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सीआरपीएफ की महिला कॉम्बैट यूनिट के 40 साल: 1986 की पहली महिला बटालियन से अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा तक की ऐतिहासिक यात्रादिल्ली
26 सित॰ 2026, 5:33 pm (33 दिन पहले)· 0

सीआरपीएफ की महिला कॉम्बैट यूनिट के 40 साल: 1986 की पहली महिला बटालियन से अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा तक की ऐतिहासिक यात्रा

केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने कॉम्बैट भूमिकाओं में महिलाओं की 40 साल की सेवा का जश्न मनाते हुए नई दिल्ली में एक भव्य समारोह का आयोजन किया। 1986 में गठित 88वीं महिला बटालियन से शुरू हुई यह यात्रा आज एंटी-नक्सल, काउंटर-टेररिज्म और अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों तक फैली हुई है।

केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में महिला जवानों के कॉम्बैट भूमिका निभाने के 40 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस ऐतिहासिक उपलब्धि को चिह्नित करने के लिए नई दिल्ली स्थित शौर्य ऑफिसर्स इंस्टीट्यूट में एक विशेष समारोह का आयोजन किया गया। वर्ष 1986 में देश की पहली पूरी तरह से महिलाओं वाली सशस्त्र पुलिस बटालियन की स्थापना के साथ सुरक्षा बलों के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ा था। चार दशकों के इस सफर में सीआरपीएफ की महिला योद्धाओं ने न केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने में अपनी क्षमता साबित की है, बल्कि नक्सल विरोधी अभियानों, आतंकवाद रोधी अभियानों और अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ी है।

ऐतिहासिक 88वीं महिला बटालियन से शुरू हुआ सफर

वर्ष 1986 में सीआरपीएफ द्वारा 88वीं महिला बटालियन का गठन किया गया था। यह कदम न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया के अर्धसैनिक बलों के इतिहास में एक अभूतपूर्व फैसला था। उस समय दुनिया भर के सशस्त्र बलों में महिलाओं को अग्रिम मोर्चे या कॉम्बैट ड्यूटी में तैनात करने पर झिझक थी। ऐसे दौर में एक पूरी तरह से महिला कर्मियों वाली सशस्त्र पुलिस इकाई तैयार करना एक बड़ी चुनौती माना जा रहा था। हालांकि, शुरुआती बैच की महिला जवानों ने कठिन प्रशिक्षण, अनुशासित जीवन और अद्भुत साहस के बल पर सभी संशयों को दूर कर दिया। इस इकाई के गठन ने भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक ऐसा रास्ता तैयार किया जहाँ महिला सुरक्षाकर्मी किसी भी कठिन परिस्थिति से निपटने के लिए सक्षम साबित हुईं।

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शौर्य ऑफिसर्स इंस्टीट्यूट में विशेष समारोह और सम्मान

40 साल के इस गौरवशाली सफर के उपलक्ष्य में नई दिल्ली के शौर्य ऑफिसर्स इंस्टीट्यूट में आयोजित समारोह की अध्यक्षता सीआरपीएफ के महानिदेशक जीपी सिंह ने की। इस अवसर पर उनके साथ सीआरपीएफ फैमिली वेलफेयर एसोसिएशन की अध्यक्ष डॉ. अनामिका सिंह भी मुख्य रूप से उपस्थित रहीं। कार्यक्रम में अर्धसैनिक बल के कई वरिष्ठ अधिकारी, सेवा निवृत्त पूर्व सैनिक, वर्तमान में तैनात महिला कर्मी और कई गणमान्य नागरिक शामिल हुए। इस दौरान उन महिला पूर्व सैनिकों और वर्तमान अधिकारियों को विशेष रूप से सम्मानित किया गया, जिन्होंने देश की संप्रभुता, सुरक्षा और अखंडता को बनाए रखने में उत्कृष्ट योगदान दिया है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न ऑपरेशन्स के दौरान अद्वितीय वीरता दिखाने वाली और देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान देने वाली महिला शहीदों के योगदान को भी श्रद्धापूर्वक याद किया गया।

काउंटर-टेररिज्म से लेकर एंटी-नक्सल अभियानों तक विस्तार

सशस्त्र बल में शामिल होने के बाद से महिला कर्मियों की जिम्मेदारियों में समय के साथ व्यापक बदलाव आया है। शुरुआती दिनों में जहाँ महिला बटालियन को मुख्य रूप से सामान्य सुरक्षा व्यवस्था या भीड़ नियंत्रण के कार्यों में लगाया जाता था, वहीं आज वे सबसे खतरनाक और संवेदनशील मोर्चों पर तैनात हैं। सीआरपीएफ की महिला जवान आज देश के विभिन्न हिस्सों में काउंटर-टेररिज्म ऑपरेशन्स, दंगा नियंत्रण (रॉयट कंट्रोल), अति विशिष्ट व्यक्तियों (वीआईपी) की सुरक्षा, एंटी-नक्सल अभियानों और जटिल कानून-व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों का मुकाबला कर रही हैं। दुर्गम पहाड़ियों, घने जंगलों और अत्यधिक तनाव वाले क्षेत्रों में तैनात होकर इन जवानों ने अपनी कार्यकुशलता और निर्णय लेने की क्षमता का परिचय दिया है। कई महिला कर्मियों को उनकी अदम्य वीरता, अनुशासित सेवा और असाधारण योगदान के लिए वीरता पदक तथा विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया जा चुका है।

