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ओटीटी की अश्लीलता पर लगाम कसने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बनाया खास पैनल, मोहन भागवत ने उठाए थे तीखे सवालभारत
16 सित॰ 2026, 9:18 am (15 दिन पहले)· 0

ओटीटी की अश्लीलता पर लगाम कसने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बनाया खास पैनल, मोहन भागवत ने उठाए थे तीखे सवाल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर परोसी जा रही विवादित सामग्री से निपटने के लिए एक अनौपचारिक समिति का गठन किया है। यह समूह सरकार को विस्तृत प्रस्ताव सौंपने से पहले कानूनी विशेषज्ञों से चर्चा करेगा।

डिजिटल माध्यमों पर प्रसारित होने वाली आपत्तिजनक और बोल्ड सामग्री के बढ़ते चलन पर अंकुश लगाने के इरादे से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अब सक्रिय कदम उठाया है। संघ के सर्वोच्च पदाधिकारियों द्वारा इस तरह की डिजिटल सामग्री को सामाजिक और नैतिक मूल्यों के लिए नुकसानदायक बताए जाने के बाद, इस सांस्कृतिक प्रदूषण से मुकाबले के वास्ते एक विशेष अनौपचारिक समूह का गठन किया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ महीने पहले अस्तित्व में आए इस पैनल ने अपनी पहली महत्वपूर्ण बैठक भी पिछले महीने संपन्न कर ली है।

इस विशेष अनौपचारिक समिति में शिक्षा जगत और सांस्कृतिक संगठनों से ताल्लुक रखने वाले वरिष्ठ प्रचारकों के साथ-साथ विभिन्न विश्वविद्यालयों के पूर्व कुलपति भी शामिल किए गए हैं। संघ से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यह समूह गहन विचार-विमर्श के उपरांत एक व्यापक और विस्तृत प्रस्ताव तैयार करेगा। इस दस्तावेज को अंतिम रूप देने के बाद केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और शासन के अन्य संबंधित विभागों के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

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पारिवारिक ताने-बाने को सुरक्षित रखने और नई पीढ़ी को बचाने के लिए कड़े नियमों की मांग उठाई जा रही है। संघ का स्पष्ट मानना है कि वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर जिस प्रकार की अनियंत्रित और अवांछित सामग्री परोसी जा रही है, वह भारतीय परिवारों विशेषकर युवाओं की मानसिक स्थिति पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। पैनल का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने वाली फिल्मों की भांति डिजिटल माध्यमों के लिए भी एक कड़े सेंसर बोर्ड जैसी संस्था का होना अनिवार्य किया जाए।

समिति से जुड़े सूत्रों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस अनौपचारिक समूह के कामकाज के लिए फिलहाल कोई सख्त समय-सीमा तय नहीं की गई है। सरकार के पास अपनी अंतिम सिफारिशें भेजने से पहले यह पैनल देश के जाने-माने कानूनी विशेषज्ञों, न्यायविदों और संविधान के जानकारों से भी विचार-विमर्श करेगा। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि भविष्य में प्रस्तावित नियमों को किसी भी तरह की कानूनी उलझनों से बचाया जा सके और एक ठोस व्यवस्था बनाई जा सके।

इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में मोहन भागवत का वह बयान है जो उन्होंने 12 अक्टूबर, 2024 को नागपुर में अपने वार्षिक विजयादशमी संबोधन के दौरान दिया था। उस अवसर पर संघ प्रमुख ने डिजिटल माध्यमों पर परोसी जाने वाली सामग्री पर तीखा हमला बोलते हुए कहा था, “OTT प्लेटफॉर्म पर जिस तरह की चीजें दिखाई जाती हैं, वे इतनी घिनौनी होती हैं कि उनके बारे में बात करना भी अशोभनीय होगा… इसे कानून के जरिए रेगुलेट करने की जरूरत है क्योंकि यह नैतिक पतन के बड़े कारणों में से एक है।” उन्होंने समाज में फैल रही इस कथित विकृति के लिए सीधे तौर पर स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स को जिम्मेदार ठहराया था।

संघ के भीतरूनी सूत्रों ने यह जानकारी भी साझा की है कि इस पैनल के गठन का निर्णय मुख्य रूप से कुटुंब प्रबोधन गतिविधियों से प्राप्त फीडबैक के आधार पर लिया गया है। यह संघ का एक ऐसा अभियान है जिसका मुख्य उद्देश्य पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों का पुनरुद्धार करना, विभिन्न पीढ़ियों के बीच आपसी रिश्तों को मजबूत करना और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना है। पदाधिकारियों का मानना है कि डिजिटल माध्यम आज के दौर में नैतिक मूल्यों के क्षरण के प्रमुख स्रोतों में तब्दील हो चुके हैं।

पारंपरिक व्यवस्था की बात करें तो सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने वाली फिल्मों को सिनेमैटोग्राफ एक्ट, 1952 के प्रावधानों के तहत सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन से प्रमाण पत्र प्राप्त करना अनिवार्य होता है, जिसे सामान्य बोलचाल में सेंसर बोर्ड कहा जाता है। इसके विपरीत, वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के कंटेंट के लिए ऐसी कोई पूर्व-प्रमाणन नियामक संस्था अस्तित्व में नहीं है। यह सामग्री मुख्य रूप से इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी रूल्स, 2021 और संबंधित आईटी तथा आपराधिक कानूनों के दायरे में आती है। जानकारों द्वारा इन डिजिटल माध्यमों के विनियामक ढांचे में मौजूद कमियों का मुद्दा समय-समय पर उठाया जाता रहा है।

