शाहजहांपुर में मानसून के मौसम के साथ ही बैंगन की खेती करने वाले किसानों की परेशानियां बढ़ गई हैं। बारिश के दिनों में हवा में नमी और तापमान का स्तर कीटों के पनपने के लिए अनुकूल माहौल तैयार करता है। इस दौरान बैंगन के पौधों की ऊपरी कोपले और मुलायम शाखाएं अचानक सूखकर मुरझाने लगती हैं। कृषि वैज्ञानिकों और अनुभवी किसानों के मुताबिक यह स्थिति तना और फल छेदक कीट के घातक हमले की ओर इशारा करती है। यदि समय रहते इस अदृश्य खतरे पर नियंत्रण न पाया जाए तो फसल की पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है और किसानों को गंभीर आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
कीट के हमले का तंत्र और नुकसान के शुरुआती संकेत
तना छेदक कीट मानसून की शुरुआत में पौधे की नई पत्तियों और कोमल तनों पर अपने अंडे देता है। इन अंडों से बाहर निकलने वाली इल्लियां बेहद बारीक होती हैं और तुरंत पौधे के ऊपरी कोमल हिस्सों में छेद करके अंदर प्रवेश कर जाती हैं। तने के अंदरूनी भाग को खाते हुए इल्लियां लंबी सुरंगें बना लेती हैं। इस प्रक्रिया के कारण पौधे के भीतर पानी और जरूरी खनिज लवणों का संवहन पूरी तरह बाधित हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप पौधे का ऊपरी हिस्सा पानी की कमी से सूखने लगता है। किसान यदि मुरझाई हुई शाखा का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करें तो वहां एक छोटा सा सुराख साफ दिखाई देता है।
स्थानीय स्थिति पर चर्चा करते हुए प्रगतिशील युवा किसान रनजोद सिंह ने बताया कि मौसम की नमी की वजह से कीटों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ती है। जब इल्ली तने के मुख्य आंतरिक भाग को नुकसान पहुंचाती है तो पौधा ऊपर से भोजन और पानी प्राप्त नहीं कर पाता। देखते ही देखते पूरा हरा-भरा पौधा मुरझाकर बेजान होने लगता है। समय पर पहचान और त्वरित कार्रवाई ही फसल को पूरी तबाही से बचा सकती है।
खेत में प्रभावी जैविक और यांत्रिक नियंत्रण उपाय
फसल को बचाने के लिए किसानों को लक्षण दिखते ही तुरंत यांत्रिक और जैविक कदम उठाने चाहिए। सबसे पहला कदम यह है कि मुरझाई हुई शाखाओं को संक्रमण स्थल से 2 से 3 इंच नीचे से काटकर अलग कर दें। कटी हुई शाखाओं को खेत से दूर ले जाकर जला दें या गहरी मिट्टी में दबा दें ताकि इल्लियां नष्ट हो सकें। कीटों के चक्र को तोड़ने के लिए खेत में प्रति एकड़ 6 से 8 फेरोमोन ट्रैप स्थापित करने चाहिए। यह ट्रैप नर पतंगों को अपनी ओर आकर्षित करके फंसा लेते हैं जिससे मादा पतंगों का निषेचन रुक जाता है और कीटों की नई पीढ़ी नहीं पनप पाती।
जैविक सुरक्षा चक्र को मजबूत करने के लिए खेत में नीम के तेल का नियमित छिड़काव किया जा सकता है। नीम का तेल कीटों की भूख और अंडे देने की क्षमता को प्रभावित करता है। इसके अलावा जैविक कीटनाशक ब्यूवेरिया बैसियाना का प्रयोग भी इल्लियों की रोकथाम में बेहद कारगर साबित होता है। यह जैविक नियंत्रण पर्यावरण और मित्र कीटों को नुकसान पहुंचाए बिना तना छेदक के असर को कम करता है।
रासायनिक छिड़काव की विधि और बेहतर खेत प्रबंधन
जब फसल में कीट का प्रकोप बहुत ज्यादा बढ़ जाए तो विशेषज्ञों की राय लेकर रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग आवश्यक हो जाता है। ऐसी स्थिति में इमामेक्टिन बेंजोएट या स्पिनोसैड का उचित अनुपात में छिड़काव करना सबसे असरदार रहता है। दवाओं का छिड़काव हमेशा शाम के समय ही करना चाहिए। शाम के वक्त छिड़काव करने से दवा का सीधा असर सक्रिय कीटों पर पड़ता है और धूप के कारण दवा के बेअसर होने की संभावना भी कम हो जाती है।
कीटनाशकों के साथ-साथ खेत के प्रबंधन पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है। खेत में किसी भी स्थिति में पानी का भराव न होने दें क्योंकि जमा हुआ पानी जड़ों को कमजोर कर देता है जिससे पौधे कीटों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। खेत की नियमित रूप से सफाई करें और खरपतवारों को उखाड़कर फेंक दें। उर्वरकों का इस्तेमाल संतुलित मात्रा में करें और विशेष रूप से नाइट्रोजन की अत्यधिक खुराक देने से बचें क्योंकि ज्यादा नाइट्रोजन से पौधे जरूरत से ज्यादा कोमल हो जाते हैं जो कीटों को आमंत्रण देते हैं।



















