अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी उथल-पुथल के बीच विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को दुनिया की मौजूदा आर्थिक और कूटनीतिक दशा पर गहरी चिंता व्यक्त की। उनका कहना है कि इस समय पूरी दुनिया दो अत्यंत गंभीर संघर्षों के प्रभाव को झेल रही है, जिनमें से एक तनाव खाड़ी क्षेत्र में फैला है और दूसरा यूक्रेन में जारी है। इन दोनों ही संघर्षों में शामिल लगभग सभी पक्षों के साथ भारत के मैत्रीपूर्ण और गहरे संबंध हैं। इसी वजह से देश के लिए एक निष्पक्ष और पूरी तरह संतुलित दृष्टिकोण कायम रखना काफी चुनौतीपूर्ण काम साबित हो रहा है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापारिक चुनौतियों का नया रूप
विदेश मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में पैदा हो रही नई प्रवृत्तियों को रेखांकित करते हुए कहा कि आज व्यापार और आर्थिक नियमों का इस्तेमाल एक रणनीतिक हथियार की तरह किया जा रहा है। शुल्क संरचना यानी टैरिफ में आ रही भारी अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में माल की अनियंत्रित डंपिंग ऐसी प्रमुख समस्याएं हैं, जो सभी देशों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा कर रही हैं। इन विषम परिस्थितियों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं इन चुनौतियों का सामना सबसे प्रभावी और व्यावहारिक तरीकों से कैसे करें।
रणनीतिक संतुलन और भारत की बढ़ती जिम्मेदारियां
भारत की बदलती वैश्विक स्थिति पर चर्चा करते हुए एस जयशंकर ने स्पष्ट किया कि जैसे-जैसे देश के हित वैश्विक पटल पर विस्तृत हो रहे हैं, वैसे-वैसे हमारी रणनीतिक जिम्मेदारियां और जटिलताएं भी बढ़ रही हैं। आज भारत पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा देशों और अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों के साथ सक्रिय कूटनीतिक साझेदारी निभा रहा है। इस व्यापक वैश्विक जुड़ाव के कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भारत से अपेक्षाएं भी उसी अनुपात में बढ़ी हैं। विदेश मंत्री ने जोर देकर कहा कि तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य के अनुकूल बने रहने के लिए भारत को अपनी प्राथमिकताओं, रणनीतियों और प्रतिक्रिया तंत्र को लगातार नए सिरे से तैयार करते रहना होगा। कई बार सबसे बेहतर समाधान अलग-अलग प्राथमिकताओं के बीच सही तालमेल बिठाने से ही निकलता है।
ग्लोबल साउथ और स्वतंत्र भारतीय दृष्टिकोण की आवश्यकता
विदेश मंत्री के अनुसार, भारत अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहले की अपेक्षा कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ अपने विचार रख रहा है, जिसमें विकासशील देशों यानी ग्लोबल साउथ से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे भी प्रमुखता से शामिल हैं। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि कूटनीति के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मामलों पर देश के बौद्धिक विमर्श का दायरा भी तेजी से बढ़ना चाहिए। अब तक अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़ी ज्यादातर वैश्विक अवधारणाएं बाहरी देशों के अनुभवों और मॉडलों पर आधारित रही हैं। ऐसे में भारत को अपनी ऐतिहासिक समझ, जमीनी अनुभवों, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और अपनी शब्दावली के आधार पर विश्व को देखने और समझने का एक स्वतंत्र नजरिया विकसित करना होगा।














