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पीएम मोदी से मिले बचपन के दोस्त असगर अली, विधायक नरेंद्र मेहता ने छोड़ा विवादित जमीन का कब्जाभारत
16 सित॰ 2026, 8:02 am (15 दिन पहले)· 2

पीएम मोदी से मिले बचपन के दोस्त असगर अली, विधायक नरेंद्र मेहता ने छोड़ा विवादित जमीन का कब्जा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद उनके 81 वर्षीय स्कूल के साथी असगर अली वोरा को बड़ी राहत मिली है। भाजपा विधायक नरेंद्र मेहता ने भायंदर स्थित 2810 वर्ग मीटर जमीन का कब्जा छोड़ने और शिकायत वापस लेने का फैसला किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन के एक साथी को प्रशासनिक दखल और मुलाकात के बाद बड़ी राहत हासिल हुई है। प्रधानमंत्री से मुलाकात के फौरन बाद उनके 81 साल पुराने सहपाठी की जमीन से जुड़ा विवाद अचानक सुलझता हुआ नजर आया। असगर अली वोरा ने प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर भायंदर में स्थित अपनी लगभग 2810 वर्ग मीटर जमीन पर कथित अवैध कब्जे की गुहार लगाई थी। इस मुलाकात के कुछ ही दिनों के भीतर भारतीय जनता पार्टी के विधायक नरेंद्र मेहता ने इस विवादित भूमि का कब्जा छोड़ने की सार्वजनिक घोषणा कर दी है। इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री के क्लासमेट असगर अली वोरा के विरुद्ध पुलिस में दर्ज कराई गई अपनी शिकायत को भी वापस लेने का औपचारिक फैसला लिया है।

वडनगर के दिनों की पुरानी दोस्ती और मुलाकात

यह पूरा मामला मीरा रोड निवासी 81 वर्षीय असगर अली वोरा से जुड़ा है, जिन्होंने हाल ही में अपने बचपन के स्कूल के साथी और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भेंट की थी। इस खास मुलाकात के दौरान उन्होंने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया था कि भायंदर में उनकीमती जमीन पर भारतीय जनता पार्टी के विधायक नरेंद्र मेहता की कंस्ट्रक्शन कंपनी ने कब्जा जमा लिया है। इस उच्च स्तरीय मुलाकात के कुछ ही दिनों बाद मंगलवार को भाजपा नेता ने खुद आगे आकर यह घोषणा की कि वह उस विवादित जमीन के कब्जे को पूरी तरह छोड़ रहे हैं और उस भूखंड पर निर्माण कार्य के लिए दी गई स्वीकृतियों को भी सरकार के समक्ष सरेंडर कर रहे हैं।

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सालों पुराना जमीन विवाद और खरीद-फरोख्त

असगर अली वोरा ने अपने शुरुआती जीवन में गुजरात के वडनगर स्थित बीएन स्कूल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक ही कक्षा में शिक्षा प्राप्त की थी। पुरानी दोस्ती का यह हवाला देते हुए वह बीते 8 सितंबर को प्रधानमंत्री से मिले थे और इस भूमि विवाद में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था। उन्होंने मीडिया और अधिकारियों को जानकारी दी थी कि उन्होंने वर्ष 1989 में भायंदर ईस्ट के नवघर इलाके में लगभग 2810 वर्ग मीटर जमीन के इस टुकड़े को खरीदा था। हालांकि उनके अनुसार साल 2011 में इस प्लॉट पर स्वयं बिल्डर्स और मेहता की कंपनी सेवन-इलेवन कंस्ट्रक्शन्स ने बलपूर्वक कब्जा कर लिया था जिसके बाद से यह कानूनी पचड़े में फंसा हुआ था।

