भारत के स्वदेशी रक्षा विनिर्माण और सैन्य विमानन कार्यक्रम ने एक बेहद महत्वपूर्ण मील का पत्थर पार कर लिया है। देश में 4.5 पीढ़ी के मीडियम वेट फाइटर जेट के तौर पर तैयार हो रहे तेजस Mk2 के पहले प्रोटोटाइप के एयरफ्रेम की स्ट्रक्चरल असेंबली का कार्य सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। विमान निर्माण की दुनिया में एयरफ्रेम की पूर्ण असेंबली को बुनियादी और सबसे जटिल पड़ावों में गिना जाता है। अब तक यह परियोजना कंप्यूटर डिजाइन, सिमुलेशन और अलग-अलग हिस्सों के निर्माण तक सीमित थी, लेकिन एयरफ्रेम जुड़ने के साथ ही यह संपूर्ण विमान के स्तर पर सिस्टम इंटीग्रेशन और जमीनी परीक्षणों के दौर में दाखिल हो चुकी है।
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने इस पहले प्रोटोटाइप के तीनों मुख्य हिस्सों फ्रंट, सेंटर और रियर फ्यूजलेज सेक्शन को एक साथ जोड़कर संपूर्ण एयरफ्रेम का ढांचा तैयार किया है। खास बात यह है कि इस परियोजना के लिए औपचारिक रूप से अनुबंध फाइनल न होने के बावजूद HAL ने प्रोटोटाइप निर्माण की गति धीमी नहीं पड़ने दी और लगातार काम जारी रखा। अब रक्षा वैज्ञानिकों और इंजीनियरों का पूरा ध्यान इसके आंतरिक तंत्रों को सक्रिय करने पर टिका हुआ है।
मार्च 2027 में पहला ग्राउंड रन, फिर शुरू होगा उड़ानों का सिलसिला
HAL के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर रवि कुमार के अनुसार, कंपनी मार्च 2027 तक तेजस Mk2 का पहला ग्राउंड रन संपन्न कराने का स्पष्ट लक्ष्य तय करके काम कर रही है। ग्राउंड रन परीक्षण प्रक्रिया का वह चरण होता है जिसमें विमान को रनवे पर दौड़ाकर उसके इंजन की क्षमता, ढांचागत मजबूती, एवियोनिक्स, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम और तमाम आंतरिक प्रणालियों के वास्तविक तालमेल को परखा जाता है। जब जमीनी सुरक्षा मानक और प्रदर्शन संतोषजनक साबित होंगे, उसके बाद ही इसे हवा में ले जाने की हरी झंडी दी जाएगी।
तय योजना के मुताबिक, ग्राउंड रन के कुछ ही महीनों बाद यानी वर्ष 2027 के मध्य से लेकर अंतिम महीनों के बीच तेजस Mk2 की पहली ऐतिहासिक उड़ान आयोजित की जाएगी। इस प्रोटोटाइप की पहली उड़ान भारत के एयरोस्पेस इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ेगी, क्योंकि यह देश का पहला स्वदेशी मीडियम वेट लड़ाकू विमान होगा जो उन्नत कैनार्ड-डेल्टा विंग कॉन्फिगरेशन के साथ आसमान में उतरेगा।
परीक्षणों के लिए बनेंगे चार प्रोटोटाइप, 2030 से लाइव वेपन ट्रायल
विमान के संपूर्ण विकास और प्रमाणीकरण को सुचारू रूप से पूरा करने के लिए HAL ने कुल 4 प्रोटोटाइप तैयार करने की ठोस रणनीति बनाई है। इनमें से शुरुआती दो प्रोटोटाइप मुख्य रूप से उड़ान सुरक्षा, विमान की एयरोडायनामिक्स स्थिरता और विभिन्न तकनीकी उपकरणों के बुनियादी एकीकरण की जांच के लिए इस्तेमाल किए जाएंगे। इन विमानों के जरिए विभिन्न ऊंचाइयों और गतियों पर विमान के व्यवहार को बारीकी से परखा जाएगा।
इसके बाद तैयार होने वाले तीसरे और चौथे प्रोटोटाइप को मुख्य रूप से मारक क्षमताओं और हथियार परीक्षणों के लिए समर्पित किया जाएगा। योजना के तहत लाइव हथियारों के परीक्षण का सघन चरण वर्ष 2030 के आसपास शुरू होगा। इन सभी परीक्षणों के संतोषजनक रहने पर तेजस Mk2 को वर्ष 2031 तक पूर्ण उत्पादन मंजूरी (फुल प्रोडक्शन क्लीयरेंस) मिल जाने की उम्मीद है, जिसके बाद इसे बड़े पैमाने पर वायुसेना के बेड़े के लिए तैयार किया जा सकेगा।
अमेरिकी F414 इंजन से मिलेगी उड़ान, 80 प्रतिशत तकनीक हस्तांतरण पर बात
तेजस Mk2 को जबरदस्त गति और ताकत देने के लिए अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस का F414-INS6 आफ्टरबर्निंग टर्बोफैन इंजन चुना गया है। यह नया इंजन मौजूदा तेजस Mk1 और तेजस Mk1A विमानों में इस्तेमाल हो रहे जीई F404 इंजन के मुकाबले कहीं अधिक शक्तिशाली है। प्रारंभिक परीक्षण उड़ानों और प्रोटोटाइप की जरूरतों को पूरा करने के लिए एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) ने पहले ही कुछ F414 इंजन हासिल कर लिए हैं।
