिन-रात लगातार मेहनत करने के बाद बमुश्किल एक छोटा सा रास्ता बनाना पड़ा, वहां कोई इंसान इतने लंबे समय तक कैसे जीवित रह सकता है, यह बात रेस्क्यू ऑपरेशन्स के विशेषज्ञों को भी हैरान कर रही है। हालांकि, जिन लोगों की जान बची है, उनका साफ कहना है कि यह सब ईश्वर की कृपा और उनकी माया का परिणाम है। वे सुरंग के भीतर लगातार महामंत्र हरे कृष्ण का जाप करते रहे और इसी के सहारे उन्हें नया जीवन मिला है। इस सफलता के बाद राहत दलों की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं, क्योंकि इसी सुरंग में अभी लगभग चालीस और लोगों के फंसे होने की आशंका है। इसके चलते बचाव अभियान को और अधिक तेज कर दिया गया है ताकि एक बार फिर कोई चमत्कार देखने को मिल सके।
संजय साह और कबीर महर्जन की अद्भुत कहानी
तीस वर्ष के संजय साह को दस दिन बीत जाने के बाद मलबे और कीचड़ से भरी टनल से सुरक्षित बाहर निकाला गया, और उनके तुरंत बाद पैंतालीस वर्ष के कबीर महर्जन को भी सही सलामत बाहर ले आया गया। ये दोनों लोग पिछले 26 अगस्त को आई भयंकर और विनाशकारी बाढ़ के बाद से ही त्रिशूली 3-A टनल के भीतर फंसे हुए थे। उस समय न तो किसी को इनकी सटीक लोकेशन का पता था और न ही इनके साथ किसी प्रकार का कोई संपर्क हो पा रहा था। किसी को यह भनक तक नहीं थी कि सुरंग के भीतर फंसे लोगों में से कोई जीवित भी बचा है या नहीं।
कर्तव्यनिष्ठा और जीवन की अदम्य इच्छा
दस दिन बीत जाने के बाद भी संजय साह और कबीर महर्जन के पास जीने की अदम्य इच्छाशक्ति और भगवान के प्रति अटूट भरोसा था। इसी सहारे उनकी सांसे चलती रहीं। ये दोनों नेपाल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के कर्मचारी हैं, जिनमें संजय साह मैकेनिकल फोरमैन के पद पर हैं और कबीर महर्जन मैकेनिकल सुपरवाइज़र हैं। घटना के समय संजय साह त्रिशूली 3-A हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के कंट्रोल रूम के भीतर काम संभाल रहे थे। कंट्रोल रूम में होने के कारण ही खतरे की चेतावनी सबसे पहले उन्हीं तक पहुंची थी।
बचाव अभियान और विशेषज्ञों की भूमिका
संजय साह के पास वहां से भागने का पूरा मौका था, लेकिन उन्होंने अपनी जान बचाने के बजाय अपने साथियों को समय रहते आगाह किया और उन्हें तुरंत बाहर निकल जाने के लिए कहा। उनके कहने पर कई लोग बाहर निकल आए, लेकिन जब तक संजय खुद सुरंग से बाहर निकलने का प्रयास करते, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पूरी सुरंग में गाद और भारी-भरकम पत्थरों का मलबा भर चुका था। दस दिन बाद जब संजय ने बाहर आकर सूरज की रोशनी देखी, तो डॉक्टरों ने पाया कि उनके सभी vital parameters बिल्कुल ठीक हैं, हालांकि लगातार दस दिन तक भूखे-प्यासे रहने की वजह से वह काफी कमजोर अवश्य हो गए हैं। संजय ने बताया कि उनके आसपास छह लोग और थे और वे लगातार आपस में बातचीत करते रहते थे। इस बेहद मुश्किल घड़ी में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और लगातार महामंत्र का जाप करते हुए ईश्वर से रक्षा की प्रार्थना करते रहे।
विशेषज्ञों की राय और अंतरराष्ट्रीय सहायता
विशेषज्ञों का यह मानना है कि टनल का जो हिस्सा विशेष तौर पर मेंटेनेंस के लिए तैयार किया जाता है, उसके ऊपरी हिस्से में मौजूद लोगों के बचे रहने की संभावना सबसे ज्यादा होती है क्योंकि वहां प्राकृतिक एयर का फ्लो लगातार बना रहता है। नेपाल के इस हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की तीन अलग-अलग सुरंगों में मलबा भरा हुआ है, और वहां युद्धस्तर पर बचाव अभियान चलाया जा रहा है। इस राहत कार्य में नेपाली सेना, भारतीय सेना, चीनी सेना और कोरियन सेना के जवान पूरी ताकत से जुटे हुए हैं। इसके अलावा प्रसिद्ध ऑस्ट्रेलियन जियोलॉजिस्ट अर्नोल्ड डिक्स की विशेषज्ञता भी इस अभियान में ली जा रही है। अर्नोल्ड डिक्स वही जाने-माने इंजीनियर हैं जिन्होंने उत्तराखंड की सिल्क्यारा सुरंग में फंसे 41 मजदूरों को सकुशल बाहर निकालने वाले बचाव दल का नेतृत्व किया था।