प्रशासनिक बैठक और समाधान की ओर कदम

अपनी इस लंबी लड़ाई के बारे में बताते हुए असगर अली वोरा ने कहा कि वह करीब 15 वर्षों से लगातार विभिन्न सरकारी दफ्तरों और अधिकारियों के चक्कर काट रहे थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई उस मुलाकात के दौरान उन्हें अत्यंत सकारात्मक प्रतिक्रिया और आश्वासन मिला था। इस मुलाकात के तुरंत बाद प्रशासनिक अमले और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने इस पेचीदे मामले पर त्वरित कार्रवाई शुरू कर दी। इसी सिलसिले में मंगलवार को राज्य के मंत्रालय भवन में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव श्रीकर परदेशी द्वारा एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई। इस महत्वपूर्ण बैठक में असगर अली वोरा स्वयं उपस्थित रहे और उनके साथ विधायक नरेंद्र मेहता, मीरा-भायंदर म्युनिसिपल कमिश्नर राधा बिनोद शर्मा तथा टाउन प्लानर पुरुषोत्तम शिंदे ने भी हिस्सा लिया।

विधायक का लिखित पत्र और शिकायत वापसी

बैठक की कार्यवाही के दौरान विधायक नरेंद्र मेहता ने टाउन प्लानिंग डिपार्टमेंट को एक लिखित पत्र सौंपा। इस पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि वह विवादित जमीन का कब्जा छोड़ रहे हैं और इस प्लॉट पर मिली हुई समस्त कंस्ट्रक्शन मंजूरियों को वापस लेते हैं। मेहता ने अपने पत्र में यह भी सफाई दी थी कि यह जमीन उन्होंने वर्ष 2019 में मर्विन फर्नांडीस नामक व्यक्ति से खरीदी थी। इसके अलावा पुलिस कमिश्नर को संबोधित एक अन्य अलग पत्र में विधायक ने यह भी पुष्ट किया कि वह वोरा के खिलाफ की गई अपनी पुरानी पुलिस शिकायत को वापस ले रहे हैं क्योंकि दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से समझौता हो गया है।

सवाल-जवाब

असगर अली वोरा कौन हैं?
असगर अली वोरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 81 वर्षीय स्कूल के साथी हैं, जिन्होंने वडनगर के बीएन स्कूल में उनके साथ पढ़ाई की थी।
यह जमीन कहां स्थित है और इसका क्षेत्रफल कितना है?
यह विवादित जमीन भायंदर ईस्ट के नवघर इलाके में स्थित है और इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 2810 वर्ग मीटर है।
जमीन पर किसने कब्जा किया था?
असगर अली वोरा के अनुसार इस प्लॉट पर 2011 में स्वयं बिल्डर्स और भाजपा विधायक नरेंद्र मेहता की सेवन-इलेवन कंस्ट्रक्शन्स ने कब्जा कर लिया था।
नरेंद्र मेहता ने जमीन के बारे में क्या कदम उठाया है?
भाजपा विधायक नरेंद्र मेहता ने विवादित जमीन का कब्जा छोड़ने और उस पर कंस्ट्रक्शन के लिए मिली मंजूरी को सरेंडर करने का फैसला किया है।
मंत्रालय की बैठक में कौन-कौन अधिकारी शामिल थे?
इस बैठक में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव श्रीकर परदेशी, मीरा-भायंदर म्युनिसिपल कमिश्नर राधा बिनोद शर्मा और टाउन प्लानर पुरुषोत्तम शिंदे शामिल हुए थे।
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टिप्पणियाँ 5

