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पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन से शुरू होगा ट्रेनों की बोगियों में कूड़ा-मुक्ति का नया प्रयोगभारत
6 सित॰ 2026, 1:38 pm (25 मिनट पहले)· 2

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन से शुरू होगा ट्रेनों की बोगियों में कूड़ा-मुक्ति का नया प्रयोग

भारतीय रेलवे ने एलएचबी कोच वाली प्रीमियम ट्रेनों में कूड़ा भरने की पुरानी दिक्कत दूर करने के लिए नया हाई कैपेसिटी सिस्टम तैयार किया है, जिसका ट्रायल पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन से शुरू होगा।

लंबी दूरी की प्रीमियम ट्रेनों में सफर करने वाले यात्रियों के लिए राहत की खबर है। बोगियों में जमा होकर फैलने वाले कूड़े की पुरानी समस्या को दूर करने के लिए एक नया सिस्टम तैयार किया गया है और इसका पहला ट्रायल उत्तर प्रदेश के पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन से शुरू किया जा रहा है।

छोटे डस्टबिन क्यों बन गए थे परेशानी की वजह

एलएचबी यानी लिंक हाफमैन बुश कोच वाली ट्रेनों में लगे डस्टबिन की क्षमता बहुत सीमित रही है। लंबी दूरी के सफर में यात्रियों की तादाद बढ़ने के साथ ये छोटे डस्टबिन जल्दी भर जाते हैं और उसके बाद कूड़ा बाहर फैलने लगता है। इससे बोगी की साफ-सफाई पर सीधा असर पड़ता है और सफाई कर्मचारियों को सफर के बीच में ही बार-बार डिब्बों में घुसकर कूड़ा हटाना पड़ता है। अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन जैसे बड़े स्टेशन से रोजाना करीब 100 पैसेंजर ट्रेनें गुजरती हैं और इनसे हर दिन लगभग 3 टन कूड़ा निकलता है।

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झांसी की वर्कशॉप ने बनाया 20 गुना बड़ी क्षमता वाला सिस्टम

इस दिक्कत का हल निकालने के लिए झांसी स्थित वैगन रिपेयर वर्कशॉप ने हाई कैपेसिटी कूड़ा संग्रह सिस्टम का प्रोटोटाइप तैयार किया है। मौजूदा डस्टबिन की क्षमता सिर्फ 18 लीटर है, जबकि नए सिस्टम में यह बढ़कर 367.4 लीटर तक पहुंच जाएगी। इसका मतलब है कि कूड़ा जमा करने की क्षमता में करीब 20.4 गुना का इजाफा होगा। इतनी बड़ी क्षमता मिलने के बाद बोगियों में कूड़ा जल्दी नहीं भरेगा और सफर के दौरान बार-बार सफाई की नौबत भी काफी हद तक घट जाएगी।

बिना अलग मशीन के, गुरुत्वाकर्षण से चलेगा पूरा सिस्टम

इस नई व्यवस्था की सबसे दिलचस्प बात यह है कि कूड़े को संग्रह टैंक तक पहुंचाने के लिए किसी अलग मशीन की जरूरत नहीं पड़ेगी। कोच के फर्श पर यात्रियों की पहुंच में एक डस्टबिन लगाया जाएगा। इसके ठीक नीचे एक सेंट्रल कनेक्टर लगेगा, जो कूड़े को कोच में फिट स्टील बॉक्स तक ले जाएगा। वहां से कूड़ा गुरुत्वाकर्षण बल की मदद से सीधे नीचे लगे संग्रह टैंक में गिर जाएगा। इस टैंक को ट्रेन के रखरखाव के समय ही खाली किया जाएगा, जिससे सफर के दौरान स्टाफ को डिब्बों में बार-बार जाकर कूड़ा समेटने की जरूरत नहीं पड़ेगी और पूरी सफाई व्यवस्था कहीं ज्यादा व्यवस्थित हो जाएगी।

राजधानी, दुरंतो से वंदे भारत तक को मिल सकता है फायदा

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन एक अहम स्टेशन है, जहां से रोजाना राजधानी, दुरंतो, नेताजी, विभूति, वंदे भारत और हिमगिरी जैसी एलएचबी कोच वाली प्रमुख ट्रेनें गुजरती हैं। फिलहाल यह सिस्टम प्रोटोटाइप और ट्रायल के स्तर पर ही है, लेकिन मंजूरी मिलने के बाद इसे इसी जंक्शन से गुजरने वाली बाकी सभी ट्रेनों में भी लगाए जाने की उम्मीद जताई जा रही है। अगर यह ट्रायल कामयाब रहा तो आगे चलकर देश की दूसरी प्रीमियम ट्रेनों में भी यही सिस्टम पहुंच सकता है, जिससे लंबी दूरी के सफर में सफाई को लेकर यात्रियों की शिकायतें काफी हद तक कम हो सकती हैं।

सवाल-जवाब

यह नया कूड़ा संग्रह सिस्टम सबसे पहले कहां शुरू होगा?
उत्तर प्रदेश के पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन से इसका ट्रायल शुरू किया जा रहा है।
मौजूदा डस्टबिन की क्षमता कितनी है और नई क्षमता कितनी होगी?
मौजूदा डस्टबिन 18 लीटर के हैं, जबकि नए सिस्टम में क्षमता बढ़कर 367.4 लीटर हो जाएगी, यानी करीब 20.4 गुना ज्यादा।
इस सिस्टम का प्रोटोटाइप किसने तैयार किया है?
झांसी स्थित वैगन रिपेयर वर्कशॉप ने इसका प्रोटोटाइप तैयार किया है।
कूड़ा टैंक तक कैसे पहुंचेगा?
डस्टबिन से सेंट्रल कनेक्टर और स्टील बॉक्स के जरिए गुरुत्वाकर्षण बल से कूड़ा सीधे संग्रह टैंक में गिरेगा, इसके लिए अलग मशीन की जरूरत नहीं होगी।
कौन-कौन सी ट्रेनों को इसका फायदा मिल सकता है?
राजधानी, दुरंतो, नेताजी, विभूति, वंदे भारत और हिमगिरी जैसी एलएचबी कोच वाली ट्रेनों को, जो पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन से गुजरती हैं।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन से रोजाना कितना कूड़ा निकलता है?
वहां से गुजरने वाली करीब 100 रोजाना ट्रेनों से लगभग 3 टन कूड़ा निकलता है।
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