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नीट-यूजी प्रदर्शन जांच समिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया रुख, FIR दर्ज कराने की शक्ति केवल शीर्ष अदालत के पासभारत
11 सित॰ 2026, 11:05 am (20 दिन पहले)· 5

नीट-यूजी प्रदर्शन जांच समिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया रुख, FIR दर्ज कराने की शक्ति केवल शीर्ष अदालत के पास

जंतर-मंतर पर नीट-यूजी पेपर लीक विरोध-प्रदर्शन की जांच के लिए बनी उच्चस्तरीय समिति के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने साफ किया कि समिति एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकती और न ही इसके गठन में बदलाव किया जाएगा।

नीट-यूजी पेपर लीक के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों की जांच के लिए गठित उच्चस्तरीय जांच समिति के अधिकारों की सीमा तय करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि अदालत द्वारा बनाई गई पांच सदस्यीय समिति के पास एफआईआर दर्ज करने या आपराधिक जांच का आदेश देने का कानूनी अधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत ने दोहराया है कि किसी भी आपराधिक जांच का निर्देश देने की शक्ति सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के पास सुरक्षित है। इसके साथ ही अदालत ने जांच समिति के पुनर्गठन की मांग को भी सिरे से खारिज कर दिया है।

समिति के अधिकार और सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी

प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान समिति के काम करने के तरीके और दायरों को रेखांकित किया। अदालत ने कहा कि पूर्व जज आर. सुभाष रेड्डी की अगुआई वाली यह उच्चस्तरीय समिति केवल आरोपों की निष्पक्ष जांच करेगी, प्रभावित पीड़ितों की पहचान करेगी और अपनी सिफारिशें सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी। यदि जांच के दौरान आपराधिक मामला दर्ज करने की स्थिति बनती है, तो उस पर अंतिम निर्णय केवल शीर्ष अदालत ही लेगी।

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सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी सुनिश्चित किया कि समिति का संचालन अदालत की सीधी निगरानी में रहेगा। समिति को अपने कामकाज के दौरान आने वाली किसी भी व्यावहारिक या कानूनी अड़चन को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सामने आने की स्वतंत्रता दी गई है। इसके अलावा, समिति अपनी सहायता के लिए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एमिकस क्यूरी यानी न्याय मित्र या वकील नियुक्त करने का अधिकार भी रखेगी।

जनहित तंत्र, गवाहों की सुरक्षा और पहली बैठक

जांच प्रक्रिया को पारदर्शी और सुलभ बनाने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने समिति को कई विशेष अधिकार दिए हैं। समिति अपनी कार्यवाही का व्यापक प्रचार-प्रसार कर सकती है और आम जनता से सुझाव तथा आपत्तियां आमंत्रित कर सकती है। संवेदनशील गवाहों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, जो सीधे तौर पर समिति के सामने पेश होने में असहज महसूस करते हैं, उनके लिए एक अलग हेल्पलाइन और विशेष व्यवस्था बनाने की अनुमति दी गई है।

मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को सूचित किया कि इस उच्चस्तरीय जांच समिति की पहली औपचारिक बैठक 15 सितंबर 2026 को आयोजित होना प्रस्तावित है।

समिति के पुनर्गठन की मांग खारिज और वकीलों की दलीलें

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने समिति की संरचना पर सवाल उठाए। वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी, एन. हरिहरन, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी, प्रशांत भूषण और वृंदा ग्रोवर ने कई गंभीर मुद्दे उठाए। उन्होंने संवेदनशील गवाहों तक पहुंच, प्रभावितों के लिए अंतरिम मुआवजे की व्यवस्था, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन के कथित इस्तेमाल और दिल्ली पुलिस से जुड़ी निजी एजेंसियों द्वारा प्रदर्शनकारियों का डेटा एकत्र किए जाने पर गहरी चिंता जताई।

तमाम दलीलों को सुनने के बाद पीठ ने समिति की संरचना बदलने की मांग को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया। अदालत ने कहा कि चूंकि इस समिति का गठन स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने किया है, इसलिए इसके काम शुरू करने से पहले इसमें कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। हालांकि, पीठ ने यह छूट दी कि सभी पक्ष अपनी सामग्री, साक्ष्य और सुझाव सीधे समिति के समक्ष रख सकते हैं। यदि जांच प्रक्रिया आगे बढ़ने पर कोई नई समस्या सामने आती है, तो पक्षकार दोबारा सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल और मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा मामला जुलाई के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में नीट-यूजी परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर हुए उग्र प्रदर्शनों से जुड़ा है। जंतर-मंतर से संसद भवन तक निकाले गए मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच तीखी झड़पें हुई थीं, जिसमें दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर हिंसा का आरोप लगाया था। पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगे थे, तो वहीं प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षाकर्मियों पर हमले और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की शिकायतें आई थीं।

इससे पहले, 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए इन प्रदर्शनों से जुड़ी तमाम आपराधिक कार्यवाहियों पर रोक लगा दी थी। शीर्ष अदालत ने 20 से 25 जुलाई के बीच दर्ज हुई एफआईआर पर आगे की कार्रवाई रोक दी थी और नई एफआईआर दर्ज करने पर पाबंदी लगा दी थी। इसी पृष्ठभूमि में पूर्व न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति बनाई गई थी, जिसे लिखित सबूत, गवाहों के बयान और संवेदनशील गवाहों को संरक्षण देने के लिए गुमनाम शिकायतें भी स्वीकार करने का अधिकार दिया गया है।

सवाल-जवाब

क्या सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति खुद एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे सकती है?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उच्चस्तरीय समिति केवल जांच कर सिफारिशें दे सकती है, एफआईआर या आपराधिक जांच का आदेश केवल शीर्ष अदालत दे सकती है।
इस उच्चस्तरीय जांच समिति की अध्यक्षता कौन कर रहा है?
इस पांच सदस्यीय समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं।
क्या समिति के गठन में कोई बदलाव किया गया है?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने समिति के पुनर्गठन की मांग को खारिज कर दिया और कहा कि काम शुरू होने से पहले इसमें बदलाव नहीं होगा।
जांच समिति की पहली बैठक कब प्रस्तावित है?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अनुसार समिति की पहली बैठक 15 सितंबर 2026 को प्रस्तावित है।
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