संसद के भीतर पेपर लीक के मुद्दे पर केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने देश में प्राथमिक शिक्षा के ढांचे को लेकर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि पिछले दस वर्षों के दौरान देश भर में करीब एक लाख सरकारी प्राइमरी स्कूल बंद कर दिए गए हैं, जिनमें सबसे बड़ा नुकसान उत्तर प्रदेश को हुआ है। विपक्षी नेता के इस दावे के बाद प्राथमिक शिक्षा की स्थिति और स्कूलों के बंद होने को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। हालांकि नीति आयोग की एक हालिया रिपोर्ट इस मामले में कुछ अलग और महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखती है।
संसद में अखिलेश यादव के गंभीर आरोप
संसदीय कार्यवाही के दौरान समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने केंद्र सरकार पर सीधा हमला करते हुए कहा कि जब से भाजपा सत्ता में आई है, तब से उसने देश की शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं और विश्वविद्यालयों पर लगातार चोट पहुंचाई है। उनका तर्क था कि सरकार शिक्षा के पूरे बुनियादी ताने-बाने को नष्ट करना चाहती है। उन्होंने कहा कि बच्चों की शिक्षा की नींव ही प्राथमिक विद्यालयों से शुरू होती है, लेकिन सरकार ने सबसे पहले इन्हीं प्राथमिक स्कूलों को अपना निशाना बनाया है।
सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए सपा प्रमुख ने सदन को बताया कि बीते 10 साल में देशभर के एक लाख के करीब प्राइमरी स्कूल बंद कर दिए गए हैं। उन्होंने विशेष रूप से उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि अकेले यूपी में ही 26386 प्राथमिक स्कूल बंद किए जा चुके हैं। अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि सरकार की नीतियां गरीब, दलित और पिछड़े वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रखने की ओर लक्षित हैं, ताकि वे पढ़ाई-लिखाई करके आगे न बढ़ सकें। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर नींव ही कमजोर कर दी जाएगी, तो उस पर भविष्य की मजबूत इमारत खड़ी नहीं हो सकती।
नीति आयोग की रिपोर्ट का सच और सरकारी आंकड़े
अखिलेश यादव द्वारा सदन में पेश किए गए आंकड़ों का परीक्षण करने पर नीति आयोग की आधिकारिक रिपोर्ट से कई अहम जानकारियां सामने आती हैं। मई महीने की शुरुआत में नीति आयोग ने 'भारत में स्कूली शिक्षा प्रणाली' शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक की थी। इस रिपोर्ट के अनुसार, बीते एक दशक में देशभर में सरकारी स्कूलों की संख्या में लगभग 94 हजार की कमी दर्ज की गई है। हालांकि रिपोर्ट में इन्हें पूरी तरह से बंद किए जाने के बजाय स्कूलों का विलय और पुनर्गठन बताया गया है।
रिपोर्ट के सांख्यिकीय विवरण के अनुसार, वर्ष 2014-15 में देश भर में सरकारी स्कूलों की कुल संख्या 11.07 लाख थी। दस साल बाद, वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर 10.13 लाख रह गया है। इस प्रकार कुल 94 हजार स्कूलों की कमी आई है। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि जिन प्राथमिक विद्यालयों में छात्रों की नामांकन संख्या काफी कम रह गई थी, उन्हें बंद करने के बजाय पास के अन्य प्राथमिक विद्यालयों के साथ मिला दिया गया है, ताकि संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके और अध्यापकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
प्राइवेट स्कूलों की बढ़ोतरी और छात्रों के नामांकन का रुझान
नीति आयोग की इस रिपोर्ट में एक तरफ जहां सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की संख्या घटने की बात कही गई है, वहीं दूसरी ओर निजी शिक्षण संस्थानों के तेजी से उभार को रेखांकित किया गया है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014-15 में देश के भीतर कुल 2.88 लाख प्राइवेट स्कूल संचालित हो रहे थे। पिछले 10 वर्षों में इनकी संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और वर्ष 2024-25 में देश भर में प्राइवेट स्कूलों का आंकड़ा बढ़कर 3.39 लाख तक पहुंच चुका है।
इसके अलावा, रिपोर्ट में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों को मिलाकर छात्रों के कुल नामांकन में आई गिरावट का भी उल्लेख किया गया है। वर्ष 2014-15 में देश के स्कूलों में कुल 26.95 करोड़ छात्र अध्ययनरत थे, जो कि 10 वर्षों के अंतराल के बाद घटकर 24.69 करोड़ रह गए हैं। शिक्षा क्षेत्र के लिए चिंता की बात यह भी है कि उच्च प्राथमिक कक्षाओं से माध्यमिक विद्यालयों में प्रवेश करने वाले छात्रों की दर में भी गिरावट आई है। आंकड़ों के मुताबिक, 10 साल पहले उच्च प्राथमिक से माध्यमिक स्तर पर जाने वाले छात्रों का प्रतिशत 91.58 था, जो अब घटकर 86.6 प्रतिशत पर आ गया है।
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बड़े पैमाने पर स्कूलों का विलय
नीति आयोग की रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट होता है कि देश के दो प्रमुख राज्यों, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में प्राथमिक विद्यालयों के विलय का काम सबसे व्यापक स्तर पर किया गया है। जहां सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में 26386 स्कूलों को बंद करने की बात कही, वहीं नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश को मिलाकर लगभग 40 हजार प्राथमिक स्कूलों का एक-दूसरे में विलय किया गया है।
प्रशासनिक स्तर पर इस विलय प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को आसपास के बेहतर और बड़े प्राथमिक परिसरों में समाहित करना है। हालांकि, विपक्षी दल इसे प्राथमिक शिक्षा पर हमला और गरीबों को शिक्षा से दूर करने की साजिश करार दे रहे हैं। अखिलेश यादव का कहना है कि प्राथमिक स्कूल बच्चों की पूरी शैक्षणिक यात्रा का आधार होते हैं और इस तरह की नीतियां गरीब बच्चों के भविष्य को सीधा नुकसान पहुंचा रही हैं।



















