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सोशल मीडिया पर छाए 80 के दशक के ट्रेंड ने ताजा की पुराने फोटो स्टूडियो और रील कैमरों की यादें, देहरादून के लोगों ने साझा किए अपने अनुभवउत्तराखंड
13 सित॰ 2026, 12:37 pm (9 दिन पहले)· 2

सोशल मीडिया पर छाए 80 के दशक के ट्रेंड ने ताजा की पुराने फोटो स्टूडियो और रील कैमरों की यादें, देहरादून के लोगों ने साझा किए अपने अनुभव

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे 80 के दशक के रेट्रो ट्रेंड ने लोगों को रील कैमरे और फोटो स्टूडियो के पुराने दिनों की याद दिला दी है। देहरादून के निवासियों ने कैमरे की 36 फोटो वाली रील से लेकर तस्वीरों के लंबे इंतजार तक के अपने अनूठे किस्से साझा किए हैं।

आज के डिजिटल युग में स्मार्टफोन का एक बटन दबाते ही उच्च गुणवत्ता वाली फोटो तुरंत सामने आ जाती है। यदि तस्वीर पसंद न आए तो उसे पलक झपकते हटाकर दूसरी फोटो खींच ली जाती है। हालांकि, कुछ दशक पहले स्थिति पूरी तरह भिन्न थी। उस दौर में लोग कैमरे में 36 फोटो वाली फिल्म रील डालकर बेहद सोच समझकर हर तस्वीर क्लिक करते थे। रील पूरी होने के बाद उसे फोटो लैब में धुलने के लिए भेजा जाता था, जिसके बाद प्रिंट होकर आने वाली तस्वीरों के लिए कई दिनों और कभी कभी महीनों तक इंतजार करना पड़ता था। आजकल सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा 80 के दशक का रेट्रो ट्रेंड लोगों को उसी दौर की यादों में वापस ले गया है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के निवासियों ने इस ट्रेंड के बहाने अपने बचपन, फोटो स्टूडियो की संस्कृति और पुराने समय के धैर्य को याद किया है।

36 फोटो वाली रील और तस्वीरों का लंबा इंतजार

पुराने समय में फोटोग्राफी आज जितनी आसान या तुरंत परिणाम देने वाली नहीं थी। उस दौर में ली गई तस्वीरें भले ही आज की एचडी स्क्रीन जैसी बहुत साफ या स्पष्ट नहीं होती थीं, कई बार फोटो में थोड़ा धुंधलापन होता था या किनारे कट जाते थे, लेकिन उन भौतिक तस्वीरों को हाथ में पकड़कर देखने का आनंद ही कुछ अलग था। आज लोग मोबाइल की गैलरी में जमा हजारों डिजिटल तस्वीरों के बीच उलझकर रह जाते हैं, जबकि पुराने समय के फोटो एलबम में संभालकर रखी गई वही थोड़ी धुंधली तस्वीरें आज भी बचपन की अनमोल यादों को सहेजे हुए हैं।

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उस जमाने में हर एक फोटो का अपना विशेष महत्व होता था क्योंकि 36 क्लिक वाली रील सीमित होती थी। लोग शादी, जन्मदिन या किसी विशेष पारिवारिक अवसर पर ही कैमरे का उपयोग करते थे। जब रील खत्म होती थी, तो उसे सुरक्षित निकालकर स्टूडियो में प्रोसेसिंग के लिए दिया जाता था। फोटो धुलने में लगने वाला समय और फिर लिफाफे से एलबम की तस्वीरें निकालने का उत्साह एक अनोखा अनुभव हुआ करता था।

फोटो स्टूडियो की तैयारी और तैयार होकर जाने का उत्साह

देहरादून के रहने वाले राघव ने इस वायरल ट्रेंड पर अपने विचार साझा करते हुए बताया कि सोशल मीडिया पर 80 के दशक के फैशन और फोटोग्राफी के अंदाज को दोबारा देखा जाना बेहद सुखद अनुभव है। उन्होंने अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए कहा कि उस समय इंटरनेट या मोबाइल फोन नहीं हुआ करते थे। किसी खास मौके पर परिवार या दोस्तों के साथ फोटो खिंचवाने के लिए बाकायदा तैयार होकर फोटोग्राफर के पास जाना पड़ता था।

राघव के अनुसार, भले ही उस जमाने में तस्वीरों की तकनीकी गुणवत्ता आज की तुलना में बहुत साधारण होती थी, लेकिन आज जब वह अपने घर की पुरानी फोटो एलबम खोलते हैं, तो उन्हें लगता है जैसे उनका बचपन दोबारा उनके सामने जीवंत हो उठा है। उन्होंने बताया कि उस दौर में फोटो खिंचवाने के लिए लोग विशेष रूप से सजते संवरते थे। फोटो खिंचवाने के बाद उसे देखने का जो उत्साह और खुशी होती थी, उसे आज के डिजिटल दौर में भुलाना बेहद मुश्किल है।

