उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी बहुजन समाज पार्टी के भीतर शक्ति प्रदर्शन का एक जाना पहचाना तरीका दोबारा देखने को मिला है। पार्टी के नेशनल कॉर्डिनेटर आकाश आनंद सोमवार को सहारनपुर पहुंचे थे, जहां उन्होंने नकुड़ विधानसभा क्षेत्र से नरेश कुमार सैनी को चुनावी मैदान में उतारने का औपचारिक ऐलान किया। इस राजनीतिक सभा में मंच पर मौजूद कार्यकर्ताओं और नेताओं की नजरें उस वक्त टिक गईं, जब घोषित प्रत्याशी नरेश सैनी ने आकाश आनंद के सिर पर सुनहरे रंग का चमचमाता मुकुट रख दिया। पार्टी के स्थानीय पदाधिकारियों ने इस कदम को सैनी बिरादरी की तरफ से दिया गया आदर और सम्मान बताया, मगर इस दृश्य के सामने आते ही राज्य के राजनीतिक गलियारों में पुरानी यादें ताजा हो गईं।
मायावती के दौर के भव्य उपहार और विवाद
सहारनपुर के मंच पर दिखा यह नजारा लोगों को करीब दो दशक पहले के उस दौर में ले गया, जब बसपा सुप्रीमो मायावती के कार्यक्रमों में भारी भरकम नजराने चर्चा का केंद्र बनते थे। उस जमाने में पार्टी के बड़े सम्मेलनों या जन्मदिन समारोहों के मौके पर मायावती को सोने और चांदी के मुकुट, चांदी की भारी गदा और अन्य कीमती वस्तुएं भेंट करना एक आम रिवाज बन चुका था। राजधानी लखनऊ में साल 2010 के दौरान आयोजित एक विशाल रैली का वाकया आज भी सियासी चर्चाओं में आता है, जब मायावती को एक हजार रुपये के नोटों से तैयार की गई एक लंबी और बेहद कीमती माला पहनाई गई थी। उस घटना ने पूरे देश में तीखी हलचल पैदा की थी और बसपा की कार्यशैली पर कड़े सवाल खड़े किए थे।
उस दौर में भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे विरोधी दलों ने नोटों की माला और मुकुट संस्कृति को सामंती मिजाज का परिचायक बताया था। विपक्षी नेताओं का आरोप था कि शोषित तबके के नाम पर राजनीति करने वाला दल खुलेआम धनबल और राजशाही ठाठ-बाट का प्रदर्शन कर रहा है। इसके उलट बसपा सुप्रीमो और उनके प्रमुख सहयोगियों ने इन तोहफों को बहुजन समाज के आत्मसम्मान और अपने रहनुमा के प्रति सच्ची निष्ठा की अभिव्यक्ति करार दिया था। बसपा नेताओं का तर्क था कि समाज के वंचित वर्ग का अपनी नेता को ऐसे आदर देना उन लोगों को रास नहीं आ रहा जो परंपरागत व्यवस्था के समर्थक हैं।
कांशीराम के साधारण आंदोलन से लेकर भव्यता तक का सफर
बसपा की स्थापना के शुरुआती दिनों पर नजर डालें तो तस्वीर बिल्कुल जुदा नजर आती है। पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने इस संगठन को शोषित, दलित और उपेक्षित वर्गों को सामाजिक चेतना और सत्ता में सीधी हिस्सेदारी दिलाने वाले एक आंदोलन के रूप में खड़ा किया था। उन शुरुआती वर्षों में पार्टी का प्रचार अभियान बेहद सादगी भरा होता था, जिसमें कार्यकर्ता साइकिलों पर घूमकर जमीन से जुड़ते थे और संसाधन जुटाने के लिए आम लोगों से मामूली सहयोग लेते थे। लेकिन नब्बे के दशक और उसके बाद जब मायावती के नेतृत्व में पार्टी उत्तर प्रदेश की सत्ता के शीर्ष पर पहुंची, तब संगठन के तौर तरीकों में व्यापक बदलाव दर्ज किया गया और सादगी की जगह भव्य शक्ति प्रदर्शन ने ले ली।
नए दौर की उम्मीदें और जमीनी हकीकत
मायावती ने जब अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुए संगठन के महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे, तो यह कयास लगाए जाने लगे कि पार्टी अब आधुनिक ढांचे में ढलने जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि लंदन से पढ़े लिखे युवा चेहरे के आगे आने से संगठन में पेशेवर कार्यप्रणाली, डिजिटल माध्यमों का असरदार उपयोग और युवाओं से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता मिलेगी। आकाश आनंद ने हालिया दौर में कानून व्यवस्था और रोजगार के सवालों पर तीखे बयान देकर इस बदलाव का संकेत भी दिया था। हालांकि सहारनपुर के मंच से सामने आई तस्वीरों ने यह साफ कर दिया कि स्थानीय संगठन आज भी शीर्ष नेतृत्व को रिझाने के लिए पुराने ढर्रे और प्रतीकात्मक चमक दमक पर ही भरोसा कर रहा है।
चुनावी समीकरण और सामाजिक आधार की चुनौतियां
आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बसपा के सामने अपना मजबूत सामाजिक जनाधार बचाने की कठिन चुनौती खड़ी है। पार्टी का पारंपरिक जाटव मतदाता वर्ग भी अब पूरी तरह एकमुश्त नहीं दिख रहा है, जिसका एक हिस्सा भाजपा और चंद्रशेखर आजाद की अगुवाई वाली आजाद समाज पार्टी की तरफ आकर्षित हुआ है। चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो 2022 के राज्य विधानसभा चुनाव में बसपा महज एक सीट पर सिमट गई थी, जबकि 2024 के आम चुनाव में पार्टी पूरे उत्तर प्रदेश में अपना खाता भी नहीं खोल सकी। ऐसे वक्त में नगीना लोकसभा सीट से जीतकर संसद पहुंचे चंद्रशेखर आजाद जमीनी मुद्दों पर सड़कों पर उतरकर युवाओं को एकजुट करने की रणनीति अपना रहे हैं।
सहारनपुर में नकुड़ सीट से उम्मीदवार की घोषणा और मुकुट पहनाने की कवायद को गैर यादव पिछड़े वर्ग, विशेषकर सैनी समाज को अपने पाले में लाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। यह सामाजिक वर्ग पिछले कई चुनावों से भारतीय जनता पार्टी के साथ मजबूती से खड़ा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आज का जागरूक और युवा मतदाता केवल प्रतीकों या मुकुटों से प्रभावित होने वाला नहीं है, बल्कि वह रोजगार, बेहतर शिक्षा और सुरक्षा के ठोस वादों को परखता है। ऐसे में 2027 के चुनावी मुकाबले में बसपा को अपनी जमीन वापस हासिल करने के लिए मुकुट और मालाओं के आडंबर से बाहर निकलकर बूथ स्तर के संगठन और जनता की रोजमर्रा की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
















