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पासपोर्ट विवाद में डेढ़ दशक बाद आचार्य बालकृष्ण को अदालत से मिली क्लीन चिटउत्तराखंड
7 सित॰ 2026, 6:40 pm (60 दिन पहले)· 3

पासपोर्ट विवाद में डेढ़ दशक बाद आचार्य बालकृष्ण को अदालत से मिली क्लीन चिट

देहरादून की सीबीआई अदालत ने फर्जी दस्तावेजों से पासपोर्ट बनवाने के करीब डेढ़ दशक पुराने मामले में पतंजलि के सीईओ आचार्य बालकृष्ण को सभी आरोपों से बरी कर दिया है।

देहरादून की सीबीआई कोर्ट ने पतंजलि के सीईओ आचार्य बालकृष्ण को फर्जी दस्तावेजों के जरिए पासपोर्ट बनवाने के करीब डेढ़ दशक पुराने मामले में सभी आरोपों से बरी कर दिया है। यह फैसला देहरादून की तृतीय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने सुनाया, जिसमें उन पर लगी हर धारा और हर आरोप खारिज कर दिया गया।

मामला कैसे शुरू हुआ

2011 में आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ यह आरोप लगा कि वे मूलतः नेपाल के नागरिक हैं और उन्होंने फर्जी कागजातों के सहारे भारत का पासपोर्ट हासिल किया। यह शिकायत सामने आते ही मामला सुर्खियों में आ गया था। जांच आगे बढ़ने पर सीबीआई ने 2016 में इस सिलसिले में नेपाल सरकार से पत्राचार भी किया। एजेंसी ने बाद में आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और पासपोर्ट कानून की धाराओं में चार्जशीट दाखिल की। इसी जांच में एक शिक्षण संस्थान के तत्कालीन प्राचार्य नरेश चंद द्विवेदी को भी धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप में आरोपी बनाया गया था।

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शिकायत से एफआईआर तक का सफर

रिकॉर्ड के मुताबिक अप्रैल 2011 में आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ शिकायत मिली थी, जिसके आधार पर जून 2011 में सीबीआई ने प्रारंभिक जांच शुरू की और अगले महीने यानी जुलाई 2011 में विधिवत एफआईआर दर्ज कर दी गई। जांच एजेंसी का आरोप था कि बरेली के पासपोर्ट कार्यालय में पासपोर्ट के लिए जो शैक्षणिक प्रमाणपत्र जमा किए गए, वे असली नहीं थे। ये दस्तावेज बुलंदशहर जिले के खुर्जा कस्बे में स्थित राधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय से जुड़े बताए गए, जो वाराणसी के सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त था। शुरुआती जांच में ही इन प्रमाणपत्रों के रिकॉर्ड पर सवाल उठा दिए गए थे। दर्ज एफआईआर में आपराधिक साजिश की धारा 120-बी, धोखाधड़ी की धारा 420, फर्जी दस्तावेज तैयार करने से जुड़ी धाराएं 468 और 471, साथ ही पासपोर्ट अधिनियम के प्रावधान भी शामिल किए गए थे।

गिरफ्तारी, जमानत और जेल की सज़ा

मामला तूल पकड़ने पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जुलाई 2011 में आचार्य बालकृष्ण की गिरफ्तारी पर फिलहाल रोक लगा दी और उन्हें अपना पासपोर्ट अदालत में जमा कराने का निर्देश दिया। करीब एक साल बाद जांच पूरी होने पर सीबीआई ने जुलाई 2012 में विशेष अदालत में आरोपपत्र पेश किया। इसके बावजूद जब आचार्य बालकृष्ण अदालत में हाजिर नहीं हुए तो उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी करना पड़ा, जिसके चलते सीबीआई ने 20 जुलाई 2012 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद उन्हें देहरादून की सुद्धोवाला जेल में न्यायिक हिरासत में भेजा गया। करीब एक महीने जेल में गुजारने के बाद अगस्त 2012 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उन्हें शर्तों के साथ जमानत दे दी।

आरोप तय होने से लेकर ट्रायल तक

अक्टूबर 2013 में अदालत ने आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ आईपीसी की धारा 120-बी, 420, 468 और 471 के अलावा पासपोर्ट कानून के तहत औपचारिक रूप से आरोप तय किए। इन आरोपों को अदालत में चुनौती दी गई, जिसके बाद जून 2014 में सेशन कोर्ट के आदेश पर अगस्त 2014 में आरोपों में संशोधन कर दिया गया। इसके बाद मामले की सुनवाई सिर्फ आईपीसी की धारा 471 यानी जालसाजी और पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12(1)(बी) के तहत चली, जो जानबूझकर गलत सूचना देने या अहम तथ्य छिपाने से जुड़ी है।

पासपोर्ट की वापसी और अब बरी होने का फैसला

इस लंबी कानूनी लड़ाई के बीच 2018 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आचार्य बालकृष्ण को राहत देते हुए उनका पासपोर्ट लौटाने और उसे नवीनीकृत कराने की इजाजत दी थी। अब करीब डेढ़ दशक बाद देहरादून की तृतीय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने इस मामले में अंतिम फैसला सुनाते हुए आचार्य बालकृष्ण को हर आरोप और हर धारा से पूरी तरह बरी कर दिया है।

सवाल-जवाब

आचार्य बालकृष्ण पर क्या आरोप था?
उन पर आरोप था कि उन्होंने फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के आधार पर भारतीय पासपोर्ट बनवाया।
यह मामला कब शुरू हुआ था?
अप्रैल 2011 में शिकायत मिली, जून 2011 में प्रारंभिक जांच शुरू हुई और जुलाई 2011 में एफआईआर दर्ज हुई।
सीबीआई ने किन धाराओं में चार्जशीट दाखिल की थी?
सीबीआई ने आईपीसी की धारा 120-बी, 420, 468, 471 और पासपोर्ट अधिनियम की धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।
आचार्य बालकृष्ण को कब गिरफ्तार किया गया था?
उन्हें 20 जुलाई 2012 को गिरफ्तार कर सुद्धोवाला जेल, देहरादून भेजा गया था।
उन्हें जमानत कब मिली?
करीब एक महीने जेल में रहने के बाद अगस्त 2012 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उन्हें सशर्त जमानत दी थी।
नरेश चंद द्विवेदी कौन हैं?
वे एक शिक्षण संस्थान के पूर्व प्राचार्य हैं, जिन पर भी इस मामले में धोखाधड़ी और जालसाजी का आरोप लगा था।
अब अदालत का फैसला क्या है?
देहरादून की तृतीय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने आचार्य बालकृष्ण को सभी आरोपों और धाराओं से बरी कर दिया है।
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