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सीकर के किसान सोनाराम ने आधुनिक तकनीक से बदली अपनी किस्मत, पॉलीहाउस में खीरे की खेती से कमा रहे सालाना 25 लाख रुपयेराजस्थान
18 सित॰ 2026, 7:17 pm (6 दिन पहले)· 0

सीकर के किसान सोनाराम ने आधुनिक तकनीक से बदली अपनी किस्मत, पॉलीहाउस में खीरे की खेती से कमा रहे सालाना 25 लाख रुपये

सीकर जिले के लामिया गांव के एक प्रगतिशील किसान सोनाराम ने पारंपरिक खेती छोड़कर पॉलीहाउस, ड्रिप सिंचाई और सौर ऊर्जा जैसी तकनीकों को अपनाया है, जिससे वे हर साल 25 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं।

राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में अब पारंपरिक कृषि की पुरानी परिभाषा पूरी तरह बदल रही है। राज्य के किसान अब केवल पारंपरिक फसलों जैसे गेहूं, जौ, चना और सरसों की खेती तक ही सीमित नहीं रह गए हैं। इसके बजाय, वे आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर खेती को एक बेहद फायदेमंद व्यावसायिक उद्यम में बदल रहे हैं। सीकर जिले के लामिया गांव के रहने वाले प्रगतिशील किसान सोनाराम इस बड़े बदलाव का एक बेहतरीन उदाहरण हैं। सोनाराम ने साल 2017 में अपनी पारंपरिक खेती के साथ-साथ एक नियंत्रित पॉलीहाउस वातावरण में खीरे की खेती करने का फैसला किया। ड्रिप सिंचाई, सोलर सिस्टम और वर्षा जल संचयन जैसी उन्नत तकनीकों का सफलतापूर्वक उपयोग करके, वे आज कृषि क्षेत्र से सालाना 20 से 25 लाख रुपये से अधिक का मुनाफा कमा रहे हैं।

पॉलीहाउस की स्थापना और सरकारी सहायता

सीकर जिला मुख्यालय से लगभग 55 किलोमीटर दूर स्थित लामिया गांव में सोनाराम के पास कुल 14 बीघा कृषि योग्य भूमि है। इस भूमि पर वे नियमित रूप से गेहूं, जौ, चना और सरसों जैसी पारंपरिक फसलें तो उगाते ही हैं, लेकिन उनकी बड़ी व्यावसायिक सफलता का मुख्य केंद्र 4000 वर्ग मीटर के दायरे में फैला उनका आधुनिक पॉलीहाउस है। सोनाराम ने साल 2017 में इस पॉलीहाउस के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाया था। उस समय इस पूरे सेटअप को तैयार करने में लगभग 32 लाख रुपये की कुल पूंजीगत लागत आई थी। हालांकि, सरकार की तरफ से मिलने वाले कृषि अनुदान यानी सब्सिडी के कारण उनका वास्तविक व्यक्तिगत खर्च घटकर सिर्फ 10 लाख रुपये रह गया था। सरकार की इस बड़ी आर्थिक मदद ने उनके लिए आधुनिक कृषि की शुरुआत को बेहद सुलभ बना दिया।

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मुनाफे का सफर और लगातार बढ़ता ग्राफ

जब सोनाराम ने पहली बार अपने इस पॉलीहाउस में खीरे की खेती शुरू की, तो उनकी शुरुआती उत्पादन लागत लगभग 2 लाख रुपये आई थी। अपनी पहली ही फसल की कटाई के बाद उन्हें 2 लाख रुपये से अधिक का शुद्ध मुनाफा हुआ, जिसने उनके आत्मविश्वास को कई गुना बढ़ा दिया। इसके बाद उन्होंने रुकने के बजाय अपनी उत्पादन पद्धतियों और तकनीकी ढांचे को लगातार अपग्रेड किया। सोनाराम के अनुसार, साल 2023 में खीरे के साथ पारंपरिक फसलों से होने वाली संयुक्त आय ने उन्हें 12 लाख रुपये से अधिक का शुद्ध लाभ दिया था। साल 2024 में यह मुनाफा और बढ़कर लगभग 16 लाख रुपये तक पहुंच गया। साल 2025 के पहले ही सीजन में उन्होंने करीब 7 लाख रुपये का मुनाफा दर्ज किया। वहीं, साल 2026 में उनकी कमाई ने नए रिकॉर्ड स्थापित किए, जहां केवल एक ही सीजन से उन्होंने 10 लाख रुपये से अधिक का शुद्ध मुनाफा अर्जित कर लिया है।

