देश की व्यस्त सड़कों पर पैदल चलने वालों के साथ होने वाली दुर्घटनाएं निरंतर गंभीर चिंता का विषय बनी रहती हैं। हाल ही में राजधानी दिल्ली के खजूरी फ्लाईओवर के नजदीक 55 साल की एक महिला जब सड़क पार कर रही थीं, तब वह दुर्भाग्यपूर्ण हादसे का शिकार हो गईं। सामने आई जानकारी के अनुसार पहले उन्हें एक तेज रफ्तार मोटरसाइकिल ने टक्कर मारी और संतुलन बिगड़ने पर वह पीछे से आ रहे एक ट्रक की चपेट में आ गईं, जिससे मौके पर ही उनकी जान चली गई। इस दुखद प्रसंग ने एक बार फिर उस पेचीदा कानूनी सवाल को केंद्र में ला खड़ा किया है कि जब भी सड़क पार करते वक्त कोई पैदल राहगीर वाहन की चपेट में आता है, तो कानून की नजर में मूल गलती किसकी मानी जाएगी। क्या हर परिस्थिति में वाहन चालक ही जिम्मेदार होता है, या फिर पैदल यात्री की लापरवाही भी कानूनी रूप से जवाबदेही तय करने में देखी जाती है।
सड़क पर पैदल चलने वालों की सुरक्षा को लेकर तय नियम
भारत में वर्ष 2017 में लागू किए गए मोटर व्हीकल्स (ड्राइविंग) रेगुलेशन्स में पैदल यात्रियों को यातायात व्यवस्था का एक अनिवार्य और संवेदनशील अंग घोषित किया गया है। इन विधिक प्रावधानों के अंतर्गत किसी भी चार पहिया अथवा दो पहिया वाहन को चलाने वाले व्यक्ति तथा उसमें सवार अन्य लोगों पर यह स्पष्ट दायित्व सौंपा गया है कि वे सड़क पर मौजूद पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों, नन्हे बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों एवं दिव्यांगजनों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। नियम स्पष्ट करते हैं कि यदि कोई ऐसा स्थान आता है जहां लोग सड़क पार कर रहे हों और वहां कोई इलेक्ट्रॉनिक ट्रैफिक सिग्नल स्थापित न हो, तो वहां पहुंचते ही चालक को अपने वाहन की गति धीमी कर लेनी चाहिए। इसके साथ ही यदि परिस्थिति मांग करे तो वाहन को पूरी तरह रोककर सड़क पार कर रहे नागरिक को पहले सुरक्षित निकलने का अवसर देना अनिवार्य है। इसके अलावा सड़कों के किनारे पैदल चलने के उद्देश्य से बनाए गए फुटपाथ अथवा साइकिल चलाने के लिए निर्धारित विशेष पथ पर कोई भी मोटर वाहन नहीं चलाया जा सकता, जब तक कि मौके पर तैनात ट्रैफिक पुलिस अधिकारी द्वारा विशेष निर्देश न दिया गया हो या सिग्नल से इसकी स्पष्ट अनुमति न मिले।
पेडेस्ट्रियन या जेब्रा क्रॉसिंग पर चालकों का विधिक कर्तव्य
सड़कों पर सफेद धारियों से चिह्नित जेब्रा क्रॉसिंग या पेडेस्ट्रियन क्रॉसिंग का निर्माण राहगीरों को सुरक्षित तरीके से रास्ता पार कराने के लिए किया जाता है। मोटर वाहन नियमों के अनुसार जब भी कोई वाहन चालक ऐसी क्रॉसिंग के समीप पहुंचता है, तो उसे असाधारण सतर्कता बरतनी होती है। यदि चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल लगा हो, तो वाहन को हमेशा निर्धारित स्टॉप लाइन और जेब्रा क्रॉसिंग से पहले ही रोकना आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि सिग्नल पर हरी बत्ती जल चुकी हो और वाहन चलने की स्थिति में आ गए हों, लेकिन कोई पैदल व्यक्ति पहले से ही उस क्रॉसिंग या चौराहे के भीतर कदम रख चुका हो, तो वाहन चालक को अपनी गाड़ी आगे बढ़ाने के बजाय उस राहगीर को रास्ता पार करने की प्राथमिकता देनी होगी। कानूनी जांच के दौरान अदालतें यह बारीक पड़ताल करती हैं कि टक्कर के ठीक पहले पैदल यात्री की भौतिक स्थिति कहां थी और वाहन किस दिशा व ढंग से नियंत्रित किया जा रहा था।
गलत जगह से सड़क पार करने पर कैसे तय होता है कसूर
आम तौर पर यह धारणा रहती है कि गलत जगह से बिना क्रॉसिंग के सड़क पार करने वाले व्यक्ति की ही सारी गलती मान ली जाएगी, परंतु न्यायिक प्रक्रिया में सिर्फ इसी एक पहलू के आधार पर अंतिम फैसला नहीं होता। किसी भी दुर्घटना के पश्चात पुलिस और न्यायिक जांच के दौरान कई परस्पर जुड़े तथ्यों का विश्लेषण किया जाता है। इसमें देखा जाता है कि जिस स्थान पर हादसा हुआ वहां कोई वैकल्पिक फुटब्रिज, सबवे या ट्रैफिक सिग्नल मौजूद था अथवा नहीं, वाहन की वास्तविक गति कितनी तेज थी, और क्या चालक के पास ब्रेक लगाकर या स्टेयरिंग मोड़कर वाहन को संभालने का यथेष्ट समय था। कानून के व्यावहारिक सिद्धांतों के तहत यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि केवल चालक ही नहीं बल्कि पीड़ित राहगीर ने भी अनुचित स्थान से अचानक दौड़कर असावधानी बरती थी, तो अदालत दोनों पक्षों के आचरण का समग्र मूल्यांकन कर आनुपातिक दायित्व तय करती है। अतः किसी भी घटना के घटित होते ही बिना जांच यह मान लेना गलत है कि सारा दोष केवल चालक का है या केवल पैदल यात्री का।
