वाहन चालकों द्वारा ट्रैफिक नियमों की अनदेखी और उसके बाद चालान न भरने की बढ़ती आदत पर देश की शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह मशविरा दिया गया कि अनपेड ई-चालान के जुर्माने की वसूली सुनिश्चित करने के लिए इसे सीधे बिजली के बिलों से जोड़ा जा सकता है। अदालत का यह विचार उन वाहन स्वामियों के लिए एक बड़ा संकेत है जो महीनों तक पेंडिंग चालान को नजरअंदाज करते रहते हैं, क्योंकि नियम लागू होने की स्थिति में जुर्माना न भरने पर घर की बिजली गुल होने का जोखिम खड़ा हो सकता है।
45,000 करोड़ रुपये के बकाया ई-चालान का बोझ
यह मामला जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ के समक्ष आया था। पीठ इलेक्ट्रॉनिक ट्रैफिक वॉयलेशन और उसके चलते अटके पड़े जुर्माने की वसूली से जुड़ी एक याचिका की पड़ताल कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह गंभीर आंकड़ा पेश किया गया कि देश के तमाम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 45,000 करोड़ रुपये के ई-चालान अभी भी बकाया हैं। अब तक इस विशाल धनराशि में से केवल 25,000 करोड़ रुपये की ही वास्तविक वसूली हो पाई है। अदालत ने माना कि बकाये के इस भारी बैकलॉग को खत्म करने और सड़कों पर चालकों के भीतर यातायात नियमों के प्रति जिम्मेदारी तय करने के लिए सख्त कानूनी व्यवस्था जरूरी है।
बिजली कटौती से लेकर गाड़ियां जब्त करने के सख्त विकल्प
सुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला ने जोर देकर कहा कि अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक ट्रैफिक चालान का भुगतान नहीं करता है, तो संबंधित अधिकारियों को उसके घर का बिजली कनेक्शन काटने जैसे कड़े विकल्पों पर विचार करना चाहिए। इसके अलावा पीठ ने यह भी कहा कि सड़कों पर रैंडम व्हीकल चेकिंग अभियान चलाए जाने चाहिए और जिन वाहनों पर पुराने चालान पेंडिंग हैं, उन्हें मौके पर ही जब्त किया जाए। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नियम तोड़ने वाले लोग बिना किसी जवाबदेही के अपनी गाड़ियां सड़कों पर न दौड़ा सकें।
वाहन सेवाओं पर रोक और पोर्टल पर ब्लैकलिस्टिंग की तैयारी
बेंच ने जुर्माना न भरने वालों के खिलाफ प्रशासनिक स्तर पर कई तरह की पाबंदियों का खाका भी सामने रखा। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि जब तक लंबित चालान की पूरी राशि जमा न कर दी जाए, तब तक वाहन चालक का ड्राइविंग लाइसेंस सस्पेंड रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट यानी आरसी के रिन्यूअल, वाहन के फिटनेस सर्टिफिकेट और पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल यानी पीयूसी सर्टिफिकेट जारी करने पर भी रोक लगाई जा सकती है। इसके अलावा डिफॉल्टर वाहनों को परिवहन पोर्टल पर ब्लैकलिस्ट करने, डुप्लीकेट आरसी जारी न करने और ओनरशिप ट्रांसफर जैसी जरूरी नागरिक सेवाओं को रोकने की बात भी कही गई है।
चर्चा के स्तर पर हैं सुझाव, अंतिम आदेश आना अभी बाकी
शीर्ष अदालत में सामने आए ये सभी उपाय फिलहाल सुनवाई के दौरान दी गई मौखिक टिप्पणियों और चर्चाओं का हिस्सा हैं। इसका अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक इस संबंध में कोई अंतिम नियम या बाध्यकारी निर्देश जारी नहीं किया है। फिर भी, अदालत के इस कड़े रुख से यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया है कि आने वाले समय में राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारें ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों से वसूली के लिए बेहद सख्त कानूनी और प्रशासनिक रास्ते अपना सकती हैं।



