पैदावार की क्षमता और फसल चक्र का गणित

अपने 4000 वर्ग मीटर के पॉलीहाउस में सोनाराम खीरे के लगभग 7000 पौधे लगाते हैं। पॉलीहाउस के भीतर अनुकूल और नियंत्रित तापमान मिलने के कारण ये पौधे मात्र 40 दिनों के भीतर फल देना शुरू कर देते हैं। सोनाराम बताते हैं कि एक पौधा एक सीजन में करीब 60 से 70 किलोग्राम तक खीरा पैदा कर देता है। इस प्रकार, उनके पॉलीहाउस से हर सीजन में लगभग 40 से 45 टन तक खीरे की कुल पैदावार होती है। मुनाफे को अधिकतम करने के लिए वे साल में दो बार फसल चक्र चलाते हैं। पहला सीजन फरवरी में शुरू होकर मई तक चलता है, जबकि दूसरा खेती का चक्र जुलाई से लेकर अक्टूबर तक रहता है। यह सुव्यवस्थित कार्यक्रम उन्हें साल के अधिकांश महीनों में लगातार बाजार में उपज बेचने और आय बनाए रखने की सुविधा देता है।

घर पर जैविक खाद का निर्माण और जल संरक्षण

अपनी फसलों की गुणवत्ता को बेहतर रखने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए सोनाराम पूरी तरह से प्राकृतिक जैविक खाद का उपयोग करते हैं। इस जैविक खाद को बनाने की विधि सीखने के लिए उन्होंने दुर्गापुरा रिसर्च सेंटर से विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया था। वे अपने ही खेत में गाय के गोबर, गोमूत्र और स्थानीय औषधीय पौधों जैसे आक, धतूरा और खींप की मदद से प्राकृतिक खाद तैयार करते हैं। इन सभी सामग्रियों को बड़े ड्रमों में भरकर लगभग 3 से 4 महीने तक सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद तैयार पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद को फसलों में डाला जाता है।

सोनाराम कृषि क्षेत्र में तकनीक अपनाने के मामले में दशकों से अग्रणी रहे हैं। उन्होंने साल 1980 में ही अपने खेत में फव्वारा सिंचाई प्रणाली स्थापित कर ली थी। बाद में जब ड्रिप सिंचाई तकनीक लोकप्रिय हुई, तो उन्होंने अपने पूरे खेत को ड्रिप सिस्टम से जोड़ लिया। राजस्थान के शुष्क इलाकों में पानी की भारी किल्लत से निपटने के लिए उन्होंने अपने खेत में बारिश के पानी को इकट्ठा करने के लिए एक बहुत बड़ा पॉन्ड यानी तालाब बनवाया है। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली कटौती की समस्या से उबरने के लिए उन्होंने सोलर सिस्टम लगाया है। सोनाराम का मानना है कि आधुनिक तकनीक और कुशल प्रबंधन का मेल करके कोई भी किसान कम पानी में भी अपनी पैदावार बढ़ा सकता है और खेती को एक मुनाफे वाले बिजनेस में बदल सकता है।

सवाल-जवाब

किसान सोनाराम कहां के रहने वाले हैं और उनके पास कितनी जमीन है?
सोनाराम राजस्थान के सीकर जिला मुख्यालय से करीब 55 किलोमीटर दूर स्थित लामिया गांव के रहने वाले हैं। उनके पास कुल 14 बीघा जमीन है।
सोनाराम ने पॉलीहाउस कब शुरू किया था और इसमें कितना सरकारी अनुदान मिला?
सोनाराम ने साल 2017 में पॉलीहाउस की शुरुआत की थी। इस पॉलीहाउस को तैयार करने में करीब 32 लाख रुपये का खर्च आया था, लेकिन सरकारी अनुदान मिलने के बाद उनका खर्च सिर्फ 10 लाख रुपये ही रहा।
उनके 4000 वर्ग मीटर के पॉलीहाउस में कितने पौधे लगाए जाते हैं और उनसे कितनी उपज मिलती है?
सोनाराम अपने पॉलीहाउस में लगभग 7000 खीरे के पौधे लगाते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में एक पौधा सीजन में 60 से 70 किलो तक फल देता है, जिससे कुल सीजनल उत्पादन 40 से 45 टन तक पहुंच जाता है।
सोनाराम खीरे की खेती में किस तरह की खाद का उपयोग करते हैं?
सोनाराम पूरी तरह प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल करते हैं। वे खेत पर ही गोमूत्र, गोबर, आक, धतूरा और खींप जैसी चीजों को 3 से 4 महीने तक ड्रम में सड़ाकर जैविक खाद तैयार करते हैं।
पानी और बिजली की समस्या से निपटने के लिए खेत पर क्या तकनीकें अपनाई गई हैं?
उन्होंने पूरे खेत में ड्रिप सिंचाई तकनीक लगाई है, बारिश के पानी को सहेजने के लिए एक बड़ा पॉन्ड बनाया है और बिजली की समस्या से बचने के लिए सोलर सिस्टम का उपयोग करते हैं।
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टिप्पणियाँ 5