पिता के दौर के फैशन को दोबारा जीने की ललक

इसी ट्रेंड पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए शाश्वत गोसाई ने बताया कि सोशल मीडिया पर चल रहे इस 80 के दशक के रेट्रो लुक ने उनके मन में पुरानी यादों को ताजा कर दिया है। उन्होंने कहा कि जिस तरह की पोशाकें और हेयरस्टाइल वह अपने पिता की पुरानी तस्वीरों में देखा करते थे, आज उसी लुक को युवाओं द्वारा अपनाते देखना एक अलग ही नॉस्टैल्जिया पैदा करता है।

शाश्वत गोसाई ने फोटोग्राफी की पुरानी व्यवस्था को याद करते हुए बताया कि पहले फोटो खिंचवाने के लिए विशेष रूप से स्टूडियो जाना पड़ता था। समय बदलने के साथ फोटो शूट के लिए किराए पर कमरे भी मिलने लगे थे और लोगों को अलग से कैमरे की रील खरीदनी पड़ती थी। आज की तरह कुछ ही मिनटों में फोटो देखना तब असंभव था, तस्वीरों के लिए कई दिनों या महीनों का इंतजार स्वाभाविक था। मुस्कुराते हुए उन्होंने अपनी 10वीं कक्षा के फेयरवेल का एक मजेदार किस्सा भी साझा किया। उन्होंने बताया कि दसवीं के फेयरवेल के दौरान उन्होंने एक फोटो खिंचवाई थी जो आज तक उन्हें नहीं मिल सकी। उन्होंने मजाक में कहा कि शायद वह तस्वीर आज भी किसी लैब में धुल ही रही है।

फैशन के साथ पुराने दौर के मूल्यों और धैर्य को अपनाने की सीख

सोशल मीडिया पर इस रेट्रो ट्रेंड को लेकर लोगों की मिली जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे सिर्फ एक अस्थाई इंटरनेट ट्रेंड मान रहे हैं जो कुछ दिनों बाद गायब हो जाएगा, जबकि कई लोग इसे पुराने यादगार दिनों से जोड़कर देख रहे हैं। देहरादून के संदीप बिष्ट ने इस विषय पर अपना नजरिया रखते हुए कहा कि यह देखना वास्तव में अच्छा लगता है कि नई पीढ़ी पुरानी शैलियों और फैशन में रुचि ले रही है।

हालांकि, संदीप बिष्ट का मानना है कि केवल 80 के दशक के कपड़े पहनना या पुरानी हेयरस्टाइल अपनाना ही पर्याप्त नहीं है। आज के युवाओं को उस दौर की संस्कृति, उच्च नैतिक मूल्यों, धैर्य और सादगी को भी अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उस समय के लोगों में सब्र बहुत अधिक था, जीवन में दिखावा कम था और लोग बहुत सहजता से जीवन जीते थे। अगर आज की पीढ़ी सिर्फ बाहरी फैशन ही नहीं बल्कि उस दौर की अच्छी सोच और जीवन मूल्यों को भी अपनाए, तो यह ट्रेंड वास्तव में सार्थक साबित होगा।

सवाल-जवाब

सोशल मीडिया पर कौन सा ट्रेंड वायरल हो रहा है?
सोशल मीडिया पर 80 के दशक का रेट्रो ट्रेंड ('80s trend viral') वायरल हो रहा है, जिसमें लोग उस दौर के फैशन, स्टाइल और फोटोग्राफी को याद कर रहे हैं।
80 के दशक में फोटो खिंचवाने की प्रक्रिया आज से कैसे अलग थी?
उस समय 36 फोटो वाली रील का उपयोग किया जाता था और रील पूरी होने के बाद फोटो लैब में धुलने के लिए दी जाती थी, जिसके बाद तस्वीरों के लिए कई दिनों या महीनों का इंतजार करना पड़ता था।
देहरादून निवासी शाश्वत गोसाई ने कौन सा मजेदार किस्सा सुनाया?
उन्होंने अपनी 10वीं कक्षा के फेयरवेल की फोटो का किस्सा सुनाया जो उन्हें आज तक नहीं मिली और मजाक में कहा कि वह शायद अभी भी लैब में धुल रही है।
संदीप बिष्ट ने युवाओं को केवल फैशन अपनाने के अलावा क्या सुझाव दिया?
संदीप बिष्ट ने सुझाव दिया कि युवाओं को 80 के दशक के फैशन के साथ-साथ उस दौर की सादगी, धैर्य और उच्च नैतिक मूल्यों को भी अपने जीवन में शामिल करना चाहिए।
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