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राजस्थान के पाली में 976 साल पुराना लाखोटिया महादेव मंदिर और संत चंदनपुरी की अद्भुत गाथाराजस्थान
12 सित॰ 2026, 3:12 pm (13 दिन पहले)· 0

राजस्थान के पाली में 976 साल पुराना लाखोटिया महादेव मंदिर और संत चंदनपुरी की अद्भुत गाथा

राजस्थान के पाली में 976 वर्ष प्राचीन लाखोटिया महादेव मंदिर का जल संकट, एक लाख ऊंटों से तालाब खुदाई, सोने के सिक्कों और संत चंदनपुरी की जीवित समाधि से जुड़ा ऐतिहासिक विवरण।

राजस्थान के पाली जिले में स्थित लाखोटिया महादेव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह करीब 976 वर्षों के समृद्ध इतिहास और जनसेवा का प्रतीक है। प्राचीन काल में पल्लीपुर के नाम से पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र में जब भयंकर जल संकट गहराया था, तब एक महान संत के प्रयासों से न केवल पीने के पानी का स्थायी समाधान हुआ, बल्कि एक ऐसी दिव्य परंपरा की शुरुआत हुई जिसे आज भी स्थानीय लोग पूरी श्रद्धा के साथ याद करते हैं।

सूखे का प्रकोप और एक लाख ऊंटों से तालाब का निर्माण

आज से लगभग 972 वर्ष पूर्व पल्लीपुर में लोगों को भीषण पेयजल संकट का सामना करना पड़ रहा था। पानी की इस बूंद-बूंद किल्लत को समाप्त करने के लिए जूना मठ के पूज्य संत चंदनपुरी महाराज आगे आए। उन्होंने जनहित में एक विशाल तालाब का निर्माण कराने का संकल्प लिया और पास में स्थित एक टेकरी पर पवित्र शिवलिंग की स्थापना की। लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, तालाब की खुदाई के दौरान मिट्टी हटाने और परिवहन कार्य के लिए लगभग 1 लाख ऊंटों को काम पर लगाया गया था। इतनी विशाल संख्या में ऊंटों के इस्तेमाल के कारण ही इस जल निकाय को लाखोटिया तालाब और मंदिर को लाखोटिया महादेव मंदिर का नाम मिला।

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सोने के सिक्कों की मजदूरी और कमल के पत्थर की सवारी

इस ऐतिहासिक निर्माण कार्य से कई चमत्कारी कथाएं भी जुड़ी हुई हैं। क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार, तालाब की खुदाई करते समय मिट्टी के बीच से रहस्यमयी ढंग से सोने के सिक्के निकला करते थे। संत चंदनपुरी महाराज इन सिक्कों को खुदाई में लगे मजदूरों के बीच उनकी दैनिक मजदूरी के रूप में वितरित कर देते थे। इसके अलावा, संत के नित्य नियम को लेकर भी एक अद्भुत प्रसंग प्रचलित है। कहा जाता है कि संत चंदनपुरी जूना मठ से लाखोटिया महादेव मंदिर तक शिवलिंग का जल से अभिषेक करने के लिए एक विशेष कमल के आकार के पत्थर पर सवार होकर जलाशय पार करते थे।

जूना मठ में संरक्षित प्राचीन धरोहरें

संत चंदनपुरी महाराज के जीवन से जुड़ी कई ऐतिहासिक और पवित्र वस्तुएं आज भी जूना मठ परिसर में संभालकर रखी गई हैं। इन धरोहरों में संत की चमत्कारी छड़ी, दो बड़े आकार के शंख, उनकी प्राचीन पवित्र धूणी, जलाशय पार करने वाला वही कमलनुमा पत्थर, चिलम, भाला और लकड़ी से निर्मित डमरू शामिल हैं। ये सभी वस्तुएं श्रद्धालुओं और इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।

भाई-बहन की समाधि की अलौकिक गाथा

संत चंदनपुरी महाराज अपने कड़े नियमों के लिए जाने जाते थे। वे महिलाओं का चेहरा नहीं देखते थे और जूना मठ के भीतर स्त्रियों के प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबंध था। एक दिन उनकी सगी बहन अन्नपूर्णा उनसे मिलने के उद्देश्य से मठ परिसर में आ पहुंचीं। जैसे ही संत की दृष्टि अपनी बहन के चेहरे पर पड़ी, उन्होंने अपने नियम टूटने के कारण जीवित समाधि लेने का कठोर निर्णय ले लिया। जब बहन अन्नपूर्णा को यह ज्ञात हुआ कि उनके आने की वजह से ही उनके भाई समाधि ले रहे हैं, तो उन्होंने भी ग्लानि और भ्रातृ-प्रेम में वहीं जीवित समाधि ले ली। जूना मठ परिसर में आज भी भाई और बहन दोनों के समाधि स्थल अगल-बगल मौजूद हैं।

सौंदर्यकरण के बीच जीर्णोद्धार की बांट जोहता ऐतिहासिक मठ

समय बीतने के साथ-साथ लाखोटिया तालाब और लाखोटिया महादेव मंदिर परिसर का तो लगातार सौंदर्यीकरण और विकास किया गया, लेकिन पाली को जल संकट से मुक्ति दिलाने वाले संत चंदनपुरी का मूल जूना मठ आज भी उपेक्षा का शिकार है। ऐतिहासिक महत्व का यह मठ जर्जर अवस्था में पहुंच चुका है और प्रशासनिक सुध की प्रतीक्षा कर रहा है। पाली के स्थानीय निवासी और श्रद्धालु लंबे समय से इस प्राचीन मठ के संरक्षण और जीर्णोद्धार की मांग उठा रहे हैं ताकि इस 976 साल पुरानी विरासत को सुरक्षित रखा जा सके।

सवाल-जवाब

लाखोटिया महादेव मंदिर राजस्थान के किस जिले में स्थित है?
लाखोटिया महादेव मंदिर राजस्थान के पाली शहर (प्राचीन पल्लीपुर) में स्थित है।
इस मंदिर और तालाब का इतिहास कितना पुराना है?
इस मंदिर और तालाब का इतिहास लगभग 976 साल पुराना है, जिसकी शुरुआत करीब 972 साल पहले हुई थी।
तालाब और मंदिर का नाम लाखोटिया क्यों पड़ा?
तालाब की खुदाई के दौरान मिट्टी ढोने के लिए लगभग 1 लाख ऊंटों का उपयोग किया गया था, इसलिए इसका नाम लाखोटिया पड़ा।
संत चंदनपुरी के जूना मठ में कौन सी ऐतिहासिक वस्तुएं रखी हैं?
जूना मठ में संत की छड़ी, दो बड़े शंख, प्राचीन धूणी, कमलनुमा पत्थर, चिलम, भाला और लकड़ी का डमरू सुरक्षित रखा है।
संत चंदनपुरी और उनकी बहन ने समाधि क्यों ली थी?
महिलाओं का चेहरा न देखने का नियम बहन के आगमन से टूटने पर संत ने जीवित समाधि ली, जिसके बाद उनकी बहन अन्नपूर्णा ने भी समाधि ले ली।
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