देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावी व्यवस्था बनाए रखने वाली सर्वोच्च संस्था निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और उसके शीर्ष अधिकारियों की चयन प्रक्रिया एक बार फिर गंभीर विमर्श के केंद्र में है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव परिणामों के उपरांत जब मतदाता सूचियों में असामान्य बढ़ोतरी के मुद्दे पर सवाल उठाए गए थे, तब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कड़ा रुख अपनाया था। उनका कहना था कि यदि मतदाता सूची में किसी नागरिक का नाम दो अलग-अलग स्थानों पर दर्ज है, तो उसने दोहरा मतदान करके कानूनी अपराध किया होगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह बात रखी थी कि मतदाताओं को संदिग्ध ठहराए जाने पर आयोग मौन नहीं रह सकता और ऐसे आरोपों पर या तो शपथपत्र प्रस्तुत किया जाना चाहिए अथवा देश से क्षमा मांगी जानी चाहिए। हालांकि, समय बीतने के साथ आयोग की अंदरूनी कार्यशैली और निर्णयों को लेकर विमर्श की दिशा पूरी तरह बदल चुकी है।
निर्वाचन आयोग के आंतरिक कामकाज को लेकर ऐसी जानकारियां सामने आईं कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार कथित तौर पर अपने दोनों साथी चुनाव आयुक्तों के परामर्श की अनदेखी करते हुए निर्णय ले रहे थे। इन बातों के सार्वजनिक होते ही आयोग ने स्थिति स्पष्ट करने के उद्देश्य से एक विज्ञप्ति जारी की। आयोग की ओर से कहा गया कि विभिन्न विषयों पर अलग दृष्टिकोण होना आंतरिक लोकतंत्र की खूबसूरती को दर्शाता है और संस्था के सभी नीतिगत फैसले पूर्ण सहमति तथा सामूहिकता के आधार पर ही लिए जाते हैं। आंतरिक मतभेदों की इस चर्चा के ठीक बाद उच्चतम न्यायालय में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की चयन प्रणाली से संबंधित कानूनी विवाद ने नया मोड़ ले लिया।
सर्वोच्च अदालत में दो जजों की पीठ के बीच असहमति
उच्चतम न्यायालय में वर्ष 2023 के उस अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी, जिसके माध्यम से मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की नई व्यवस्था लागू की गई है। इस मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के बीच आम सहमति नहीं बन सकी। दोनों न्यायाधीशों के भिन्न दृष्टिकोण के कारण इस विवाद को मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत के पास भेज दिया गया है, ताकि वे इसे अंतिम निर्णय हेतु किसी बड़ी अथवा संवैधानिक पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्णय ले सकें। हालांकि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा का मत था कि इस विषय को सीधे पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए, जबकि जस्टिस दीपांकर दत्ता का मानना था कि दो जजों की पीठ भी इस पर अपना फैसला सुनाने में पूरी तरह सक्षम है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अपने विस्तृत आदेश में केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई नई चयन प्रक्रिया के पूरे ढांचे पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराईं। उन्होंने रेखांकित किया कि शीर्ष अदालत ने वर्ष 2023 के बहुचर्चित अनूप बरनवाल प्रकरण में यह सिद्धांत स्थापित कर दिया था कि निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था में शीर्ष नियुक्तियों पर कार्यपालिका का एकतरफा अधिकार नहीं हो सकता। ऐसे में अदालत के समक्ष मूल प्रश्न केवल यही रह गया था कि क्या दिसंबर 2023 में संसद द्वारा पारित नया कानून पूर्व में स्थापित इस संवैधानिक सिद्धांत की कसौटियों पर खरा उतरता है या नहीं।
जस्टिस दीपांकर दत्ता के चार बुनियादी सवाल
वर्तमान चयन समिति के स्वरूप पर विस्तार से विचार करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता ने चार अत्यंत महत्वपूर्ण पहलुओं की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस प्रकार की त्रिस्तरीय समिति का गठन किया गया है, उसमें संरचनात्मक स्तर पर ही निष्पक्षता का अभाव दिखाई देता है
- कैबिनेट मंत्री की निष्पक्षता का सवाल: जस्टिस दत्ता ने रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री द्वारा नामित कोई भी केंद्रीय कैबिनेट मंत्री पूरी तरह स्वतंत्र रहकर निर्णय नहीं ले सकता। संसदीय प्रणाली के अंतर्गत प्रत्येक मंत्री सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत से बंधा होता है, जिसके चलते वह समिति में अपने ही प्रधानमंत्री की प्राथमिकताओं के विपरीत जाकर मतदान या फैसला नहीं कर सकता।
