फसल की बुवाई करते समय हर किसान के मन में बेहतर कमाई की उम्मीद होती है। कई अन्नदाता अपने गृह राज्य में लाभ न मिलने पर दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। उन्हें आस होती है कि नई जमीन पर मेहनत करने से कुछ बचत हो सकेगी, लेकिन खेती के जोखिम हर जगह एक जैसे ही बने रहते हैं। मौसम की बेरुखी और उपज का सही दाम न मिलना किसानों की राह हमेशा कठिन कर देता है। कई लोग साहूकारों या बैंकों से कर्ज लेकर खेती करते हैं, और ऐसे में फसल बर्बाद होने पर उनकी मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं। कुछ ऐसा ही दर्दनाक अनुभव बिहार के अररिया जिले से ताल्लुक रखने वाले और फरीदाबाद में खेती कर रहे किसान महादेव ऋषिदेव के सामने आया है।
तीस साल से कर रहे हैं फरीदाबाद में खेती
महादेव ऋषिदेव पिछले 30 सालों से फरीदाबाद में रहकर खेती का काम संभाल रहे हैं। उन्होंने बातचीत के दौरान अपनी बदहाली और संघर्ष की पूरी कहानी साझा की है। उन्होंने बताया कि इस बार उन्होंने एक एकड़ जमीन पर गोभी उगाने का फैसला किया था। खेत तैयार करने से लेकर बाजार से बीज खरीदने, महंगे खाद डालने, कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करने और लगातार सिंचाई करने तक में उन्हें बेहद श्रम करना पड़ा। इसके बावजूद उनकी मेहनत रंग नहीं लाई और फसल उम्मीद के बिल्कुल विपरीत रही। शुरुआत में गोभी की बुवाई के दौरान ही उन्हें बड़ा झटका लगा और भारी नुकसान उठाना पड़ गया।
दोबारा बुवाई से बढ़ा आर्थिक बोझ
पहली बार फसल बर्बाद होने के बाद महादेव ऋषिदेव ने हार नहीं मानी और दोबारा बाजार से बीज खरीदकर फिर से गोभी की रोपाई की। शुरुआती नुकसान को यदि जोड़ लिया जाए तो उन्हें कुल 25 से 30 हजार रुपये का सीधा घाटा हो चुका है। अब दोबारा खेती शुरू करने के कारण उन पर खर्च का बोझ और अधिक बढ़ गया है। महादेव ऋषिदेव का कहना है कि खेती के इस चक्र में उनका पहले ही काफी धन खर्च हो चुका है। अब दोबारा गोभी उगाने के लिए बीज, खाद और मजदूरों की मजदूरी पर भारी रकम चुकानी पड़ रही है।
लागत और खर्च का पूरा गणित
खेती से जुड़े खर्चों का विवरण देते हुए उन्होंने बताया कि केवल खाद और अन्य जरूरी कृषि सामान पर लगभग 24 हजार रुपये खर्च हो चुके हैं। इसके अलावा खेतों में काम करने वाले मजदूरों को भुगतान करने में करीब 5 से 10 हजार रुपये तक का खर्च आ जाता है। इस प्रकार इस पूरी खेती की प्रक्रिया में अब तक कुल खर्च लगभग 40 हजार रुपये तक पहुंच चुका है। इतनी सारी मेहनत और पूंजी झोंकने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इस बार फसल से उन्हें कितना मुनाफा मिल पाएगा।
फसल तैयार होने में अभी बाकी हैं दो महीने
महादेव ऋषिदेव के मुताबिक, खेत में दोबारा लगाई गई गोभी को पूरी तरह तैयार होने में अभी लगभग दो महीने का वक्त और लगेगा। इस फसल के लिए खेत की पांच से छह बार गहरी जुताई करवाई गई है। समय पर खाद डालने और लगातार सिंचाई करने में भी काफी पसीना बहाना पड़ा है। अब उन्हें थोड़ी उम्मीद बंधी है कि शायद इस बार फसल बेहतर होगी और उन्हें मंडी में उनकी उपज का उचित भाव मिल सकेगा। वर्तमान समय में बाजार की दुकानों पर गोभी करीब 40 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रही है, जबकि थोक मंडी में किसानों को केवल 20 से 22 रुपये किलो का ही भाव मिल पाता है।
कठिनाइयों से भरा जीवन और संघर्ष
महादेव ऋषिदेव जैसे मेहनतकश किसान खेतों में दिन-रात एक करके पसीना बहाते हैं, लेकिन उनकी अपनी निजी जिंदगी काफी तंगी और संघर्षों के बीच गुजरती है। फरीदाबाद में उनके खेत के पास ही उनका एक बहुत छोटा सा आशियाना है। आज के दौर में घर में रसोई गैस कनेक्शन होने के बावजूद वे चूल्हे पर ही खाना पकाने को मजबूर हैं। उनके पास रहने के लिए पर्याप्त जगह तक नहीं है। एक छोटे से बरामदे में चारपाई डालकर और उसके ऊपर केवल चादर की छत बनाकर वे अपनी पत्नी के साथ जीवन बिता रहे हैं। इसके बावजूद वे बेहतर भविष्य और खेती से अच्छी कमाई की उम्मीद में हर दिन कड़ा संघर्ष कर रहे हैं।
























