भारतीय न्याय प्रणाली में मानवीय दृष्टिकोण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने 105 वर्ष के बुजुर्ग कैदी की आजीवन कारावास की शेष बची सजा को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। तीन न्यायाधीशों की पीठ ने अपने अंतिम निर्णय में स्पष्ट किया कि जीवन के इस अंतिम पड़ाव में किसी भी व्यक्ति को दोबारा जेल की सलाखों के पीछे भेजना न तो व्यावहारिक दृष्टिकोण से सही है और न ही इससे किसी नैतिक उद्देश्य की पूर्ति होती है। इस फैसले के साथ ही अदालत ने बुजुर्ग याचिकाकर्ता के खिलाफ लंबित सभी कानूनी कार्यवाहियों को औपचारिक रूप से बंद करने का निर्देश दिया है।
सर्वोच्च अदालत का ऐतिहासिक और मानवीय फैसला
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने इस विशेष मामले की सुनवाई करते हुए पूर्व में दी गई राहत को स्थायी कर दिया। इससे पहले न्यायालय ने नवंबर 2024 में बुजुर्ग की बिगड़ती सेहत और अत्यधिक उम्र को ध्यान में रखते हुए उन्हें अंतरिम जमानत तथा पैरोल प्रदान की थी। अब उसी अंतरिम राहत को पूर्ण आदेश में परिवर्तित करते हुए पीठ ने उन्हें स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस दौरान कहा कि भले ही सजा की औपचारिक अवधि पूरी न हुई हो, फिर भी उन्हें वापस हिरासत में नहीं भेजा जाएगा।
मालदा का 1988 का मामला और दशकों लंबी कानूनी जंग
यह पूरा मामला पश्चिम बंगाल के मालदा जिले का है, जहां वर्ष 1988 में हुई एक हत्या के सिलसिले में रसिक चंद्र मोंडल नाम के व्यक्ति को आरोपी बनाया गया था। वर्ष 1920 में जन्मे रसिक चंद्र मोंडल को दिसंबर 1994 में निचली अदालत ने दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। जिस समय उन्हें यह कठोर सजा सुनाई गई, उस दौरान भी उनकी उम्र 68 वर्ष हो चुकी थी। इसके बाद उन्होंने कानूनी विकल्पों का सहारा लेते हुए सजा के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी और लगभग तीन दशक का समय जेल के भीतर व्यतीत किया।
उनकी सजा के खिलाफ दायर अपील को कलकत्ता हाईकोर्ट ने वर्ष 2018 में खारिज कर दिया था। इसके पश्चात मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने भी निचली अदालतों के फैसले को सही मानते हुए उनकी याचिका निरस्त कर दी थी और उम्रकैद को बरकरार रखा था। इस प्रकार कानूनी तौर पर उनके पास रिहाई के रास्ते लगभग बंद हो चुके थे, लेकिन जेल में बिताए गए लंबे समय के दौरान उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता चला गया।
99 वर्ष की आयु में याचिका से लेकर स्थायी आजादी तक
अदालती स्तर पर बार-बार झटके लगने के बावजूद रसिक चंद्र मोंडल ने न्याय की आस नहीं छोड़ी। वर्ष 2020 में जब वे 99 वर्ष के हो चुके थे, तब उन्होंने अपनी गंभीर शारीरिक बीमारियों, लाचारी और अत्यधिक वृद्धावस्था का ब्योरा देते हुए शीर्ष अदालत में सीधे एक रिट याचिका दाखिल की। इस याचिका के माध्यम से उन्होंने मानवीय आधार पर समय पूर्व रिहाई का अनुरोध किया था।
न्यायालय ने उनकी शारीरिक स्थिति की समीक्षा करने के बाद नवंबर 2024 में अंतरिम राहत दी थी। हालिया सुनवाई में शीर्ष अदालत ने यह निर्णय लिया कि अब इस मामले को हमेशा के लिए बंद कर दिया जाए। पीठ ने अपने फैसले के प्रमुख बिंदुओं में यह रेखांकित किया कि अंतरिम जमानत को पूर्ण स्वतंत्रता में बदला जा रहा है, शेष पूरी सजा माफ की जा रही है और उन्हें दोबारा हिरासत में नहीं लिया जाएगा।
शीर्ष अदालत का स्पष्ट रुख और न्याय का संदेश
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने देश के कानूनी और सामाजिक हलकों में एक गहरा संदेश दिया है। अदालत ने यह दर्शाया है कि कानून की कठोरता और मानवाधिकारों के संरक्षण के बीच एक संतुलन स्थापित करना न्यायपालिका का प्रमुख कर्तव्य है। 105 वर्ष की आयु तक पहुंच चुके देश के संभवतः सबसे बुजुर्ग कैदी को मिली यह आजादी यह साबित करती है कि भारतीय अदालते केवल दंड देने का कार्य नहीं करतीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर करुणा और मानवीय संवेदना को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देती हैं।



















