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निठारी मामले के आरोपी सुरेंद्र कोली ने हरिद्वार में की खुदकुशी, आखिरी फोन कॉल में बयां किया था आर्थिक तंगी का दर्दउत्तराखंड
18 सित॰ 2026, 5:15 pm (4 दिन पहले)· 1

निठारी मामले के आरोपी सुरेंद्र कोली ने हरिद्वार में की खुदकुशी, आखिरी फोन कॉल में बयां किया था आर्थिक तंगी का दर्द

नोएडा के बहुचर्चित निठारी कांड के आरोपी रहे सुरेंद्र कोली का शव हरिद्वार में उनकी चाय की दुकान में फंदे से लटका मिला, मरने से ठीक पहले उन्होंने आर्थिक बेबसी जताई थी।

नोएडा के बहुचर्चित निठारी कांड के आरोपी 50 वर्षीय सुरेंद्र कोली का शव हरिद्वार में मिला है। पुलिस की शुरुआती जांच में सामने आया है कि उसने फांसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। अपनी गुजर-बसर के लिए हाईवे के किनारे एक छोटी सी चाय की टपरी चलाने वाले कोली ने मौत को गले लगाने से पहले अपने एक पुराने मददगार को फोन किया था। इस फोन कॉल पर उसने अपनी लाचारी और गंभीर आर्थिक तंगी का जिक्र किया था, लेकिन जब तक कोई उसकी मदद के लिए कदम उठा पाता, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

आखिरी फोन कॉल और आर्थिक तंगी का दबाव

अपनी जान देने से पहले सुरेंद्र कोली भारी मानसिक और आर्थिक तनाव से गुजर रहा था। अत्यंत परेशान होकर उसने अपने पुराने परिचित और पूर्व जिला पंचायत सदस्य नारायण सिंह रावत को फोन मिलाया। कोली ने रावत को बताया कि चाय के खोखे का मालिक पैसों के लिए उस पर लगातार दबाव बना रहा है और उसे परेशान कर रहा है। कोली की इस बेबसी को सुनने के बाद जब तक उसका कोई मददगार कुछ समझ पाता या उसकी सहायता के लिए पहुंच पाता, अगली सुबह वह अपनी ही चाय की टपरी में मृत अवस्था में पाया गया।

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पुलिस की तफ्तीश और मौके से मिले हालात

यह दुखद घटना हरिद्वार के एक हाईवे के किनारे स्थित चाय की दुकान के अंदर हुई। शुक्रवार दोपहर को वहां से गुजरने वाले कुछ राहगीरों ने कोली के शव को फंदे से लटका हुआ देखा, जिसके बाद तुरंत स्थानीय पुलिस को सूचित किया गया। हरिद्वार सिटी के सर्कल ऑफिसर शिशुपाल सिंह नेगी ने इस संबंध में बताया कि जानकारी मिलते ही पुलिस की एक टीम तुरंत मौके पर पहुंची और शव को फंदे से नीचे उतारा। घटनास्थल की बारीकी से जांच करने और वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने के लिए एक फोरेंसिक टीम को भी मौके पर भेजा गया था। अधिकारी नेगी के अनुसार, प्रथम दृष्टया यह मामला आत्महत्या का लग रहा है, हालांकि मृतक के कपड़ों या दुकान के अंदर से कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ है।

नई शुरुआत की एक नाकाम कोशिश

पिछले साल नवंबर महीने में देश की सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी मामले में सुरेंद्र कोली को बरी कर दिया था। जेल से बाहर आने के बाद कोली ने अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए करीब 10 दिन पहले ही हरिद्वार में चाय की एक छोटी सी टपरी शुरू की थी। वह इसी टपरी में काम करता था और रात को यहीं सोता भी था। लेकिन दुकान के मालिक द्वारा किराये और पैसों की लगातार मांग और अपनी लाचारी के कारण वह इस कदर टूट गया कि उसने मौत का रास्ता चुन लिया।

सवाल-जवाब

सुरेंद्र कोली कौन था?
सुरेंद्र कोली नोएडा के चर्चित निठारी कांड का आरोपी था, जिसे पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने उसके आखिरी मामले में बरी कर दिया था।
कोली का शव कब और कहां मिला?
कोली का शव शुक्रवार दोपहर को हरिद्वार में एक हाईवे के किनारे स्थित उसकी चाय की टपरी के अंदर लटका हुआ मिला।
कोली ने अपने आखिरी फोन कॉल में क्या कहा था?
अपने परिचित नारायण सिंह रावत को किए गए आखिरी फोन कॉल में कोली ने कहा था कि टपरी का मालिक पैसों के लिए उसे परेशान कर रहा है।
क्या पुलिस को कोई सुसाइड नोट मिला है?
नहीं, पुलिस को कोली के कपड़ों या दुकान के अंदर से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है, हालांकि शुरुआती जांच में यह आत्महत्या का मामला लग रहा है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ravikash Gupta@ravikash·2 दिन पहले