इस बीच सरकारी स्तर पर भी सख्त कदम उठाए जा रहे हैं। इस साल 22 जुलाई को सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री एल. मुरुगन ने संसद के निचले सदन लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी थी कि सरकार ने अश्लील सामग्री प्रसारित करने तथा आईटी अधिनियम, भारतीय न्याय संहिता की धारा 294 और महिलाओं के अश्लील चित्रण अधिनियम की धारा 4 का उल्लंघन करने के आरोप में पिछले दो वर्षों के दौरान देश में 50 ऐसे प्लेटफॉर्म्स को सार्वजनिक पहुंच से पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है।

सवाल-जवाब

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ओटीटी सामग्री से निपटने के लिए क्या कदम उठाया है?
संघ ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर परोसी जा रही विवादित सामग्री पर नकेल कसने के लिए एक गोपनीय अनौपचारिक पैनल का गठन किया है।
इस अनौपचारिक पैनल में किन लोगों को शामिल किया गया है?
इस समूह में शिक्षा और संस्कृति से जुड़े वरिष्ठ प्रचारकों के अलावा कई विश्वविद्यालयों के पूर्व कुलपतियों को शामिल किया गया है।
संघ का यह पैनल अपनी सिफारिशें किसे सौंपेगा?
यह पैनल व्यापक विचार-विमर्श के बाद एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार करेगा जिसे केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और अन्य संबंधित विभागों को सौंपा जाएगा।
मोहन भागवत ने ओटीटी कंटेंट के बारे में क्या कहा था?
मोहन भागवत ने 12 अक्टूबर, 2024 को नागपुर में कहा था कि ओटीटी पर दिखाई जाने वाली चीजें इतनी घिनौनी होती हैं कि उन्हें कानून के जरिए रेगुलेट किया जाना चाहिए।
सरकार ने पिछले दो वर्षों में कितने ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को बंद किया है?
सरकार ने नियमों के उल्लंघन के चलते पिछले दो वर्षों में 50 ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को पब्लिक एक्सेस के लिए बंद कर दिया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Meera Joshi@meera-joshi·14 दिन पहले

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारित सामग्री का सीधा असर युवाओं की मानसिक स्थिति, व्यवहारिक बदलाव और पारिवारिक संवाद पर पड़ता है। एक वेलनेस और रिश्ते विशेषज्ञ के रूप में मेरा मानना है कि केवल कड़े नियमों या बाहरी सेंसरशिप से भावनात्मक कल्याण और सामाजिक मूल्यों की रक्षा पूरी तरह संभव नहीं है। ओटीटी सामग्री के प्रभावों को संतुलित करने के लिए डिजिटल साक्षरता, माइंडफुल उपभोग और परिवारों के भीतर खुले संवाद की संस्कृति को बढ़ाना होगा। नियामक व्यवस्थाओं के साथ-साथ अगर घरों में आपसी जुड़ाव मजबूत होगा, तभी युवाओं का मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य सुरक्षित रह सकेगा।

Ravikash Gupta@ravikash·14 दिन पहले

डिजिटल मनोरंजन उद्योग के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर कड़े नियमन या सेंसरशिप की मांग एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। यदि इन सिफारिशों के आधार पर सरकार कोई सख्त संस्थागत नियम बनाती है, तो इससे भारत के तेजी से बढ़ते स्ट्रीमिंग बाजार में विदेशी और घरेलू निवेशकों की विषय-सामग्री रणनीति और अनुपालन लागत पर सीधा असर पड़ेगा। हालांकि, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक मूल्यों के संतुलन को साधते हुए किसी भी नए वैधानिक तंत्र को बनाना और उसे कानूनी समीक्षा से बचाना नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी संवैधानिक चुनौती होगी।

Pooja Bhatt@pooja-bhatt·14 दिन पहले

रविकाश जी के आर्थिक और कानूनी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए, स्वास्थ्य पत्रकारिता के नज़रिए से हमें इस मुद्दे के मानसिक स्वास्थ्य पहलू पर ध्यान देना होगा। अनियंत्रित और अत्यधिक आक्रामक या यौन सामग्री का निरंतर प्रदर्शन किशोरों और युवाओं में डिजिटल तनाव, व्यवहारिक संवेदनहीनता और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को जन्म दे सकता है। प्रस्तावित नियामक ढांचे को केवल प्रशासनिक प्रतिबंधों तक सीमित रखने के बजाय वैज्ञानिक आयु-वर्गीकरण, डिजिटल वेलनेस और मनोवैज्ञानिक प्रभावों के मूल्यांकन को शामिल करना चाहिए ताकि सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा हो सके।

Karan Malhotra@karan-malhotra·14 दिन पहले

यह कदम नीतिगत और विधिक दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील है। जब पैनल अपनी सिफारिशें संस्कृति मंत्रालय को सौंपेगा, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(2)) और सेंसरशिप के दायरे पर अदालतों में लंबी कानूनी बहस छिड़ सकती है। कानूनी विशेषज्ञों से विचार-विमर्श का यह निर्णय यह दर्शाता है कि संघ इस प्रस्ताव को न्यायिक चुनौतियों से सुरक्षित रखना चाहता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·14 दिन पहले

करण मल्होत्रा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह ध्यान देना आवश्यक है कि जब यह प्रस्ताव संस्कृति मंत्रालय तक पहुँचेगा, तब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के वर्तमान नियमों के साथ इसका समन्वय बिठाना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती होगी। यदि डिजिटल माध्यमों के लिए किसी नए कड़े सेंसर बोर्ड के गठन की सिफारिश होती है, तो यह मौजूदा आईटी नियमों और ओटीटी के लिए बने वर्तमान स्व-नियामक ढांचे के ठीक विपरीत होगा, जिससे शासन स्तर पर नीतिगत विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

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