- विपक्ष के नेता की प्रतीकात्मक उपस्थिति: चयन समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री के शामिल होने से सत्ता पक्ष के पास पहले से ही दो सदस्यों का संख्याबल सुनिश्चित रहता है। ऐसे में तीन सदस्यीय समिति में लोकसभा में विपक्ष के नेता की भूमिका केवल एक औपचारिक या प्रतीकात्मक उपस्थिति बनकर रह जाती है, क्योंकि अंतिम निर्णय हमेशा दो-एक के संख्याबल से सरकार की मर्जी के अनुरूप ही होगा।
- क्रिकेट अंपायर का सटीक उदाहरण: जस्टिस दत्ता ने इस असंतुलन को स्पष्ट करने के लिए खेल के मैदान का दृष्टांत दिया। उन्होंने कहा कि यदि किसी क्रिकेट मैच में खेलने वाली या जीतने वाली टीम के कप्तान को ही मैच के अंपायर को चुनने का अधिकार सौंप दिया जाए, तो वह अंपायर मैदान पर कितने भी निष्पक्ष निर्णय क्यों न दे, उसका हर फैसला सदैव संदेह के घेरे में ही रहेगा।
- जनता का परसेप्शन टेस्ट: लोकतंत्र में केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि निष्पक्ष दिखना भी उतना ही अनिवार्य है। संवैधानिक व्यवस्था के आधार स्तंभ के रूप में स्थापित निर्वाचन आयोग के संदर्भ में जनमानस में यह संदेश कतई नहीं जाना चाहिए कि संस्था की बागडोर संभालने वाले अधिकारियों की नियुक्ति एकतरफा राजनीतिक प्रभाव के तहत की जा रही है।
- कॉलेजियम प्रणाली से अंतर: उन्होंने जजों की नियुक्ति वाली कॉलेजियम प्रणाली से चुनाव आयुक्तों की चयन व्यवस्था की तुलना को भी अनुचित ठहराया। न्यायपालिका में नियुक्तियों के दौरान खुफिया ब्यूरो की पृष्ठभूमि जांच, सरकारी स्तर पर नाम आगे बढ़ाने की प्रक्रिया और कई चरणों की प्रशासनिक पड़ताल शामिल होती है। इसके अलावा देश के पूरे चुनावी तंत्र को संचालित करने वाली संस्था की चयन प्रक्रिया की तुलना अन्य प्रणालियों से सीधे तौर पर नहीं की जा सकती।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का संवैधानिक और कानूनी इतिहास
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 में निर्वाचन आयोग के गठन और आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान करते हुए यह अपेक्षा की गई थी कि संसद इस विषय पर उचित कानून बनाएगी। विडंबना यह रही कि वर्ष 1950 से लेकर वर्ष 2023 तक, यानी पूरे 73 वर्षों के दौरान, किसी भी सरकार ने इस संबंध में स्पष्ट कानून बनाने की पहल नहीं की। इस कानूनी शून्यता को समाप्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अनूप बरनवाल मामले की सुनवाई करते हुए मार्च 2023 में एक ऐतिहासिक अंतरिम व्यवस्था दी थी। उस व्यवस्था के अनुसार चयन समिति में देश के प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया गया था, जो संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक प्रभावी रहनी थी।
केंद्र सरकार ने दिसंबर 2023 में संसद से नया अधिनियम पारित करवाकर इस व्यवस्था को बदल दिया। नए कानून में भारत के मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से बाहर कर दिया गया और उनके स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर लिया गया। याचिकाकर्ताओं ने इसी बदलाव को अदालत में चुनौती दी है, क्योंकि इससे चयन समिति में कार्यपालिका का स्पष्ट बहुमत स्थापित हो गया है।
आयोग के इतिहास में 1993 का अहम मोड़
निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और सरकार के साथ उसके संबंधों का इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने अपने साक्षात्कारों में यह साझा किया था कि जब वे कैबिनेट सचिव के पद पर कार्यरत थे, तब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी तय करते थे कि चुनाव कब कराए जाने हैं और आयोग मात्र उन तिथियों की घोषणा करता था।
जब टीएन शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यभार संभाला और वर्ष 1993 में पूरी तरह स्वायत्तता के साथ कड़े नियम लागू करने शुरू किए, तब तत्कालीन पीवी नरसिंह राव सरकार को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। शेषन के एकतरफा निर्णयों को संतुलित करने के लिए सरकार ने एक अध्यादेश के माध्यम से निर्वाचन आयोग को एक सदस्यीय निकाय से बदलकर तीन सदस्यीय आयोग बना दिया। इसके तहत जीवीजी कृष्णमूर्ति और एमएस गिल को नया चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। आयोग के भीतर किसी भी मतभेद की स्थिति में बहुमत से निर्णय लेने का नियम बनाया गया, जबकि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों के वेतन, भत्ते, पद और अधिकारों को पूरी तरह एक समान रखा गया।

