गोल्डलॉक्स जोन की अहमियत
अर्नोल्ड डिक्स ने स्पष्ट किया कि जो दो लोग टनल से सुरक्षित बाहर निकले हैं, वे असल में टनल के गोल्डलॉक्स जोन में मौजूद थे। किसी भी दुर्घटना के वक्त यही विशेष जोन सबसे अधिक सुरक्षित माना जाता है। गोल्डलॉक्स जोन टनल के सबसे ऊपरी हिस्से में स्थित होता है और इसे इस खास तरीके से डिजाइन किया जाता है कि अंदर की परिस्थितियां जीवित रहने योग्य बनी रहें। बचाव दल ने सबसे पहले इसी जोन तक पहुंचने के लिए रास्ता तलाश किया था। संजय साह और कबीर महर्जन के परिवार वालों को इन तमाम तकनीकी बातों से कोई लेना-देना नहीं है। उन्हें तो बस इस बात की गहरी संतुष्टि और खुशी है कि उनके अपने परिजन सुरक्षित लौट आए हैं, और इसके साथ ही बाकी बचे हुए लोगों के भी जीवित मिलने की उम्मीद काफी मजबूत हो गई है।
भारतीय सेना का कौशल और जन्माष्टमी का संयोग
इस पूरे ऑपरेशन में भारतीय सेना की स्पेशल टनल रेस्क्यू यूनिट की दक्षता और कुशलता बेहद काम आई है। नया जीवन पाने वाले इन कर्मचारियों ने बताया कि वे संकट के उन पलों में लगातार महामंत्र हरे रामा, हरे कृष्णा का जाप कर रहे थे। यह एक अद्भुत संयोग ही था कि उन्हें ठीक कृष्ण जन्माष्टमी के पावन दिन पर ही सूरज की किरणें देखने को मिलीं और नया जीवन प्राप्त हुआ।
योगी आदित्यनाथ का ब्रज विकास का संकल्प
दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मथुरा के पवित्र कृष्ण जन्मभूमि मंदिर में पहुंचकर जन्माष्टमी का पर्व धूमधाम से मनाया। योगी ने वहां उपस्थित भक्तों पर फूलों की वर्षा की और उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि वे पूरी तरह निश्चिंत रहें, क्योंकि अयोध्या और काशी के बाद अब मथुरा की बारी है। उनकी सरकार अयोध्या और काशी की तर्ज पर ही कृष्ण जन्मभूमि को भी पूरी भव्यता के साथ सजाएगी और चमकाएगी। मुख्यमंत्री ने ऐलान किया कि उनकी सरकार ब्रज क्षेत्र में ठीक द्वापर युग जैसा वैभव वापस लाएगी और मथुरा, वृंदावन, गोकुल, बरसाना समेत पूरे ब्रज क्षेत्र का चहुंमुखी विकास किया जाएगा।
सनातन विरोधियों पर तीखा हमला
मुख्यमंत्री योगी ने सनातन धर्म के विरोधियों पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि जो लोग औरंगजेब और बाबर के समर्थक हैं तथा जो लगातार हिन्दुओं की आस्था की उपेक्षा करते हैं, उन्हें उनके कर्मों का उचित फल मिल रहा है और जनता ने उन्हें बिल्कुल गर्त में पहुंचा दिया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जो भी व्यक्ति सनातन संस्कृति का विरोध करेगा, उसकी दुर्गति ठीक कंस जैसी ही होगी। जन्माष्टमी के पावन अवसर पर देश भर के मंदिरों में जिस प्रकार की भारी भीड़ उमड़ रही है, उससे यह बात बिल्कुल पक्की हो जाती है कि चाहे शिवरात्रि हो, रामनवमी हो या फिर जन्माष्टमी, हर प्रमुख त्योहार पर मंदिरों में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। अयोध्या का भव्य राम मंदिर, काशी विश्वनाथ और महाकाल जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों का बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण हुआ है और वहां की व्यवस्थाओं में अभूतपूर्व सुधार किए गए हैं।
मथुरा और वृंदावन की चुनौतियां
मंदिरों में चाहे कितनी भी भारी भीड़ क्यों न उमड़ पड़े, आज के समय में उसे बेहद आसानी से संभाल लिया जाता है, लेकिन इसके मुकाबले मथुरा और वृंदावन इस मामले में अभी काफी पीछे हैं। कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री ने खुद वृंदावन जाकर बांके बिहारी जी के दर्शन किए थे, और वहां भीड़ इतनी ज्यादा थी कि उससे पार पाना बेहद मुश्किल साबित हुआ था, साथ ही मंदिर के रास्ते में बंदरों का भय भी बना रहता है। मथुरा और बरसाना की जमीनी हालात भी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं हैं। यही कारण है कि मुख्यमंत्री योगी ने पूरे ब्रज क्षेत्र में वैभव की छटा बिखेरने का संकल्प लिया है। यदि इस संपूर्ण इलाके का आधुनिक तरीके से विकास होता है, तो न केवल दुनिया भर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भगवान के दर्शन करना सुगम हो जाएगा, बल्कि इस पूरे क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे और आर्थिक संपन्नता के रास्ते खुलेंगे।
