झारखंड के जमशेदपुर शहर में जब भी पक्की और सच्ची यारी का जिक्र होता है, तो रो बाबू और श्रवण कुमार की जोड़ी का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। इन दोनों मित्रों का साथ कोई साल-दो साल का नहीं, बल्कि पूरे बयालीस साल पुराना है। जब इन दोनों की उम्र महज अट्ठारह वर्ष थी, तब इन्होंने जीवन संघर्ष की शुरुआत एक छोटे से ठेले के साथ की थी। आज भले ही दोनों की उम्र साठ बरस से अधिक हो चुकी है, लेकिन इनके बीच का प्रेम और डोसे के स्वाद का जादू जस का तस बना हुआ है। वक्त के पहिए के साथ बहुत कुछ बदल गया, मगर इनके हाथ का जायका और एक-दूसरे के प्रति समर्पण में कोई फर्क नहीं आया है। आज भी दोनों मिलकर पारंपरिक तरीके से काम संभालते हैं और ग्राहकों को पुराना स्वाद परोस रहे हैं।
शुरुआती दिनों का संघर्ष और पुराने दिन
पुराने दिनों को याद करते हुए रो बाबू बताते हैं कि जब उन्होंने यह काम शुरू किया था, तब बाजार में एक डोसे का दाम मात्र एक रुपया हुआ करता था। उस दौर में बुनियादी संसाधन बेहद सीमित हुआ करते थे, लेकिन मजबूत इरादे और दोस्त का साथ होने के कारण हर मुश्किल आसान लगती थी। धीरे-धीरे उनके बनाए गए डोसे का स्वाद आसपास के लोगों को भाने लगा और उनकी छोटी सी दुकान की शोहरत बढ़ने लगी। हालांकि वक्त के साथ महंगाई बढ़ी और आज एक डोसे की कीमत चालीस रुपये हो गई है, परंतु ग्राहकों की संख्या और दीवानगी में कोई कमी नहीं आई है। सबसे खास बात यह है कि इतने लंबे अंतराल के बाद भी उन्होंने अपने काम के पुराने अंदाज से कभी समझौता नहीं किया।
कोयले की आंच और मिट्टी के चूल्हे का कमाल
इस ठेले पर बिकने वाले डोसे की सबसे बड़ी यूएसपी इसका पारंपरिक ढंग से तैयार किया जाना है। आज के आधुनिक दौर में जहां ज्यादातर खाने-पीने की दुकानों पर गैस या आधुनिक चूल्हों का इस्तेमाल किया जाता है, वहीं ये दोनों आज भी कोयले की आंच और मिट्टी के चूल्हे का ही प्रयोग करते हैं। यहाँ मिलने वाला हल्का मसाला, लाजवाब चटनी और बेहद कुरकुरा डोसा खाने वालों को अपनी ओर खींच लेता है। यही वजह है कि शहर के दूर-दराज के इलाकों से लोग इसका स्वाद चखने खिंचे चले आते हैं। कई स्थानीय लोगों के लिए यहाँ आकर डोसा खाना केवल पेट भरने का जरिया नहीं, बल्कि अपनी पुरानी यादों को ताजा करने का एक खूबसूरत अनुभव बन चुका है।
चार दशक से अटूट साझेदारी
यह कहानी केवल एक साधारण डोसे के ठेले की नहीं है, बल्कि यह भरोसे, कठिन परिश्रम और वर्षों से चली आ रही दोस्ती की एक अनूठी दास्तान है। चार दशक से ज्यादा का लंबा समय गुजर जाने के बाद भी दोनों दोस्त हर सुख-दुख में एक-दूसरे के मजबूत संबल बनकर खड़े हैं। उम्र के इस पड़ाव पर पहुँचने के बावजूद वे हर दिन समय पर अपनी दुकान पर आते हैं और मिलकर ग्राहकों की सेवा करते हैं। शहरभर में उनकी इस अटूट मित्रता की अक्सर चर्चा होती है। उन्होंने यह साबित कर दिखाया है कि सच्ची दोस्ती केवल मौज-मस्ती तक सीमित नहीं होती, बल्कि जिंदगी के हर उतार-चढ़ाव में एक-दूसरे का हाथ थामे रहने का नाम है।
कहाँ और कैसे लें इस जायके का लुत्फ
यदि आप भी जमशेदपुर में पुराने दौर के स्वाद का आनंद लेना चाहते हैं और मिट्टी के चूल्हे पर बने भोजन की खुशबू महसूस करना चाहते हैं, तो आपको बीएसएनएल एक्सचेंज के पास पहुँचना होगा। यहाँ हर रोज ठीक शाम के छह बजते ही रो बाबू और श्रवण कुमार का ठेला सज जाता है। ठेला लगते ही वहाँ खानेशौकीनों की भीड़ जुटनी शुरू हो जाती है। मात्र चालीस रुपये में मिलने वाला यह डोसा स्वाद के साथ-साथ दो दोस्तों के कड़े संघर्ष और अटूट रिश्ते की कहानी भी बयां करता है। चार दशकों से अधिक पुराना यह सफर आज भी उतनी ही मेहनत और अपनेपन के साथ आगे बढ़ रहा है।
























