तहलका पत्रिका के 63 वर्षीय पूर्व संपादक तरुण तेजपाल ने वर्ष 2013 के गोवा बलात्कार मामले में अपनी दोषसिद्धि और 10 साल के कठोर कारावास की सजा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। यह याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा सुनाए गए उस फैसले के खिलाफ दायर की गई है, जिसमें उच्च न्यायालय ने 6 अगस्त को 63 वर्षीय तरुण तेजपाल को बलात्कार का दोषी ठहराया था। हाईकोर्ट ने सजा के साथ-साथ आरोपी पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था। इस फैसले के जरिए बॉम्बे हाईकोर्ट ने सेशंस कोर्ट के पांच साल पुराने उस निर्णय को पूरी तरह पलट दिया था, जिसमें तरुण तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था।
बॉम्बे हाईकोर्ट की कठोर टिप्पणी और सजा का आधार
मामले की सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट की पीठ ने पीड़िता के बयान को पूरी तरह भरोसेमंद और विश्वसनीय करार दिया था। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था कि घटना के समय 63 वर्षीय आरोपी तरुण तेजपाल एक ऐसी स्थिति में थे जहां उनके पास 'भरोसा, अधिकार और दबदबा' हासिल था। कोर्ट ने माना कि आरोपी ने अपने इस प्रभाव का अनुचित लाभ उठाया। इसके साथ ही अदालत ने 10 साल की कठोर जेल की सजा और 10 लाख रुपये का आर्थिक जुर्माना लगाते हुए कानून के तहत सख्त संदेश देने का प्रयास किया था।
निचली अदालत के रवैये पर हाईकोर्ट के गंभीर सवाल
बॉम्बे हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा मामले की सुनवाई के दौरान अपनाए गए दृष्टिकोण पर गहरी चिंता जताई थी। उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि सेशंस कोर्ट का पूरा ध्यान मुख्य रूप से पीड़िता के चरित्र और व्यवहार की जांच करने पर केंद्रित दिखाई दे रहा था। हाईकोर्ट के शब्दों में स्थिति ऐसी प्रतीत हो रही थी जैसे कि अदालत में केवल आरोपी का ही नहीं, बल्कि पीड़िता और आरोपी दोनों का समान रूप से ट्रायल चलाया जा रहा हो। अदालत ने इस तरह की अदालती प्रक्रिया को अनुचित माना था।
पावर डायनामिक्स और व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप की आलोचना
हाईकोर्ट की बेंच ने सुनवाई के दौरान पीड़िता के व्यक्तिगत और निजी जीवन में अत्यधिक दखल देने वाली तथा बार-बार की जाने वाली जिरह की भी कड़े शब्दों में आलोचना की थी। अदालत ने रेखांकित किया कि इस पूरे मामले में शक्ति का असंतुलन यानी पावर डायनामिक्स और उच्च पद तथा अधिकार का गलत इस्तेमाल ही सबसे मुख्य पहलू थे। अब इस पूरे फैसले को तरुण तेजपाल ने देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर समीक्षा की मांग की है।



















