दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कथित जली हुई नकदी के मामले में सर्वोच्च अदालत ने प्राथमिकी दर्ज करने और विशेष जांच दल से जांच कराने की मांग वाली याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील की दलीलों पर कड़ा रुख अपनाया. जैसे ही याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष मामले की निष्पक्ष जांच और एफआईआर दर्ज करने का अनुरोध किया, पीठ ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की कि यह सब सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का प्रयास है. इसके साथ ही सर्वोच्च अदालत ने याचिका को आगे सुनने से इनकार करते हुए उसे निरस्त कर दिया.
अदालत में याचिकाकर्ता पक्ष द्वारा दी गई दलीलें
यह याचिका अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय की ओर से दाखिल की गई थी. उन्होंने अदालत में तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा कि जस्टिस यशवंत वर्मा भले ही अपने पद से त्यागपत्र दे चुके हों, लेकिन उनके सरकारी आवास से कथित तौर पर मिली बेहिसाब नकदी के मामले में उनकी आपराधिक जवाबदेही समाप्त नहीं हो जाती. वकील ने ध्यान दिलाया कि पूर्व में उनकी याचिका केवल तकनीकी आधार पर निरस्त हुई थी क्योंकि उस समय कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी. अब विधिवत शिकायत दर्ज करा दी गई है, इसलिए मामले की जांच आवश्यक है. याचिकाकर्ता के वकील ने यह भी तर्क दिया कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश लोक सेवक की श्रेणी में आते हैं और सेवा से हटने या सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्हें आपराधिक अभियोजन से कोई विशेष छूट प्राप्त नहीं होती. हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने इन तर्कों को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया और याचिका को पब्लिसिटी का माध्यम बताते हुए खारिज कर दिया.
सरकारी आवास पर आग लगने से जुड़ा पूरा घटनाक्रम
यह पूरा विवाद 14 मार्च की उस घटना से जुड़ा है, जब जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास में अचानक आग लग गई थी. जिस समय यह हादसा हुआ, उस वक्त जस्टिस वर्मा और उनकी पत्नी मध्य प्रदेश के दौरे पर थे, जबकि घर पर उनकी बेटी और बुजुर्ग मां मौजूद थीं. आग पर काबू पाने के दौरान और उसके बाद बड़ी मात्रा में नकदी बरामद होने तथा जले हुए नोटों का वीडियो सामने आने से हड़कंप मच गया था. इसके बाद भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए. हालांकि, जस्टिस वर्मा ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों का खंडन करते हुए इसे अपने खिलाफ रची गई एक गहरी साजिश करार दिया था.
जांच समिति की रिपोर्ट और त्यागपत्र का घटनाक्रम
मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने तीन सदस्यीय आंतरिक जांच समिति का गठन किया था. इस समिति ने अपनी गहन जांच रिपोर्ट सौंपने के बाद जस्टिस वर्मा को पद छोड़ने अथवा संसद में महाभियोग की कार्रवाई का सामना करने का विकल्प दिया था. जब शुरुआत में उन्होंने पद त्यागने से इनकार किया, तो जांच रिपोर्ट को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजा गया, जिससे पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू हो गई. बाद में लोकसभा अध्यक्ष ने भी जजेज इंक्वायरी कमेटी गठित करके जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाया था. इस बीच सर्वोच्च न्यायालय ने भी जांच में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था. आखिरकार, इसी वर्ष अप्रैल के महीने में जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया, जिससे महाभियोग प्रक्रिया संपन्न होने से पहले ही उनका कार्यकाल समाप्त हो गया.



















