अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर भारत ने अपने रणनीतिक हितों को सर्वोपरि रखते हुए पश्चिमी जगत को स्पष्ट संकेत दे दिया है। वॉशिंगटन के नीतिगत हलकों में लंबे समय से यह धारणा बनी हुई थी कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत उनके खेमे का हिस्सा बन जाएगा और रूस के साथ अपनी दशकों पुरानी साझेदारी को पीछे छोड़ देगा। हालांकि, म्यूनिख लीडर्स मीटिंग के मंच से विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बयानों ने इस आकलन को पूरी तरह बदल दिया है। उन्होंने अमेरिका की वर्तमान वैश्विक स्थिति को एक तन्हा सुपरपावर के रूप में व्याख्यायित किया। इसके समानांतर, केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी यह साफ किया है कि भारत और अमेरिका के बीच चलने वाली द्विपक्षीय व्यापार वार्ताएं इस समय एक ठहराव के मोड़ पर पहुंच चुकी हैं। ये दोनों घटनाक्रम दर्शाते हैं कि नई दिल्ली अपनी संप्रभु विदेश नीति और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ किसी भी बाहरी दबाव के आगे समझौता करने के मूड में नहीं है।
रणनीतिक हिचकिचाहट और पुरानी कार्यशैली से आगे निकलता भारत
भारत की समकालीन विदेश नीति के बदलते मिजाज को समझने के लिए विदेश मंत्री एस. जयशंकर की चर्चित पुस्तक 'द इंडिया वे' का संदर्भ बेहद प्रासंगिक है। अपनी किताब की शुरुआत में उन्होंने सत्यजीत रे की प्रसिद्ध कृति 'शतरंज के खिलाड़ी' का उल्लेख किया था। उस ऐतिहासिक कथा में अवध के दो नवाब अपनी चौसर और बाजी में इस कदर मशगूल रहते हैं कि ईस्ट इंडिया कंपनी उनके पूरे भूभाग पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेती है। इस ऐतिहासिक प्रसंग के माध्यम से यह रेखांकित किया गया कि जब वैश्विक व्यवस्था में भारी उथल-पुथल चल रही हो, तब रणनीतिक निष्क्रियता या आत्ममुग्धता किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है।
इसी ऐतिहासिक संदर्भ में भारत के प्रतिष्ठित रणनीतिकार जसजीत सिंह ने अतीत के कूटनीतिक संकोच को 'पानीपत सिंड्रोम' की संज्ञा दी थी। इस अवधारणा का सीधा अर्थ यह था कि जब तक संकट बिल्कुल सीमा तक न आ पहुंचे, तब तक राष्ट्रीय नीतियां केवल प्रतिक्रियात्मक और रक्षात्मक बनी रहती थीं। पहले से पहल करने या सक्रिय रणनीति अपनाने में हिचक दिखाई जाती थी।
आज की तारीख में भारतीय कूटनीति ने उस पुरानी रक्षात्मक शैली को पूरी तरह पीछे छोड़ दिया है। नई दिल्ली अब दूसरे देशों द्वारा तय किए गए एजेंडे पर प्रतिक्रिया देने के बजाय अपनी प्राथमिकताएं खुद तय करती है। पश्चिमी देशों की सबसे बड़ी कूटनीतिक सीमा यह रही है कि वे अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों को सिर्फ अपने भू-राजनीतिक हितों के चश्मे से देखते हैं। यूक्रेन संघर्ष के बाद पश्चिमी शक्तियों की अपेक्षा थी कि भारत तुरंत मॉस्को के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंध तोड़ ले। भारत ने इस अपेक्षा को दृढ़ता से खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि उसकी नीतियां किसी अन्य राजधानी के निर्देशों से संचालित नहीं होंगी।
म्यूनिख के मंच पर साझा इतिहास की याद
म्यूनिख लीडर्स मीटिंग के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मॉस्को और नई दिल्ली के बीच के ऐतिहासिक संबंधों की बुनियाद को पूरी मजबूती से सामने रखा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दोनों देशों के बीच 1950 के दशक से ही गहरे और मजबूत रिश्ते रहे हैं और इस साझी विरासत को भुलाया नहीं जा सकता। यह बयान उन पश्चिमी कूटनीतिज्ञों को सीधा जवाब था जो भारत को अपने पुराने रिश्तों से पीछे हटने की सलाह दे रहे थे।
इतिहास के पन्नों को पलटते हुए उन्होंने याद दिलाया कि जब भी भारतीय सुरक्षा और संप्रभुता के सामने गंभीर संकट उपस्थित हुआ, सोवियत संघ ने एक भरोसेमंद साथी की भूमिका निभाई। शीतयुद्ध के उस नाजुक दौर में अमेरिका और उसके सहयोगी पश्चिमी देश भारत के पड़ोस में एक फौजी तानाशाही को सैन्य और कूटनीतिक मजबूती प्रदान कर रहे थे।
साल 1971 के मुक्ति संग्राम का दौर भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। उस संकट के समय अमेरिका ने नई दिल्ली पर सामरिक दबाव बनाने के उद्देश्य से अपना सातवां नौसैनिक बेड़ा बंगाल की खाड़ी की ओर रवाना कर दिया था। उस अभूतपूर्व तनाव के बीच मॉस्को ने अपनी परमाणु पनडुब्बी भेजकर शक्ति संतुलन को बनाए रखा, जिसने उस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई।
इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र के मंच पर जब भी कश्मीर के विषय को लेकर पश्चिमी देशों ने भारत की स्थिति को कमजोर करने का प्रयास किया, तब सोवियत संघ के वीटो ने हमेशा भारत के हितों की रक्षा की। अतीत के इन महत्वपूर्ण मोड़ों ने यह साबित किया कि संकट के दौर में मॉस्को की प्रतिबद्धता अडिग रही, जबकि पश्चिमी नीतियां अक्सर सामयिक और स्वार्थ-प्रेरित रहीं।
ऊर्जा सुरक्षा और कच्चे तेल की खरीद पर दोहरा रवैया
विदेश मंत्री ने फिनलैंड में दिए गए अपने वक्तव्य के दौरान ऊर्जा खरीद को लेकर पश्चिमी देशों के विरोधाभासी दृष्टिकोण पर भी स्पष्ट बात रखी थी। जब यूक्रेन संघर्ष की शुरुआत हुई थी, तब वैश्विक तेल बाजार में भारी अनिश्चितता को रोकने के लिए वॉशिंगटन स्वयं चाहता था कि भारत रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल खरीदे ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति बनी रहे और कीमतों में अचानक उछाल न आए। यदि रूसी कच्चा तेल पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय बाजार से बाहर हो जाता, तो वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतें बेकाबू हो सकती थीं।
इसके विपरीत, जब भारत ने 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक स्थिरता को ध्यान में रखते हुए रूसी कच्चे तेल का आयात जारी रखा और उसका दायरा बढ़ाया, तब पश्चिमी राजनेताओं और मीडिया ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। भारत पर प्रतिबंधों की अनदेखी करने तक के आरोप लगाए जाने लगे।
इस दोहरे रवैये पर टिप्पणी करते हुए विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया था कि इसमें किसी ऊंचे नैतिक सिद्धांत का दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह से अपनी सहूलियत के मुताबिक रुख बदलने का मामला है, जहां अपने हित सधने पर नियम अलग होते हैं और दूसरों के लिए अलग। उन्होंने यह भी साफ किया कि सभी जिम्मेदार पक्ष इस जमीनी हकीकत को भली-भांति समझते हैं कि असली खेल क्या है। भारत का प्राथमिक उद्देश्य अपने नागरिकों के लिए वहनीय ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित करना है, न कि पश्चिमी देशों के राजनीतिक बयानों के आधार पर अपनी घरेलू नीतियां तय करना।
व्यापार वार्ताओं में गतिरोध और वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका की स्थिति
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का यह बयान कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ताएं एक ठहराव पर आ गई हैं, द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों की मौजूदा चुनौतियों को उजागर करता है। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी प्रशासन की नीतियां अधिक लेन-देन आधारित और अप्रत्याशित रही हैं। अमेरिकी तंत्र द्वारा अपने विशाल आर्थिक प्रभाव और डॉलर की अंतरराष्ट्रीय स्थिति का उपयोग एक दबावकारी माध्यम के रूप में किया जाता रहा है।
इस नीतिगत दृष्टिकोण के तहत अपने व्यापारिक साझेदारों पर एकतरफा टैरिफ लागू करने और फिर उनसे रियायतों की अपेक्षा करने की प्रवृत्ति देखी गई है। इसी दृष्टिकोण के परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका के लिए आम सहमति बनाना कठिन हो रहा है और वह एक तन्हा महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। जिस नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की वकालत लंबे समय तक वॉशिंगटन करता रहा है, उसी व्यवस्था के सिद्धांतों को उसकी व्यापारिक नीतियों से चुनौती मिल रही है।
दूसरी ओर, यूरोपीय देशों के दृष्टिकोण में शुरुआती मतभेदों के बाद एक व्यावहारिक बदलाव देखा गया है। भारत ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि यूरोप को यह धारणा छोड़नी होगी कि उसकी अपनी क्षेत्रीय समस्याएं स्वतः पूरे विश्व की समस्याएं बन जाती हैं। समय के साथ यूरोप ने नई दिल्ली के सामरिक महत्व और उसकी स्वतंत्र विदेश नीति की आवश्यकता को समझते हुए अपने दृष्टिकोण में समायोजन किया है।
