भविष्य में बड़े पैमाने पर होने वाले उत्पादन को सुरक्षित और निरंतर बनाए रखने के लिए HAL और जीई एयरोस्पेस भारत में ही F414 इंजनों के संयुक्त उत्पादन की दिशा में गहन बातचीत कर रहे हैं। HAL के सीएमडी के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच तकनीकी मुद्दों का समाधान पहले ही निकाला जा चुका है। प्रस्तावित द्विपक्षीय समझौते में लगभग 80 प्रतिशत टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (तकनीक हस्तांतरण) का प्रावधान शामिल है। फिलहाल HAL को अमेरिकी कंपनी की ओर से अंतिम वाणिज्यिक प्रस्ताव का इंतजार है, जिसके मिलते ही कीमत, उत्पादन की समयसीमा और अन्य शर्तों को अंतिम रूप दिया जाएगा। भारत में इस इंजन का उत्पादन शुरू होने से लड़ाकू विमानों के लिए विदेशी आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी।
4.5 जेनरेशन की खूबियां और मैक 1.8 की रफ्तार
तेजस Mk2 को आधुनिक 4.5 पीढ़ी के मीडियम वेट फाइटर जेट के रूप में तैयार किया जा रहा है, जिसकी तुलना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राफेल जैसे विमानों की श्रेणी से की जाती है। मौजूदा तेजस Mk1A के मुकाबले इसका आकार बड़ा होगा और यह अधिक लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम होगा। इसमें लंबा एयरफ्रेम, क्लोज-कपल्ड कैनार्ड-डेल्टा विंग डिजाइन और इंजन को अधिक हवा देने के लिए बड़ा एयर इनटेक लगाया गया है।
F414 इंजन के दम पर यह विमान लगभग 98 किलो न्यूटन का शक्तिशाली थ्रस्ट पैदा करेगा। इसकी अधिकतम रफ्तार मैक 1.8 तक होगी और यह 50,000 फीट की सर्विस सीलिंग (अधिकतम परिचालन ऊंचाई) पर आसानी से उड़ान भरने में सक्षम होगा। इसके अलावा, पायलट को बेहतर सिचुएशनल अवेयरनेस देने के लिए इसमें स्वदेशी उत्तम AESA रडार और एक अत्यधिक परिष्कृत इंटीग्रेटेड इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट भी लगाया जा रहा है।
6.5 टन तक हथियार ले जाने की क्षमता, पुराने विमानों की लेगा जगह
मारक क्षमता के मामले में तेजस Mk2 बेहद घातक साबित होने वाला है। यह विमान अपने साथ करीब 6.5 टन तक हथियार और अन्य पेलोड ले जाने की क्षमता रखेगा। भारी पेलोड क्षमता को संभालने के लिए इसमें कुल 13 हार्डप्वाइंट दिए जा रहे हैं, जबकि शुरुआती तेजस Mk1 में केवल 8 हार्डप्वाइंट मौजूद हैं। इन अतिरिक्त पॉइंट्स की वजह से यह हवा से हवा, हवा से जमीन पर मार करने वाली मिसाइलों, सटीक बमों और अतिरिक्त ईंधन टैंकों को एक साथ ले जाने में सक्षम होगा।
भारतीय वायुसेना के दीर्घकालिक आधुनिकीकरण में तेजस Mk2 रीढ़ की हड्डी साबित हो सकता है। उत्पादन शुरू होने के बाद इसे भारतीय वायुसेना के पुराने पड़ रहे जगुआर, मिराज-2000 और मिग-29 लड़ाकू विमानों के बेड़े को चरणबद्ध तरीके से हटाने और उनकी जगह तैनात करने की योजना है।
रक्षा आयात पर खर्च बचेगा और बढ़ेगा निर्यात का दायरा
भारत वर्तमान में हर साल विदेशों से रक्षा उपकरणों और हथियारों के आयात पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करता है। तेजस Mk2 जैसे उन्नत प्लेटफार्म को पूरी तरह घरेलू तकनीक से तैयार करने से देश के भारी-भरकम वित्तीय संसाधनों की बचत होगी। इसके अलावा, हाल के वर्षों में भारत ने वैश्विक रक्षा बाजार में अपनी साख मजबूत की है, जहां ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल की खरीद के लिए कई देश उत्सुकता दिखा रहे हैं। यदि भारत लड़ाकू विमानों के निर्माण में पूर्ण आत्मनिर्भरता हासिल कर लेता है, तो मित्र देशों को फाइटर जेट का निर्यात करके विदेशी मुद्रा कमाने का एक बहुत बड़ा जरिया भी तैयार होगा।



