Ananya Iyer@ananya-iyer·6 दिन पहले

यह सफलता दर्शाती है कि आधुनिक कृषि अब केवल जीवन निर्वाह का साधन नहीं, बल्कि एक उच्च-उपज वाला व्यावसायिक मॉडल बन चुकी है। जिस तरह से इस तकनीक और सरकारी अनुदान ने ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा दिया है, आने वाले समय में यह ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और पॉप कल्चर के दौर में ग्रामीण युवाओं को कृषि की ओर आकर्षित करने वाली एक बड़ी प्रेरणा बन सकती है।

Ravikash Gupta@ravikash·6 दिन पहले

सोनाराम की सफलता यह साबित करती है कि भारतीय कृषि अब जीवन निर्वाह का जरिया नहीं, बल्कि एक उच्च रिटर्न देने वाला एग्री-बिजनेस बन रही है। 32 लाख रुपये के शुरुआती पूंजीगत व्यय में सरकारी सब्सिडी और ड्रिप सिंचाई-सोलर जैसी तकनीकों का प्रभावी उपयोग यह दिखाता है कि कैसे स्मार्ट केपेक्स और एसेट ऑप्टिमाइजेशन से कृषि क्षेत्र में स्टार्टअप जैसा स्केल हासिल किया जा सकता है। भविष्य में इस प्रकार के माइक्रोकैप वेंचर्स रूरल इकोनॉमी और एग्री-टेक निवेश का एक नया मजबूत मॉडल पेश कर सकते हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·6 दिन पहले

रविकाश गुप्ता के इस विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह समझना जरूरी है कि सीकर के किसान सोनाराम जैसे उदाहरण ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नीतिगत बदलाव का संकेत देते हैं। जब सरकारी सब्सिडी और सौर ऊर्जा जैसी तकनीकें मिलती हैं, तो पारंपरिक खेती उद्यमिता में बदल जाती है। यह मॉडल ग्रामीण युवाओं के पलायन को रोकने और कृषि क्षेत्र में पूंजी निवेश बढ़ाने की बड़ी क्षमता रखता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 दिन पहले

एक क्राइम रिपोर्टर के तौर पर मैं देखता हूँ कि ग्रामीण इलाकों में आर्थिक संपन्नता और आधुनिक तकनीक का यह प्रसार अपराध दर को नियंत्रित करने में भी बड़ी भूमिका निभाता है। जब युवाओं और किसानों को स्थानीय स्तर पर पॉलीहाउस और सौर ऊर्जा जैसी योजनाओं से सालाना लाखों की ठोस आमदनी मिलती है, तो आजीविका के संकट से उपजे भूमि विवादों और छोटे-मोटे अपराधों में उल्लेखनीय कमी दर्ज होती है।

Rohan Verma@rohan-verma·6 दिन पहले

यह सफलता दर्शाती है कि कृषि और ग्रामीण विकास में सरकारी अनुदान और सौर ऊर्जा व ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों का सही मेल किस तरह से पारंपरिक खेती की तस्वीर बदल सकता है। जब लामिया जैसे गांवों में किसान 4000 वर्ग मीटर के पॉलीहाउस से इस तरह की रिकॉर्ड आमदनी हासिल करते हैं, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ युवाओं के लिए खेती को एक आकर्षक व्यावसायिक उद्यम के रूप में स्थापित करता है।

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