79वें स्वतंत्रता दिवस 2026 के अवसर पर ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने आंतरिक सुरक्षा और नक्सलवाद की चुनौती पर अत्यंत महत्वपूर्ण बात रखी। 21वीं सदी के भारत के सामने मौजूद पुरानी रुकावटों का जिक्र करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि दशकों पुरानी समस्याओं को समाप्त करना अब देश की प्रगति के लिए बेहद आवश्यक हो चुका है। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने एक विशेष चेतावनी देते हुए कहा कि वर्तमान समय में हथियारों वाले नक्सलियों की तुलना में दिमागी नक्सली कहीं अधिक खतरनाक साबित हो रहे हैं और पूरा देश उनसे सुरक्षित रहना चाहिए।
नक्सल हिंसा का भयानक इतिहास और सुरक्षा बलों का बलिदान
भारत के बड़े भूभाग पर लगभग चार दशकों तक नक्सली और माओवादी हिंसा का कब्जा रहा। इस दौरान बंदूक के बल पर शासन चलाने का प्रयास किया गया और देश के संविधान को ताक पर रखा गया। इस हिंसक दौर ने लाखों युवाओं का भविष्य पूरी तरह तबाह कर दिया। अनगिनत माताओं ने अपने नवयुवक बेटों को खो दिया और हजारों परिवारों के सपने चकनाचूर हो गए। इस हिंसा के दौरान आम नागरिकों की रक्षा की अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर 3,500 से अधिक पुलिसकर्मियों और सुरक्षा बलों के जवानों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। नक्सलियों की हिंसा से देश की धरती खून से लाल होती रही, जिसे रोकना अत्यंत आवश्यक था।
2014 का दृढ़ संकल्प और माओवाद का अंतिम चरण
वर्ष 2014 में सरकार की बागडोर संभालने के पहले ही दिन से देश को नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त कराने का अटूट संकल्प लिया गया था। निरंतर प्रयासों और सख्त अभियानों के परिणामस्वरूप आज माओवादी और नक्सली हिंसा में खुद को बनाए रखने की शक्ति नहीं बची है। यह हिंसक विचारधारा अब अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर चुकी है। जिन क्षेत्रों में कभी केवल गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देती थी और मिट्टी लाल रहती थी, वहां आज विकास, विश्वास और प्रयास का तिरंगा पूरी शान से लहरा रहा है। वे तमाम क्षेत्र अब नक्सलवाद से मुक्त होने की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं।
दिमागी नक्सलवाद का बढ़ता खतरा और राष्ट्रीय सतर्कता
बंदूक की नोक पर हिंसा फैलाने वाले संगठन अब कमजोर पड़ चुके हैं, लेकिन वैचारिक रूप से समाज में जहर घोलने वाले दिमागी नक्सली देश की आंतरिक मजबूती के लिए बड़ा खतरा बन रहे हैं। पीएम नरेंद्र मोदी के अनुसार, 21वीं सदी में भारत को अपनी प्रगति की गति बनाए रखने के लिए ऐसी सभी पुरानी और नई रुकावटों को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। सुरक्षा बल जहां जमीनी स्तर पर सशस्त्र हिंसा को खत्म करने में सफल हुए हैं, वहीं समाज को इन दिमागी तत्वों से बचाना समय की सबसे बड़ी मांग है।



