सुरेंद्र कोली की यह दुखद अंत यह उजागर करता है कि जेल से रिहा होने के बाद कैदियों के पुनर्वास और उनकी आजीविका की सुरक्षा के लिए हमारे सामाजिक और प्रशासनिक तंत्र में कितनी बड़ी खाई है। सुप्रीम कोर्ट से बरी होने के बाद भी एक व्यक्ति को यदि छोटी सी चाय की दुकान चलाने के लिए गंभीर आर्थिक तंगी और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़े, तो यह हमारी सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों की विफलता को दर्शाता है। यदि ऐसे मामलों में समय रहते संस्थागत वित्तीय सहायता या काउंसलिंग की व्यवस्था नहीं की जाती, तो समाज में इस तरह के तनाव और भी घातक परिणाम दे सकते हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·2 दिन पहले

सुरेंद्र कोली की यह दुखद मृत्यु हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली के बाद की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करती है। जब देश की सर्वोच्च अदालत से कोई व्यक्ति बरी होकर बाहर आता है, तो उसके पास गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार होता है। लेकिन सामाजिक बहिष्कार, रोजगार का अभाव और पुलिस व प्रशासनिक स्तर पर पुनर्वास की कोई ठोस नीति न होना ऐसे व्यक्तियों को फिर से हाशिए पर धकेल देता है। यह मामला साफ तौर पर यह रेखांकित करता है कि रिहाई के बाद कैदियों की मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग और आर्थिक सुरक्षा के लिए राज्य स्तर पर एक पुख्ता ढांचा होना बेहद जरूरी है, ताकि कोई भी व्यक्ति व्यवस्था की लाचारी का शिकार न बने।

Karan Malhotra@karan-malhotra·2 दिन पहले

यह घटना न्याय प्रणाली और रिहाई के बाद के पुनर्वास पर गंभीर सवाल उठाती है। बरी होने के बाद समाज में दोबारा घुलने-मिलने की राह कितनी कठिन होती है, यह इसका उदाहरण है। कानूनी लड़ाई से निकले व्यक्ति के लिए आजीविका का संकट और सामाजिक अलगाव उसे किस हद तक मानसिक तनाव दे सकता है, पुलिस और समाज दोनों को इस पर विचार करना होगा।

Rohan Verma@rohan-verma·2 दिन पहले

यह घटना न्याय प्रणाली से रिहा होने के बाद पूर्व कैदियों के पुनर्वास और सामाजिक स्वीकृति की गंभीर जमीनी सच्चाई को उजागर करती है। सुप्रीम कोर्ट से बरी होने के बावजूद, कानूनी आज़ादी के बाद का जीवन कितना संघर्षपूर्ण हो सकता है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसे अपनी आजीविका चलाने के लिए आर्थिक और मानसिक मोर्चे पर किन विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। इस मामले से यह सवाल भी खड़ा होता है कि ऐसे मामलों में राज्य स्तर पर कोई संस्थागत सहायता प्रणाली क्यों नहीं है, जो रिहाई के बाद कम से कम बुनियादी आजीविका और मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·2 दिन पहले

रोहन के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह मामला क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के उस अंधेरे पहलू को बेनकाब करता है जहाँ कानूनी बरी होने के बाद भी एक व्यक्ति को आजीवन सामाजिक बहिष्कार और अदृश्य सजा भुगतनी पड़ती है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी मामलों में दोषमुक्त किए जाने के बावजूद, सुरेंद्र कोली के पास न तो कोई पुलिस सुरक्षा थी और न ही पुनर्वास की प्रशासनिक व्यवस्था। एक चाय की टपरी चलाने वाले व्यक्ति का इस तरह अकेलेपन और आर्थिक दबाव में दम तोड़ना यह साबित करता है कि हमारी न्याय प्रणाली में रिहाई के बाद के प्रभावों से निपटने के लिए कोई मजबूत सुधारात्मक ढांचा मौजूद नहीं है, जो भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने के लिए बेहद जरूरी है।

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