सितंबर और अक्टूबर के महीनों में कई क्षेत्रों के किसान अगेती टमाटर लगाने की तैयारी में जुट जाते हैं। इस दौर में मौसम तेजी से करवट लेता है और हवा में नमी बढ़ जाती है, जिसके चलते पौधों पर फफूंद तथा जीवाणुओं का हमला होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। सही समय पर रोकथाम न की जाए तो पूरी मेहनत और लागत बर्बाद हो सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए बोकारो कृषि विज्ञान केंद्र की कृषि वैज्ञानिक डॉ. सुषमा सरोज ने अगेती टमाटर की फसल को पांच प्रमुख रोगों से सुरक्षित रखने के लिए जरूरी परामर्श दिए हैं।
नर्सरी में गलन रोग की रोकथाम और बीज का उपचार
टमाटर की पैदावार के शुरुआती चरण में ही नर्सरी के अंदर गलन रोग की गंभीर समस्या उभर सकती है। यह रोग फफूंद अथवा बैक्टीरिया के संक्रमण से पनपता है और बीज या मिट्टी के रास्ते तेजी से फैलता है। इस परेशानी से बचने के लिए किसानों को अपनी नर्सरी सामान्य जमीन की सतह से लगभग 15 सेंटीमीटर ऊंचाई पर तैयार करनी चाहिए। इसके साथ ही क्यारियों में जल निकासी का पुख्ता प्रबंध होना चाहिए ताकि पानी बिल्कुल न ठहरे, जिससे फफूंदी और हानिकारक बैक्टीरिया के पनपने का अवसर न मिले।
नर्सरी में बीज बोने से पूर्व बीज शोधन का कार्य अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। किसान कैप्टान, थिराम अथवा कार्बेन्डाजिम जैसी उपयुक्त दवाओं से बीजों को उपचारित कर सकते हैं। विशेषज्ञ के अनुसार, लगभग एक किलोग्राम बीज के शोधन हेतु 2 से 2.5 ग्राम दवा का उपयोग करना पर्याप्त होता है। जब पौध पूरी तरह तैयार हो जाए और उसे मुख्य खेत में रोपना हो, तो कतारों तथा पौधों के बीच तय दूरी का कड़ाई से पालन करें और खेत की लगातार निगरानी करते रहें।
अगेती और पिछेती झुलसा से पौधों की सुरक्षा
खेत में रोपाई के बाद टमाटर की फसल पर अगेती झुलसा, पिछेती झुलसा और पत्तियों पर धब्बे उभरने वाले संक्रमण का बड़ा खतरा मंडराता रहता है। मौसम में नमी की अधिकता इन रोगों के फैलाव को तेज कर देती है। इन बीमारियों से फसल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि वैज्ञानिक ने मैनकोजेब और मेटलैक्सिन का छिड़काव करने का परामर्श दिया है। इन दवाओं को 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के अनुपात में अच्छी तरह घोलकर पौधों पर छिड़का जा सकता है, जिससे संक्रमण रुक जाता है।
जीवाणु धब्बा रोग के लक्षण और प्रबंधन
अक्सर देखा जाता है कि टमाटर की पत्तियों पर भूरे रंग के छोटे-छोटे धब्बे उभर आते हैं। धीरे-धीरे ये धब्बे बड़े होने लगते हैं और बाद में पत्तियों में दरारें पड़ जाती हैं। इस जीवाणु धब्बा रोग की रोकथाम के लिए किसानों को संक्रमित नजर आने वाली पत्तियों तथा फलों को तुरंत तोड़कर खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर देना चाहिए। इसके अलावा खेत में कहीं भी अतिरिक्त पानी का ठहराव नहीं होना चाहिए।
सिंचाई करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि पौधों पर ऊपर से पानी की बौछारें न डाली जाएं। पानी की छींटे उड़ने से यह जीवाणु रोग बहुत तेजी से आसपास के स्वस्थ पौधों तक फैल जाता है। रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही किसान कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का 0.2 से 0.3 प्रतिशत का घोल बनाकर छिड़काव कर सकते हैं, जिससे बीमारी वहीं थम जाती है।
पत्तियों का मुड़ना यानी कुंचन रोग और नियमित निगरानी
टमाटर के पौधों में होने वाले कुंचन रोग के प्रभाव से पत्तियां ऊपर अथवा नीचे की दिशा में मुड़ने लगती हैं। संक्रमित पत्तियां सामान्य से काफी छोटी रह जाती हैं और सिकुड़ जाती हैं, जिससे पौधे का समग्र विकास और बढ़वार बुरी तरह प्रभावित होती है। इस रोग के फैलाव में सफेद मक्खी मुख्य वाहक बनती है। इसलिए सफेद मक्खी की सक्रियता पर नजर रखना जरूरी है और समय रहते जैविक दवा का छिड़काव करके इसके प्रकोप को नियंत्रित किया जाना चाहिए।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. सुषमा सरोज ने किसानों से आग्रह किया है कि अगेती टमाटर की बुवाई से लेकर फल आने तक फसल पर सतत निगरानी बनाए रखें। नर्सरी से लेकर मुख्य खेत में रोपाई के बाद किसी भी पौधे पर संक्रमण का शुरुआती लक्षण दिखते ही फौरन कदम उठाएं और अनुशंसित दवाओं का इस्तेमाल करें, ताकि पूरी फसल को गंभीर नुकसान से बचाया जा सके।



















