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ओबीसी क्रीमी लेयर मामले में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया, क्या है 10 साल पुराना विवादभारत
25 अग॰ 2026, 9:21 am (37 दिन पहले)· 2

ओबीसी क्रीमी लेयर मामले में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया, क्या है 10 साल पुराना विवाद

ओबीसी क्रीमी लेयर के एक दशक पुराने मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर स्पष्टीकरण मांगा है। सरकार का कहना है कि फैसले से सिविल सेवा परीक्षा-2025 की अंतिम सूची और प्रशिक्षण प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी के अंतर्गत आने वाले क्रीमी लेयर का मुद्दा एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया है। यह पूरा विवाद संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सर्विसेज परीक्षा से जुड़ा हुआ है जो लगभग 10 साल पुराना है। उस दौरान कार्मिक विभाग ने यूपीएससी परीक्षा में सफलता हासिल करने वाले लगभग 100 ओबीसी उम्मीदवारों की उम्मीदवारी को क्रीमी लेयर का हवाला देते हुए रद्द कर दिया था। यह मामला लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद देश की सर्वोच्च अदालत तक जा पहुंचा था।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और केंद्र की याचिका

शीर्ष अदालत ने 11 मार्च 2026 को इन सभी प्रभावित उम्मीदवारों के दावों पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने स्पष्ट रूप से कहा था कि किसी भी उम्मीदवार के लिए क्रीमी लेयर की सीमा तय करने का पैमाना केवल उसकी आय यानी इनकम नहीं हो सकती है। अदालत ने केंद्र सरकार को इस पूरे विषय पर विचार करने के लिए छह महीने का समय दिया था। चूंकि यह समयसीमा सितंबर के महीने में समाप्त होने जा रही है, इसलिए कार्मिक विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दाखिल कर दी है। विभाग की तरफ से इस मामले में स्पष्ट दिशा-निर्देश और साफ निर्देश देने की मांग की गई है। देश भर में जब आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में बहस छिड़ी हुई है, तब सरकार का यह कदम काफी अहम माना जा रहा है।

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क्या है सिविल सेवा परीक्षा-2025 का पेंच

केंद्र सरकार ने अपनी याचिका के जरिए अदालत को बताया है कि इस आदेश का असर सिविल सेवा परीक्षा-2025 के परिणामों पर पड़ सकता है। सरकार के मुताबिक, श्रेणी-वार मेरिट लिस्ट और उम्मीदवारों को सेवा का आवंटन करने की प्रक्रिया को अंतिम रूप देने में यदि फेरबदल करना पड़ा, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे। सुप्रीम कोर्ट का 11 मार्च का यह फैसला सिविल सेवा परीक्षा-2025 का अंतिम रिजल्ट आने के ठीक पांच दिन बाद सामने आया था।

प्रशिक्षण और वरिष्ठता पर पड़ सकता है असर

सरकार ने अदालत के सामने चिंता जताई है कि यदि इस स्तर पर मेरिट और सर्विस एलोकेशन की सूची को दोबारा से तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की जाती है, तो इसका सीधा असर नए बैच के अधिकारियों के प्रशिक्षण यानी ट्रेनिंग पर पड़ेगा। इसके अलावा इससे प्रशासनिक अधिकारियों की वरिष्ठता यानी सिनियरिटी और उनके वेतन निर्धारण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। सरकार ने दलील दी है कि इस पूरी प्रक्रिया में बदलाव करने से एक कैस्केडिंग इफेक्ट यानी ऊपर से नीचे तक असर पड़ेगा, जिससे नियुक्ति से जुड़े कई अन्य स्तर भी बाधित हो सकते हैं। इसी बड़ी प्रशासनिक जटिलता को देखते हुए केंद्र ने अदालत से उचित और स्पष्ट निर्देश जारी करने का आग्रह किया है।

सवाल-जवाब

ओबीसी क्रीमी लेयर का यह मामला कितने साल पुराना है?
यह मामला लगभग 10 साल पुराना 2015-16 का है, जो यूपीएससी सिविल सर्विसेज परीक्षा से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को क्या आदेश दिया था?
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा था कि ओबीसी श्रेणी के लिए क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल आय के आधार पर नहीं किया जा सकता है।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका क्यों दाखिल की है?
केंद्र ने सिविल सेवा परीक्षा-2025 की अंतिम सूची और प्रशिक्षण प्रक्रिया में देरी के असर से बचने के लिए स्पष्टीकरण मांगा है।
कितने उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित किया गया था?
कार्मिक विभाग ने क्रीमी लेयर के आधार पर लगभग 100 सफल उम्मीदवारों की उम्मीदवारी खारिज कर दी थी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·36 दिन पहले

इस एक दशक पुराने मामले में केंद्र की याचिका महज प्रशासनिक स्पष्टीकरण की मांग नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था और कार्यपालिका के बीच समन्वय का गंभीर कानूनी प्रश्न है। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने आय को ही एकमात्र पैमाना न मानने का निर्देश दिया है, इसलिए सिविल सेवा परीक्षा-2025 के परिणामों में संशोधन से उत्पन्न होने वाला कैस्केडिंग इफ़ेक्ट वरिष्ठता और प्रशिक्षण को प्रभावित करेगा। यदि अदालत समयसीमा नहीं बढ़ाती, तो सरकार को सेवा आवंटन और मेरिट सूची के पुनर्गठन में भारी कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, जिसका सीधा असर प्रशासनिक तंत्र की स्थिरता पर पड़ेगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·36 दिन पहले

यह कानूनी गतिरोध केवल यूपीएससी-2025 के परिणाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य की आरक्षण नीतियों और सामाजिक न्याय के निर्धारण में मील का पत्थर साबित होगा। यदि शीर्ष अदालत सितंबर की समयसीमा पर पुनर्विचार नहीं करती है, तो सरकार को कैडर आवंटन और प्रशासनिक नियुक्तियों में नीतिगत बदलाव करने होंगे। इस मामले में कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच समन्वय आने वाले समय में नीतिगत सुधारों की दिशा तय करेगा।

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