लापरवाही साबित होने पर चालक के विरुद्ध कठोर कानूनी धाराएं
यदि जांच एजेंसियों की पड़ताल में यह तथ्य पुष्ट हो जाता है कि वाहन चालक ने तेज रफ्तार, उतावलेपन अथवा खतरनाक अंदाज में गाड़ी चलाई जिससे किसी व्यक्ति का जीवन संकट में पड़ा या उसे शारीरिक चोट पहुंची, तो उसके खिलाफ BNS की धारा 281 के अंतर्गत अभियोग दर्ज किया जाता है। इस धारा में सार्वजनिक मार्ग पर उतावलेपन से गाड़ी चलाने को दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया है। वहीं यदि चालक के ऐसे घोर उपेक्षापूर्ण कृत्य के परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और वह अपराध गैर-इरादतन हत्या के दायरे में नहीं आता, तो BNS की धारा 106(1) के कड़े प्रावधान लागू होते हैं। BNS की धारा 106(1) के तहत दोषी पाए जाने वाले वाहन चालक को अधिकतम 5 साल तक के कारावास की सजा और आर्थिक जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
हादसा होने के तत्काल बाद चालक के कानूनी दायित्व
सड़क पर किसी व्यक्ति को टक्कर लगने अथवा वाहन से क्षति पहुंचने की दशा में मोटर व्हीकल्स एक्ट की धारा 134 के तहत चालक या वाहन के प्रभारी पर अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां डाली गई हैं। ऐसे समय चालक का यह विधिक कर्तव्य है कि वह घायल व्यक्ति को अविलंब प्राथमिक उपचार दिलाने के समुचित प्रबंध करे और यदि आवश्यक हो तो उसे तुरंत निकटतम अस्पताल या चिकित्सक के पास पहुंचाए। इसके अतिरिक्त, घटना की सूचना और मांगी गई समस्त जानकारियां चालक को बिना विलंब किए और अधिकतम 24 घंटे की निर्धारित समयसीमा के भीतर संबंधित निकटतम पुलिस थाने में दर्ज करानी होती हैं। इन कर्तव्यों की अनदेखी करना अपने आप में कानून का उल्लंघन माना जाता है।
पीड़ित एवं परिजनों के लिए वित्तीय मुआवजे के प्रावधान
मोटर व्हीकल्स एक्ट में सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों अथवा उनके आश्रितों को त्वरित आर्थिक राहत प्रदान करने के लिए व्यापक क्षतिपूर्ति तंत्र तैयार किया गया है। कानून की धारा 164 के अंतर्गत यदि किसी वाहन के उपयोग से हुई दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है, तो उसके वैध उत्तराधिकारियों को 5 लाख रुपये की एकमुश्त राहत राशि दिए जाने का प्रावधान है, जबकि गंभीर रूप से घायल होने की स्थिति में पीड़ित को 2.5 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाता है। इस विशेष धारा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि क्लेम करने वाले पक्ष को वाहन मालिक अथवा चालक की कोई कानूनी गलती या उपेक्षा साबित करने की आवश्यकता नहीं होती। इसके अतिरिक्त अधिक राशि की क्षतिपूर्ति हेतु मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण अर्थात MACT की शरण ली जा सकती है, जिसकी स्थापना का अधिकार मोटर व्हीकल्स एक्ट की धारा 165 के अंतर्गत सक्षम अधिकारियों को प्रदान किया गया है।
सड़क हादसों में अंतिम जवाबदेही का समग्र निष्कर्ष
तमाम वैधानिक धाराओं और अदालती नजीरों के अध्ययन से यह साफ हो जाता है कि पैदल यात्री और वाहन के बीच होने वाले हादसे में पहले से किसी एक पक्ष को दोषी करार नहीं दिया जा सकता। भारतीय न्याय व्यवस्था घटना की वास्तविक परिस्थितियों, दोनों पक्षों की तात्कालिक प्रतिक्रियाओं और मौके के भौतिक साक्ष्यों के संतुलन पर न्याय तय करती है। जहां राहगीरों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे निर्धारित नियमों का पालन करते हुए सतर्कता से सड़क पार करें, वहीं मोटर वाहनों के चालकों पर अन्य कमजोर सड़क उपयोगकर्ताओं की जिंदगी की हिफाजत करने का बेहद ऊंचा कानूनी दायित्व बना रहता है।


















