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नीट यूजी काउंसलिंग में बड़ा फर्जीवाड़ा, देहरादून में फर्जी दिव्यांगता सर्टिफिकेट लेकर पहुंचे छात्रउत्तराखंड
13 अक्तू॰ 2026, 10:15 am (24 दिन पहले)· 2

नीट यूजी काउंसलिंग में बड़ा फर्जीवाड़ा, देहरादून में फर्जी दिव्यांगता सर्टिफिकेट लेकर पहुंचे छात्र

देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज में नीट यूजी काउंसलिंग के दौरान दिव्यांग कोटे से प्रवेश पाने के लिए फर्जी सर्टिफिकेट का इस्तेमाल करने वाले कई अभ्यर्थी पकड़े गए हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की जांच में इन छात्रों की दिव्यांगता के दावे झूठे साबित हुए।

डॉक्टर बनने की चाह रखने वाले विद्यार्थियों के लिए नीट यूजी परीक्षा का सफर बेहद कठिन और प्रतिस्पर्धी होता है। परीक्षा में सफलता हासिल करने के बाद एमबीबीएस की एक-एक सीट हासिल करने के लिए तीखा संघर्ष करना पड़ता है। सामान्य और अन्य आरक्षित वर्गों में कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते कई छात्र मेडिकल या दिव्यांग कोटा यानी पीडब्ल्यूडी कोटे के जरिए नीट यूजी परीक्षा में शामिल होते हैं। काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान मिलने वाले इस आरक्षण से शारीरिक रूप से अक्षम और जरूरतमंद मेधावी विद्यार्थियों को आगे बढ़ने में मदद मिलती है।

लेकिन उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सामने आए एक हालिया प्रकरण ने मेडिकल काउंसलिंग की पारदर्शिता और व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक प्रमुख अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, नीट यूजी के तहत दिव्यांग कोटे की एमबीबीएस सीट पाने की चाहत में उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र के कुछ ऐसे छात्र देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज पहुंचे, जिन्होंने फर्जी दस्तावेजों के सहारे खुद को शारीरिक रूप से विकलांग साबित करने का प्रयास किया था। हालांकि, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की ओर से अधिकृत विशेषज्ञ डॉक्टरों के मेडिकल बोर्ड द्वारा की गई गहन जांच में यह पूरा फर्जीवाड़ा बेनकाब हो गया।

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दून मेडिकल कॉलेज में हुआ खुलासा और जांच प्रक्रिया

नीट यूजी काउंसलिंग के अंतर्गत दिव्यांग श्रेणी की एमबीबीएस सीट पर दावा पेश करने वाले अभ्यर्थी देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल पहुंचे थे। अस्पताल में डॉक्टर आरएस बिष्ट की अगुवाई में एक विशेष मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया था। इस बोर्ड में नेत्र रोग, अस्थि रोग यानी ऑर्थोपेडिक्स और अन्य तमाम विभागों के विशेषज्ञ चिकित्सक शामिल थे। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और महाराष्ट्र से कुल 18 अभ्यर्थी अपनी जांच करवाने के लिए आए थे। नेत्र रोग और ऑर्थो विभाग की जांच प्रक्रिया के दौरान कई ऐसे विद्यार्थी धरे गए जो कागजों में खुद को 40 से 50 प्रतिशत तक दिव्यांग बता रहे थे, जबकि वास्तविकता में वे पूरी तरह स्वस्थ और फिट पाए गए।

आंखों में कोई कमी नहीं फिर भी खुद को बताया दृष्टिबाधित

नेत्र रोग विभाग में सामने आए मामलों ने वहां मौजूद डॉक्टरों को भी हैरान कर दिया। इस विभाग में अपनी जांच कराने पहुंचे 3 अभ्यर्थियों, जिनमें उत्तराखंड के 2 छात्र और बिहार की 1 छात्रा शामिल थी, ने अपने प्रमाण पत्रों में खुद को 40 से 50 प्रतिशत तक दृष्टिबाधित दर्शाया था। लेकिन जब चिकित्सकों ने उनकी आंखों की क्लिनिकल और आधुनिक मशीनों से जांच की, तो उन्हें दीवार पर लगे चार्ट के छोटे अक्षर पढ़ने में किसी प्रकार की परेशानी नहीं हुई। मशीनी परीक्षणों की रिपोर्ट में भी उनकी आंखों में किसी भी प्रकार की दिव्यांगता की पुष्टि नहीं हो सकी।

