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रांची की रेशमा ने मकई और रागी से खड़ा किया कारोबार, घर बैठे फोन पर मिल रहे ऑर्डरझारखंड
31 अग॰ 2026, 7:19 am (25 दिन पहले)· 2

रांची की रेशमा ने मकई और रागी से खड़ा किया कारोबार, घर बैठे फोन पर मिल रहे ऑर्डर

रांची की रहने वाली रेशमा मकई और रागी से बने 50 से अधिक उत्पाद तैयार कर रही हैं। उनके बनाए बिस्कुट, लड्डू और नमकीन की इतनी मांग है कि वे अक्सर आउट ऑफ स्टॉक हो जाते हैं।

झारखंड की राजधानी रांची की रहने वाली रेशमा ने अपनी कड़ी मेहनत और हुनर के दम पर स्वरोजगार की एक अनूठी मिसाल पेश की है। वह घर पर ही मकई और रागी के विभिन्न उत्पाद तैयार करती हैं, जिन्हें लोगों द्वारा बेहद पसंद किया जा रहा है। उनके उत्पाद सूची में मकई के बिस्कुट, मकई के लड्डू, रागी के लड्डू, तरह-तरह के अचार और नमकीन के कई विकल्प शामिल हैं। अपने घर से ही इस काम को संचालित करते हुए वह कुल 50 से अधिक प्रकार की खाद्य सामग्री बनाती हैं।

बढ़ती मांग और फोन पर मिलते ऑर्डर

आज के समय में रेशमा के पास ग्राहकों की कोई कमी नहीं है। उनके द्वारा बनाए जाने वाले मकई के बिस्कुट और रागी से तैयार खाद्य पदार्थों की बाजार में इतनी भारी मांग है कि उनका स्टॉक अक्सर खत्म हो जाता है। लोग दुकानों के चक्कर काटने के बजाय उन्हें सीधे फोन पर ऑर्डर देते हैं। ग्राहकों की मांग को ध्यान में रखते हुए वह तैयार सामान को सीधे उनके घर तक पहुंचाने का काम करती हैं, जिससे उन्हें व्यापार में लगातार सफलता मिल रही है.

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दूसरी महिलाओं को भी बना रहीं आत्मनिर्भर

रेशमा केवल खुद को आर्थिक रूप से मजबूत नहीं कर रही हैं, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं। वह अब तक करीब 100 महिलाओं को विशेष प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। इसके अलावा, वह अपने सखी मंडल से जुड़ी महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने और उन्हें आगे बढ़ाने का काम करती हैं। उनका मुख्य उद्देश्य क्षेत्र की हर महिला को आर्थिक रूप से सशक्त और अपने पैरों पर खड़ा करना है.

पैकेजिंग और मेलों की ट्रेनिंग

रेशमा महिलाओं को सिर्फ उत्पाद बनाने की कला ही नहीं सिखाती हैं, बल्कि व्यापार के अगले चरणों में भी उनका मार्गदर्शन करती हैं। वह महिलाओं को आधुनिक और आकर्षक ब्रांडेड पैकेजिंग करना सिखाती हैं ताकि उनके उत्पादों को बेहतर बाजार मिल सके। इसके साथ ही, वह महिलाओं को विभिन्न मेलों में अपने स्टॉल लगाने और ग्राहकों के बीच अपने सामान की बिक्री करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी देती हैं ताकि वे व्यावसायिक रूप से दक्ष हो सकें.

बदलाव की सोच और हुनर का महत्व

रेशमा का मानना है कि समय बदल चुका है और आज के दौर में महिलाओं का आर्थिक रूप से सशक्त होना बेहद अनिवार्य है। उनका कहना है कि हर महिला के पास कोई न कोई हुनर अवश्य होता है और उसे उसी कला के आधार पर अपना काम शुरू करना चाहिए। भले ही शुरुआत छोटे पैमाने पर हो और शुरुआती आमदनी मात्र 5 रुपये ही क्यों न हो, लेकिन खुद की कमाई होना बहुत बड़ी बात है। उनका विश्वास है कि जब महिलाएं खुद कमाने लगती हैं, तो समाज में उनका शोषण और दुरुपयोग होने की गुंजाइश काफी हद तक कम हो जाती है। रेशमा की यह प्रेरणादायक सोच आज समाज की कई अन्य महिलाओं के लिए मार्गदर्शक साबित हो रही है.

सवाल-जवाब

रेशमा कहाँ की रहने वाली हैं?
रेशमा झारखंड की राजधानी रांची की रहने वाली हैं।
वह मुख्य रूप से किन चीजों का उत्पादन करती हैं?
वह घर पर मकई के बिस्कुट, मकई के लड्डू, रागी के लड्डू, अचार और नमकीन की कई वैरायटी तैयार करती हैं।
वह कुल कितने प्रकार के उत्पाद बनाती हैं?
रेशमा अपने घर में 50 से अधिक प्रकार के उत्पाद तैयार करती हैं।
ग्राहक उनसे सामान कैसे खरीदते हैं?
लोग उन्हें सीधे फोन पर ऑर्डर देते हैं और वह सामान ग्राहकों के घर तक पहुंचाती हैं।
रेशमा ने कितनी महिलाओं को प्रशिक्षित किया है?
वह अब तक 100 महिलाओं को ट्रेनिंग देकर उन्हें आत्मनिर्भर बना चुकी हैं।
वह महिलाओं को क्या-क्या सिखाती हैं?
उत्पाद तैयार करने के साथ-साथ वह महिलाओं को ब्रांडेड पैकेजिंग करना और मेलों में स्टॉल लगाना भी सिखाती हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·24 दिन पहले

रेशमा की यह सफलता केवल स्वरोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध महिला सुरक्षा और अपराध नियंत्रण से है। जैसा कि उन्होंने रेखांकित किया है कि आर्थिक स्वावलंबन से महिलाओं का शोषण और दुरुपयोग कम होता है, यह दृष्टिकोण सामाजिक अपराधों को रोकने में अत्यंत प्रभावी है। जब महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती हैं, तो घरेलू हिंसा और अन्य शोषणकारी अपराधों की गुंजाइश स्वतः समाप्त होने लगती है।

Rohan Verma@rohan-verma·24 दिन पहले

झारखंड के रांची की यह ग्राउंड रिपोर्ट ग्रामीण और अर्ध-शहरी अर्थव्यवस्था में महिला नेतृत्व के दूरगामी प्रभाव को रेखांकित करती है। जब रेशमा जैसी उद्यमी महिलाओं को सखी मंडलों के माध्यम से पैकेजिंग और विपणन का प्रशिक्षण देती हैं, तो यह केवल आजीविका का साधन नहीं बनता, बल्कि सामाजिक सुरक्षा चक्र को भी मजबूत करता है। इस तरह के मॉडल उत्तर प्रदेश और अन्य हिंदी पट्टी के राज्यों में भी ग्रामीण महिला सशक्तिकरण और घरेलू अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए एक प्रभावी प्रशासनिक व सामाजिक ढांचा बन सकते हैं, बशर्ते इन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाए।

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