Dr. Aditya Sharma@aditya-sharma·14 दिन पहले

यह मामला प्रशासनिक तंत्र की गहरी शिथिलता और राजनीतिक प्रभाव के द्वंद्व को उजागर करता है। जब १५ वर्षों तक सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने के बाद भी न्याय नहीं मिला, तब सीधे शीर्ष स्तर के हस्तक्षेप से ही समाधान संभव हो सका। यह घटना दर्शाती है कि भूमि स्वामित्व और अवैध कब्जे से जुड़े विवादों में स्थापित तंत्र अक्सर बेअसर साबित होता है। हालांकि इस विशिष्ट प्रकरण में राहत मिली है, लेकिन यह सवाल भी खड़ा होता है कि बिना राजनीतिक पहुंच वाले आम नागरिकों के ऐसे लंबे समय से लंबित भूमि विवादों का निपटारा पारदर्शी और त्वरित गति से कैसे सुनिश्चित किया जाएगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·14 दिन पहले

यह मामला शासन व्यवस्था और राजनीतिक प्रभाव की स्थिति को उजागर करता है। 15 वर्षों तक लटके प्रशासनिक मामले का एक उच्च-स्तरीय दखल से अचानक हल होना यह दर्शाता है कि आम नागरिकों के भूमि विवादों को सुलझाने में स्थानीय तंत्र कितना धीमा है। जब मामला शीर्ष नेतृत्व तक पहुँचा, तब सत्ताधारी दल के विधायक ने अपने दावे वापस लिए। यह घटना सामान्य नागरिक प्रशासन की कार्यप्रणाली और राजनीतिक दबाव से जुड़ी व्यवस्थागत चुनौतियों पर विचार करने को मजबूर करती है।

Vikram Yadav@vikram-yadav·14 दिन पहले

अर्जुन की बात बिल्कुल सही है। शासन और लोक नीति के दृष्टिकोण से यह घटना तंत्र की गहरी विफलता को रेखांकित करती है। जब किसी आम नागरिक के संपत्ति अधिकारों की रक्षा के लिए नगर निगम, पुलिस और राजस्व विभाग जैसे स्थानीय निकाय 15 साल तक निष्प्रभावी रहते हैं और केवल शीर्ष राजनीतिक हस्तक्षेप पर ही कार्रवाई होती है, तो इससे आम जनता का प्रशासनिक व्यवस्था से भरोसा उठता है। यह मामला दर्शाता है कि स्थानीय स्तर पर सत्ताधारी नेताओं के प्रभाव के आगे प्रशासनिक एजेंसियां पंगु बनी रहती हैं। कानून के शासन को प्रभावी बनाने के लिए संस्थागत जवाबदेही तय करनी होगी, ताकि न्याय के लिए किसी व्यक्तिगत पहुंच की आवश्यकता न पड़े।

Karan Malhotra@karan-malhotra·14 दिन पहले

यह मामला राजनीतिक रसूख और प्रशासनिक मशीनरी के बीच के महीन समीकरण को उजागर करता है। एक नागरिक को अपनी 1989 की खरीदी हुई संपत्ति और पंद्रह साल की कानूनी लड़ाई में न्याय पाने के लिए देश के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के सीधे हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी। यह स्थिति इस बात पर गंभीर सवाल उठाती है कि क्या आम आदमी के पास बिना उच्च स्तरीय पहुंच के कानूनी और प्रशासनिक तंत्र में न्याय पाने का कोई वास्तविक विकल्प शेष है।

Ravikash Gupta@ravikash·14 दिन पहले

यह घटना न केवल राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में व्यक्तिगत संबंधों के प्रभाव को दर्शाती है, बल्कि भारत के शहरी भू-बाजार और कॉरपोरेट-राजनीतिक गठजोड़ की वास्तविकताओं को भी बेनकाब करती है। जब एक संपत्ति विवाद को सुलझाने के लिए सीधे शीर्ष नेतृत्व के हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़े, तो यह निवेशकों, स्टार्टअप्स और रियल एस्टेट क्षेत्र में काम करने वाले छोटे कॉरपोरेट्स के लिए विधिक अनिश्चितता का एक बड़ा संदेश देता है। भविष्य में इस तरह के मामलों से डिजिटल भूमि रिकॉर्ड और पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बिना बाजार में निवेशकों का विश्वास डगमगा सकता है।

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