पंजाब के संगरूर जिले से शुरू हुआ एक स्थानीय मामला अब पूरे राज्य की राजनीति का मुख्य केंद्र बन चुका है। 47 वर्षीय दलित मजदूर गुलजार सिंह की मौत ने पंजाब के सियासी गलियारों में एक ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। संगरूर के रहने वाले गुलजार सिंह वाल्मीकि समुदाय से ताल्लुक रखते थे और मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालते थे। उनके परिवार का कहना है कि गुलजार सिंह का बेटा नशे की गिरफ्त में आ गया था, जिससे वह बेहद परेशान थे। इसी गंभीर मुद्दे को लेकर उन्होंने एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा से तीखे सवाल पूछे थे। इसके बाद जो कुछ भी हुआ, उसने न केवल एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया, बल्कि पंजाब के प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मंत्री से सवाल पूछने के बाद शुरू हुआ प्रताड़ना का दौर
परिवार के अनुसार, गुलजार सिंह ने वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा के सामने पंजाब में पैर पसार चुके नशे के कारोबार और चिट्टे की आसान उपलब्धता को लेकर सवाल उठाए थे। उनका सवाल नशा तस्करों के खिलाफ सरकारी कार्रवाई की प्रभावशीलता को लेकर था। आरोप है कि एक आम नागरिक द्वारा सार्वजनिक मंच पर पूछे गए इस सवाल से स्थानीय स्तर के कुछ नेता और रसूखदार लोग नाराज हो गए। परिजनों का आरोप है कि इसके बाद गुलजार सिंह पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए मानसिक दबाव बनाया जाने लगा। आरोप यह भी है कि उनके साथ न केवल बदसलूकी की गई, बल्कि जातिसूचक गालियां देकर उन्हें प्रताड़ित और अपमानित भी किया गया। इस सामाजिक और मानसिक अपमान ने गुलजार सिंह को भीतर से तोड़ दिया, जिसके बाद उन्होंने एक आत्मघाती कदम उठाने का फैसला किया।
जहर खाने के बाद इलाज के लिए अस्पतालों के चक्कर
अपमान से आहत होकर गुलजार सिंह ने कथित तौर पर जहरीला पदार्थ खा लिया। जब उनकी तबीयत बिगड़ने लगी, तो घबराए परिजन उन्हें नजदीकी अस्पताल लेकर भागे। परिवार का दावा है कि उन्हें समय पर उचित इलाज नहीं मिल सका। उन्हें गंभीर हालत में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल रेफर किया जाता रहा। पर्याप्त चिकित्सा सहायता के अभाव और इलाज में हुई देरी के कारण आखिरकार गुलजार सिंह ने दम तोड़ दिया। उनकी मौत की खबर फैलते ही पूरे इलाके में तनाव फैल गया। मौत के बाद गुलजार सिंह का एक कथित वीडियो भी सामने आया, जिसमें उन्होंने मरने से पहले अपनी आपबीती सुनाई थी। इस वीडियो में उन्होंने कुछ विशिष्ट लोगों के नामों का उल्लेख किया था, जिन्हें वे अपनी इस स्थिति और प्रताड़ना के लिए जिम्मेदार मान रहे थे।
जबरन अंतिम संस्कार और धार्मिक रस्मों पर रोक का आरोप
गुलजार सिंह की मौत के बाद विवाद शांत होने के बजाय और अधिक गहरा गया। परिवार ने प्रशासन और पुलिस पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। परिजनों का कहना है कि गुलजार सिंह का अंतिम संस्कार उनकी इच्छा और सहमति के बिना ही करा दिया गया। आरोप है कि मौके पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था और पुलिस की मौजूदगी में जल्दबाजी में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की गई। इस घटनाक्रम से आहत परिवार ने अब कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। उनका कहना है कि जब तक उनकी प्रताड़ना के लिए जिम्मेदार सभी लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक वे अंतिम संस्कार के बाद होने वाली भोग जैसी अन्य महत्वपूर्ण धार्मिक रस्मों को पूरा नहीं करेंगे। परिवार का यह संकल्प अब न्याय की मांग का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया है।
पुलिस की कार्रवाई और विशेष जांच दल का गठन
मामले के राजनीतिक रूप लेने और जन आक्रोश बढ़ने के बाद पंजाब पुलिस भी हरकत में आई। गुलजार सिंह के परिवार द्वारा दी गई लिखित शिकायत के आधार पर पुलिस ने पांच नामजद आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। इस एफआईआर में बलजीत सिंह, सुखदेव सिंह, विक्की सिंह, गोना सिंह और बलजिंदर कौर को आरोपी बनाया गया है। इन सभी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पंजाब सरकार ने एक विशेष जांच दल (SIT) का भी गठन किया है। इस SIT की कमान अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADGP) स्तर के एक वरिष्ठ अधिकारी को सौंपी गई है। यह जांच टीम मौत से पहले की पूरी कड़ियों, कथित प्रताड़ना के वीडियो और अंतिम संस्कार के दौरान पुलिस की भूमिका की बारीकी से जांच करेगी।
संसद से लेकर सड़क तक छिड़ा सियासी घमासान
इस पूरे दुखद मामले ने पंजाब की राजनीति को पूरी तरह गरमा दिया है। विपक्षी दलों को आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार को घेरने का एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही दलों ने राज्य सरकार पर सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने और एक गरीब परिवार की आवाज को दबाने का आरोप लगाया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर सीधे मुख्यमंत्री भगवंत मान पर निशाना साधा। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि पंजाब की वर्तमान सरकार जनता के जायज सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वालों का दमन कर रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री से तुरंत वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा का इस्तीफा लेने और इस मामले की एक स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। राहुल गांधी का कहना है कि नशे के खिलाफ आवाज उठाने की इतनी बड़ी सजा किसी भी लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती।
मुख्यमंत्री भगवंत मान का पलटवार
विपक्ष के चौतरफा हमलों के बीच मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी कड़ा रुख अपनाया है और राहुल गांधी के आरोपों पर तीखा पलटवार किया है। मुख्यमंत्री मान ने विपक्षी नेताओं पर एक गरीब व्यक्ति की मौत पर राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विपक्ष इस संवेदनशील मामले का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। मुख्यमंत्री ने साफ किया कि कानून अपना काम कर रहा है और पीड़ित परिवार द्वारा पहचाने गए सभी आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। भगवंत मान ने पंजाब से नशे के खात्मे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि उनकी सरकार नशा तस्करों और उन्हें संरक्षण देने वालों के खिलाफ सख्त रुख अपनाए हुए है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। हालांकि, मुख्यमंत्री के इन दावों के बावजूद पंजाब में इस मुद्दे पर मचा बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है और यह मामला आने वाले दिनों में और अधिक तूल पकड़ सकता है।



















