सुप्रीम कोर्ट ने भ्रूण लिंग परीक्षण और लिंग चयन से जुड़े मामलों में पुलिस की शक्तियों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि प्री-कॉन्सेप्शन और प्री-नेटल डायग्नोस्टिक तकनीक (लिंग चयन पर रोक) अधिनियम, 1994 (PCPNDT Act) के तहत होने वाले उल्लंघनों की जांच करने या सीधे एफआईआर दर्ज करने का अधिकार आम तौर पर पुलिस के पास नहीं है। सर्वोच्च अदालत के अनुसार, इस कानून के तहत प्राथमिक जांच की जिम्मेदारी केवल अधिकृत प्राधिकारियों के पास ही सीमित रखी गई है।
पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत पुलिस की भूमिका पर बड़ा फैसला
उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य बनाम बृज पाल सिंह के मामले में फैसला सुनाते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ ने साफ किया कि पुलिस इस कानून के तहत मुख्य जांच एजेंसी के रूप में काम नहीं कर सकती। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले पर अपनी सहमति व्यक्त की, जिसमें कहा गया था कि पुलिस PCPNDT Act के तहत दर्ज मामलों में न तो स्वतंत्र रूप से जांच कर सकती है और न ही प्राथमिक सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कर सकती है।
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि कानून के प्रावधानों के अनुसार पुलिस को जहां तक संभव हो ऐसे मामलों से दूर रखा जाना चाहिए। यदि इस विशेष अधिनियम के तहत गठित उचित प्राधिकारी (Appropriate Authority) को किसी विशिष्ट परिस्थिति में सहायता की आवश्यकता महसूस होती है, तो पुलिस केवल एक सहायक या सहयोगी भूमिका निभा सकती है। इससे इतर पुलिस अपनी मर्जी से सीधे संज्ञान लेकर कार्रवाई शुरू नहीं कर सकती।
विशेषज्ञता और मेडिकल संवेदनशीलता का हवाला
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि PCPNDT Act एक विशेष और तकनीकी प्रकृति का कानून है। ऐसे मामलों की पड़ताल के लिए चिकित्सा संबंधी ज्ञान, विशेष समझ और अत्यधिक संवेदनशीलता की दरकार होती है। यही वजह है कि विधायिका ने इस कानून के तहत अपराधों की जांच का जिम्मा सामान्य पुलिस तंत्र को सौंपने के बजाय तकनीकी रूप से सक्षम और अधिकृत अधिकारियों को दिया है।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि एक बार पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज कर लिए जाने के बाद, मामले को इस विशेष अधिनियम में निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं के अनुसार किसी तार्किक और वैध निष्कर्ष तक पहुंचाना कठिन हो जाता है। पुलिस की सामान्य कार्यप्रणाली इस कानून की बारीकियों और विशेष प्रक्रियाओं के साथ तालमेल नहीं बिठा पाती, जिससे कानूनी जटिलताएं पैदा होती हैं।
धारा 17(4) और स्वतंत्र आपराधिक मामलों पर असर
पीठ ने कानून की धारा 17(4) का उल्लेख करते हुए बताया कि अधिनियम में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान किया गया है कि अपराधों से संबंधित शिकायतें प्राप्त करना, उनकी छानबीन करना और आवश्यक कानूनी कदम उठाना पूरी तरह से निर्दिष्ट एजेंसियों का कार्य है। इस वैधानिक ढांचे का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जांच प्रक्रिया पारदर्शी और विशेषज्ञता पर आधारित हो।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह बेहद महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया कि यह पाबंदी केवल PCPNDT Act के अंतर्गत आने वाले अपराधों तक ही सीमित है। यदि किसी मामले में मुख्य आपराधिक कानून के तहत कोई स्वतंत्र अपराध बनता है, तो उसकी जांच करने, प्राथमिकी दर्ज करने और मुकदमा चलाने की पुलिस की शक्तियों पर इस फैसले का कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। यानी सामान्य आपराधिक धाराओं में पुलिस की जांच करने की शक्तियां पूरी तरह से बरकरार रहेंगी।



