वैश्विक मंच पर पहचान और यूएन पीसकीपिंग मिशन

सीआरपीएफ की महिला योद्धाओं की बहादुरी और पेशेवर दक्षता केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रही है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के शांति मिशनों (पीसकीपिंग मिशंस) के तहत विदेशी धरती पर भी भारत का नाम रोशन किया है। संकटग्रस्त और युद्धग्रस्त देशों में शांति स्थापित करने और स्थानीय नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से भेजी गई सीआरपीएफ की महिला इकाइयों ने अनुकरणीय कार्य किया है। विदेशी सरजमीं पर भारतीय वर्दी पहनकर अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप ड्यूटी करना एक अत्यधिक जिम्मेदारी भरा काम होता है। इन वैश्विक मिशनों में भारतीय महिला जवानों के अनुशासन, मानवीय दृष्टिकोण और रणनीतिक कौशल की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई है।

पारिवारिक सहयोग और संस्थागत सुधारों की दिशा

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए महानिदेशक जीपी सिंह ने कहा कि सीमा पर या कठिन इलाकों में तैनात जवानों की सफलता के पीछे उनके परिवारों का बहुत बड़ा योगदान होता है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में अपने प्रियजनों को देश सेवा के लिए समर्पित करने वाले परिवारों के धैर्य और अटूट विश्वास की सराहना की। इस मौके पर सीआरपीएफ फैमिली वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न कल्याणकारी कार्यक्रमों पर भी ध्यान केंद्रित किया गया। यह संस्था देश के भीतर तथा विदेशी मिशनों में तैनात सुरक्षाकर्मियों के परिवारों को सामाजिक, मानसिक और आर्थिक संबल प्रदान करने का काम करती है।

समारोह के समापन पर सीआरपीएफ ने अपने परिचालन की तैयारी (ऑपरेशनल रेडीनेस), प्रगतिशील सुधारों और समावेशी सुरक्षा वातावरण को और मजबूत करने का संकल्प दोहराया। चार दशक पूर्व शुरू हुई यह पहल आज एक मजबूत और प्रेरणादायक विरासत का रूप ले चुकी है, जो आने वाले वर्षों में भी देश की भावी पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

सवाल-जवाब

सीआरपीएफ की पहली महिला बटालियन का गठन कब हुआ था?
सीआरपीएफ की पहली पूरी तरह महिलाओं वाली 88वीं बटालियन का गठन वर्ष 1986 में हुआ था।
सीआरपीएफ महिला कॉम्बैट यूनिट की 40वीं वर्षगांठ समारोह का आयोजन कहां किया गया?
यह समारोह नई दिल्ली स्थित शौर्य ऑफिसर्स इंस्टीट्यूट में आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता महानिदेशक जीपी सिंह ने की।
सीआरपीएफ की महिला जवान किन-किन प्रमुख अभियानों में तैनात हैं?
महिला जवान काउंटर-टेररिज्म, एंटी-नक्सल ऑपरेशन्स, रॉयट कंट्रोल, वीआईपी सिक्योरिटी और यूएन पीसकीपिंग मिशनों में तैनात हैं।
समारोह के दौरान किन प्रमुख हस्तियों को सम्मानित किया गया?
देश की संप्रभुता और सुरक्षा में उत्कृष्ट योगदान देने वाली महिला पूर्व सैनिकों, सेवारत अधिकारियों और बहादुर शहीदों के योगदान को सम्मानित व याद किया गया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·33 दिन पहले

1986 में सिर्फ महिलाओं की बटालियन बनाना उस दौर में कितना बड़ा फैसला रहा होगा। आज जब इन्हें हर मोर्चे पर देखते हैं तो लगता है शुरुआत कितनी मुश्किल रही होगी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·33 दिन पहले

अस्सी के दशक में जब ये महिला बटालियन बनी होगी, तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि ये जवान नक्सलियों से लेकर जंगलों तक में ऐसा लोहा मनवाएंगी। सुरक्षा बलों में जेंडर की दीवार टूटने की यह कहानी वाक़ये प्रेरणादायक है।

Yuki Tanaka@yuki-tanaka·33 दिन पहले

बिल्कुल सही कहा अर्जुन जी। क्या आज भी इन महिला बटालियन के सामने फील्ड ट्रेनिंग में कोई खास चुनौतियाँ आती हैं?

Karan Malhotra@karan-malhotra·33 दिन पहले

अस्सी के दशक में जब ये महिला बटालियन बनी थी, तब हमारे एक रिश्तेदार सीआरपीएफ में ही थे। उन्होंने बताया था कि तब लोग सोचते थे कि महिलाएं सिर्फ दफ्तर का काम संभालेंगी, पर इन जांबाज महिलाओं ने नक्सलियों से लेकर हर मोर्चे पर जो कर दिखाया, वो वाकई कमाल है।

Rohan Verma@rohan-verma·33 दिन पहले

करन जी, 1986 में 88वीं बटालियन बनने के समय ऐसा सोचना आम था, पर इन महिलाओं ने सच में सबको गलत साबित कर दिया।

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