पवार परिवार का आंतरिक राजनीतिक टकराव
महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार के परिवार के भीतर चल रहा आपसी टकराव अब पूरी तरह खुलकर सतह पर आ गया है। शरद पवार की सुपुत्री सुप्रिया सुले ने कल एक बड़ा बयान देते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अजित दादा यानी अजित पवार की मृत्यु के पीछे के सच को जानने में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेताओं की कोई भी दिलचस्पी नहीं बची है। गत 28 फरवरी को एक विमान दुर्घटना में अजित पवार का असामयिक निधन हो गया था। इसके बाद से ही रोहित पवार और सुप्रिया सुले लगातार इस विमान दुर्घटना की परिस्थितियों पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं और औपचारिक रूप से FIR दर्ज करके निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।
सुप्रिया सुले और सुनेत्रा पवार के तीखे बोल
सुप्रिया सुले ने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि अजित पवार के निधन के इस संवेदनशील मामले में एनसीपी के तमाम बड़े नेता पूरी तरह खामोश बैठे हुए हैं। कोई भी यह पता लगाने की बिल्कुल कोशिश नहीं कर रहा है कि विमान हादसे की पुलिस जांच आखिरकार अभी तक कहां तक पहुंची है। सुप्रिया ने कहा कि उन्होंने अपना भाई खोया है, जबकि अजित पवार की पार्टी के अन्य नेता सत्ता का सुख भोगने में पूरी तरह मस्त हैं। सुप्रिया सुले के इन बयानों पर पलटवार करते हुए अजित पवार की पत्नी और महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने कहा कि अजित दादा के असामयिक निधन पर किसी भी प्रकार की गंदी राजनीति नहीं की जानी चाहिए, और जांच एजेंसियों को अपना काम करने के लिए थोड़ा समय तो अवश्य दिया जाना चाहिए।
परिवार के पुराने जख्म और रिश्ते
सुनेत्रा ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने अपना पति खोया है और उनके बेटों ने अपने पिता को खोया है, इसलिए परिवार के इस भारी दर्द को वही सबसे बेहतर ढंग से जानती हैं। वह खुद इस पूरी जांच प्रक्रिया की लगातार मॉनिटरिंग कर रही हैं, इसलिए इस गंभीर मामले में किसी भी तरह की गलत बातें न फैलाई जाएं तो ही बेहतर होगा। उल्लेखनीय है कि सुप्रिया सुले और सुनेत्रा पवार ने बारामती लोकसभा क्षेत्र में एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी मुकाबला लड़ा था। दोनों के बीच आपसी मतभेद पुराने हैं, लेकिन जब तक अजित दादा जीवित थे, उन्होंने इस परिवार को कभी टूटने नहीं दिया था। उन्होंने भले ही शरद पवार से अलग होकर अपनी अलग पार्टी बना ली थी, लेकिन अपने चाचा के साथ उन्होंने कभी अपने पारिवारिक रिश्ते खराब नहीं होने दिए थे।
पारिवारिक रिश्तों की मर्यादा
सुप्रिया ने भी उन्हें हमेशा 'दादा' कहकर ही संबोधित किया और कभी उनके खिलाफ सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा। महाराष्ट्र की राजनीति में पवार परिवार की एक बेहद सकारात्मक छवि बनी हुई थी कि चाहे वैचारिक और राजनीतिक मतभेद कितने भी गहरे क्यों न हों, व्यक्तिगत पारिवारिक रिश्ते कभी टूटने नहीं चाहिए। लेकिन अब ऐसा महसूस हो रहा है कि अजित दादा के इस दुनिया से चले जाने के बाद पुराने जख्मों को फिर से कुरेदा जा रहा है, जो कि इस पूरे परिवार के भविष्य के लिए बिल्कुल भी अच्छा संकेत नहीं है।
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