खरीफ सीजन में मक्के की कटाई पूरी होने के तुरंत बाद किसानों को रबी की प्रमुख फसल आलू के लिए अपने खेत तैयार करने में जुट जाना चाहिए। इस समय उन्नत किस्मों के चुनाव के साथ-साथ खेत की तैयारी और बोआई के तौर-तरीकों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। पैदावार को बीमारियों से सुरक्षित रखने और कंदों का आकार बेहतर पाने के लिए सबसे अहम कदम बोआई से पहले बीज उपचार करना है, जिससे अंकुरण के बाद फसल में लगने वाले विभिन्न संक्रामक रोगों की रोकथाम शुरुआत में ही हो जाती है।
रोगों से बचाव के लिए बीज उपचार है जरूरी सुरक्षा चक्र
पलामू जिले के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र चियांकी के कृषि वैज्ञानिक डॉ. अखिलेश शाह के अनुसार जिस प्रकार नवजात शिशुओं को जन्म के उपरांत घातक बीमारियों से सुरक्षित रखने के लिए समय पर टीके लगाए जाते हैं, ठीक उसी तरह बोआई से पूर्व बीज का उपचार भी भविष्य में पौधों को कई तरह की व्याधियों से बचाने का काम करता है। यदि किसान बिना शोधन के सीधे बीज की बोआई कर देते हैं, तो खेत में कवक और भूमि जनित रोगों का जोखिम काफी बढ़ जाता है। इसलिए प्रत्येक किसान को बोआई की प्रक्रिया शुरू करने से पहले बीज उपचार को अपनी कार्ययोजना का अनिवार्य हिस्सा बना लेना चाहिए।
कार्बेंडाजिम से इस तरह करें बीज का सही उपचार
आलू के कंदों को उपचारित करने के लिए कार्बेंडाजिम कवकनाशी का प्रयोग किया जा सकता है। पाउडर के रूप में मिलने वाली कार्बेंडाजिम दवा को 2 ग्राम प्रति किलो बीज के अनुपात में इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। इस दवा को आलू के बीजों पर भली-भांति मिलाया जाता है और फिर तय प्रक्रिया के तहत निर्धारित मात्रा में पानी का उपयोग किया जाता है। दवा का लेप लगने के बाद बीजों को लगभग 2 से 4 घंटे तक छायादार स्थान पर सुखाना अत्यंत आवश्यक है। किसानों को किसी भी रसायन का उपयोग करते समय पैकेट पर अंकित लेबल और क्षेत्रीय कृषि जानकारों के निर्देशों का पूरी तरह पालन करना चाहिए।
पौधों और कतारों के बीच सही दूरी बनाए रखना क्यों है जरूरी
खेत में आलू बोते समय कतार और पौधों के अंतराल का विशेष ख्याल रखना पड़ता है। सामान्य अनुशंसा के अनुसार एक कतार से दूसरी कतार के बीच 50 से 60 सेंटीमीटर का फासला रखना चाहिए, जबकि एक पौधे से दूसरे पौधे की दूरी 20 से 25 सेंटीमीटर निर्धारित की जानी चाहिए। यह मानक दूरी पौधों को प्रकाश, हवा और पोषक तत्व ग्रहण करने के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध कराती है। इसके अलावा जब खेत में उचित दूरी बनी रहती है, तो बाद में निराई-गुड़ाई करने, पौधों की जड़ों पर मिट्टी चढ़ाने और संतुलित सिंचाई करने में काफी सहूलियत होती है।
कंदों को धूप से बचाने के लिए समय पर चढ़ाएं मिट्टी
आलू की फसल की परिपक्वता अवधि सामान्य तौर पर लगभग 70 से 90 दिनों की होती है। इस समय चक्र में पौधों के विकास के साथ-साथ खेत में कंदों के ऊपर मिट्टी चढ़ाने की क्रिया बेहद निर्णायक भूमिका निभाती है। सिंचाई करने से पहले पौधों की आवश्यकता को देखते हुए जड़ों के पास मिट्टी चढ़ानी चाहिए ताकि विकसित हो रहे कंदों को मिट्टी का मजबूत सुरक्षा घेरा मिल सके। यह आवरण कंदों को सीधी तेज धूप के संपर्क में आने से रोकता है, जिससे आलू हरे होने से बचते हैं और उनकी गुणवत्ता बाजार के अनुकूल बनी रहती है।
बोआई के समय इन बुनियादी सावधानियों का रखें ध्यान
खेती की शुरुआत में ही किसानों को प्रमाणित, स्वस्थ और उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करना चाहिए। बीज शोधन, सही दूरी का रखरखाव, नियमित सिंचाई और उचित समय पर मिट्टी चढ़ाने जैसे अहम चरणों में किसी भी तरह की लापरवाही फसल की कुल उपज पर सीधा असर डालती है। इसके साथ ही खेत में इस्तेमाल किए जाने वाले किसी भी कृषि रसायन की मात्रा अनुशंसित सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए और लेबल पर छपे दिशा-निर्देशों का हमेशा सावधानीपूर्वक पालन किया जाना चाहिए।























