राजधानी दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में रविवार को हुई एक दर्दनाक घटना ने शहरी बुनियादी ढांचे की पोल खोलकर रख दी है। करीब 50 साल पुरानी और पांच मंजिलों वाली एक इमारत अचानक ताश के पत्तों की तरह ढह गई, जिसमें छात्रों के लिए पेइंग गेस्ट यानी पीजी चलाया जा रहा था। इस भीषण हादसे के बाद मलबे में दबे लोगों को निकालने के लिए लगभग 27 घंटे तक राहत और बचाव अभियान चलाया गया। आधिकारिक पुष्टि के अनुसार, इस दुर्घटना में 7 लोगों की मौत हो गई, जबकि 5 अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। हादसे के बाद से ही क्षेत्र में खौफ और अनिश्चितता का माहौल है। मलबे में दबे छात्रों और निवासियों की चीखें आज भी पड़ोसियों के कानों में गूंज रही हैं, जिससे भयभीत होकर कई छात्र अपने पीजी छोड़कर जा रहे हैं और सरकार से सुरक्षित सरकारी हॉस्टल की व्यवस्था करने की मांग उठा रहे हैं।
5 वर्षों में हादसों से 33 हजार से अधिक लोगों ने गंवाई जान
सत्य निकेतन की यह त्रासदी किसी एक स्थान तक सीमित विफलता नहीं है, बल्कि देश भर में फैल रही एक बड़ी समस्या का प्रतीक है। वर्ष 2020 से 2024 के बीच के 5 वर्षों के दौरान देशभर में इमारतें गिरने, आग लगने, तथा खुले गड्ढों या मैनहोल में गिरने जैसी घटनाओं के कारण 33,000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि इन जानलेवा हादसों में से एक बहुत बड़ा हिस्सा शहरी क्षेत्रों में दर्ज किया गया है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि हर साल हजारों मौतें ऐसे हादसों की वजह से होती हैं, जिन्हें अगर समय रहते उचित कदम उठाए जाते तो पूरी तरह रोका जा सकता था। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक मौतों का आंकड़ा इससे भी कहीं ज्यादा हो सकता है, क्योंकि नगर निकायों की सीमाओं के भीतर होने वाली सड़क दुर्घटनाओं और दूषित पेयजल के सेवन से होने वाली मौतों का व्यापक डेटा इन आंकड़ों में शामिल नहीं है।
सत्य निकेतन हादसे के कारण और पुलिस कार्रवाई
सत्य निकेतन इमारत हादसे की शुरुआती जांच में कई चौंकाने वाली कमियां सामने आई हैं। जांच अधिकारियों के अनुसार, 50 वर्ष पुरानी कमजोर संरचना में चल रहे मरम्मत कार्य, इमारत की जर्जर स्थिति और बेसमेंट में पानी भरने को इस दुर्घटना का मुख्य संभावित कारण माना जा रहा है। संरचनात्मक सुरक्षा की अनदेखी करके छात्रों की जान जोखिम में डालने के मामले में कड़ी कार्रवाई करते हुए पुलिस ने इमारत के मालिक परिवार के तीन सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया है। इस हादसे के बाद दिल्ली में जर्जर और अवैध रूप से चल रही इमारतों की स्थिति पर ठोस और प्रभावी प्रशासनिक कार्रवाई की मांग तेज हो गई है। छात्र और स्थानीय नागरिक प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि रिहायशी और व्यावसायिक इलाकों में सुरक्षा मानकों की नियमित जांच की जाए ताकि भविष्य में किसी अन्य इमारत के ढहने से बेकसूर लोगों को अपनी जान न गंवानी पड़े।
शहरी निकायों की सुस्ती और इंफ्रास्ट्रक्चर का संकट
देश के प्रमुख शहरों में सार्वजनिक बुनियादी ढांचे की स्थिति लगातार चिंताजनक होती जा रही है। विशेषज्ञों और सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि अगर सार्वजनिक संपत्तियों का नियमित रखरखाव किया जाता और निर्माण तथा सुरक्षा नियमों को सख्ती से लागू किया जाता, तो इन 33 हजार मौतों में से अधिकांश को टालना संभव था। केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि पड़ोसी शहर गुड़गांव और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के कई हिस्सों में हल्की बारिश के बाद जलभराव की गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाती है और सड़कों पर कचरे के विशाल ढेर जमा हो जाते हैं। यह स्थिति स्पष्ट रूप से यह दर्शाती है कि नगर निगम प्रशासन का ढांचा कितना लचर हो चुका है। असुरक्षित इमारतों का बेरोकटोक संचालन, सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की देखरेख में लापरवाही और सुरक्षा नियमों की खुलेआम अनदेखी ने शहरी नागरिकों के जीवन को खतरे में डाल दिया है।





