पैरों की विकलांगता निकली सिर्फ बारह प्रतिशत और भागे छात्र

अस्थि रोग विभाग की जांच में भी बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। महाराष्ट्र से आई एक छात्रा ने अपने दस्तावेजों में पैरों की विकलांगता 40 प्रतिशत दिखाई थी, जबकि मेडिकल जांच में उसकी यह विकलांगता केवल 12 प्रतिशत ही निकली। यह आंकड़ा नीट काउंसलिंग के निर्धारित मानकों यानी न्यूनतम 40 प्रतिशत से काफी कम था। इसी तरह उत्तर प्रदेश से आई एक अन्य छात्रा ने 45 प्रतिशत दिव्यांगता का दावा किया था। जब डॉक्टरों ने उससे कड़ाई से पूछताछ की और उसके दस्तावेजों पर सवाल उठाए, तो वह अपनी जांच पूरी किए बिना ही वहां से रफूचक्कर हो गई। कई अन्य अभ्यर्थी भी मेडिकल बोर्ड की सख्ती को भांपते हुए बिना जांच कराए ही चले गए और दोबारा बोर्ड के सामने उपस्थित नहीं हुए।

फर्जी प्रमाण पत्र जारी करने वाले बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सवाल

इन तमाम अभ्यर्थियों को झूठे आंकड़ों और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी करने वाले चिकित्सा बोर्डों की कार्यप्रणाली पर भी अब बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। बिना किसी वास्तविक शारीरिक अक्षमता के आखिर ये फर्जी सर्टिफिकेट कैसे तैयार कर दिए गए? फिलहाल दून मेडिकल कॉलेज के मेडिकल बोर्ड ने जांच के बाद पात्र पाए गए 13 वास्तविक अभ्यर्थियों के प्रमाण पत्र पोर्टल पर अपलोड कर दिए हैं। इस तरह के गंभीर फर्जीवाड़े ने देश की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा की पारदर्शिता पर बदनुमा दाग लगा दिया है। यदि ऐसे मामलों में दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई नहीं की गई, तो वास्तव में हकदार और जरूरतमंद दिव्यांग छात्र अपनी वैध सीटों से वंचित रह जाएंगे।

सवाल-जवाब

नीट यूजी काउंसलिंग में किस मेडिकल कॉलेज में फर्जीवाड़ा पकड़ा गया?
यह फर्जीवाड़ा देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में पकड़ा गया है।
इस जांच के लिए किस तरह का मेडिकल बोर्ड बनाया गया था?
अस्पताल में डॉक्टर आरएस बिष्ट की अध्यक्षता में विशेष मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया था जिसमें नेत्र और हड्डी रोग विशेषज्ञ शामिल थे।
जांच के दौरान महाराष्ट्र से आई छात्रा की पैरों की विकलांगता कितनी पाई गई?
महाराष्ट्र से आई छात्रा ने पैरों की विकलांगता 40 प्रतिशत बताई थी जो जांच में केवल 12 प्रतिशत निकली।
दृष्टिबाधित होने का दावा करने वाले कितने छात्र पकड़े गए?
नेत्र रोग विभाग में 3 अभ्यर्थियों ने खुद को दृष्टिबाधित बताया था जो जांच में पूरी तरह फिट निकले।
जांच के बाद कितने असली अभ्यर्थियों के प्रमाण पत्र अपलोड किए गए?
दून मेडिकल कॉलेज के मेडिकल बोर्ड ने जांच में पात्र पाए गए 13 असली अभ्यर्थियों के प्रमाण पत्र अपलोड किए हैं।
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टिप्पणियाँ 5

Neha Verma@neha-verma·24 दिन पहले

डॉक्टर बनने की ऐसी क्या जल्दी थी कि लोग अपनी आँखें और पैर तक झूठे साबित करने पर उतर आए! पिछले साल जब मैं दून अस्पताल के पास एक फैशन शूट के सिलसिले में गई थी, तब वहाँ का माहौल बहुत शांत और व्यवस्थित लगा था। ऐसे होनहार युवा जो आगे चलकर लोगों की जान बचाते, अगर वे शुरुआत ही झूठ से करें तो उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है!

Ravikash Gupta@ravikash·24 दिन पहले

डॉक्टर बनने की होड़ में लोग इतनी नीचे गिर सकते हैं, सोचकर हैरानी होती है। जब फर्जीवाड़े से ही शुरुआत होगी, तो ये लोग आगे चलकर मरीजों का क्या भला करेंगे। सिस्टम की सख्ती बहुत जरूरी है, वरना असली हकदार पीछे रह जाएंगे।

Arjun Mehta@arjun-mehta·24 दिन पहले

रवि जी, आपकी बात बिल्कुल सही है। पर इतने फर्जी सर्टिफिकेट आखिर इन लोगों को बनाकर किसने दिए, क्या उन डॉक्टरों और एजेंटों पर भी कोई कार्रवाई होगी?

Rohan Verma@rohan-verma·24 दिन पहले

डॉक्टर बनने चले थे और पहले ही फर्जीवाड़ा पकड़ में आ गया। ऐसे लोग इलाज क्या करेंगे?

Karan Malhotra@karan-malhotra·24 दिन पहले

रोहन भाई, सही कहा आपने। क्रूरता और धोखाधड़ी का ऐसा खेल खेलने वाले कल को मरीज़ों की जान से भी खेलेंगे।

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