अयोध्या के अंतर्राष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय में 7D तकनीक से जीवंत होगी प्रभु श्रीराम की गाथाडेयरी कारोबार में जाफराबादी भैंस की भारी मांग, मजबूत कद-काठी और ज्यादा फैट से बढ़ती है कमाईकर्ज चुकाने की दिशा में पीसी ज्वैलर का बड़ा कदम, 98% बैंक देनदारी निपटते ही शेयरों में उछालवैश्विक कूटनीति और युद्ध के तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में भारी अस्थिरताभारतीय यूज़र्स के लिए पेश हुआ एलेक्सा+, हिंदी और अंग्रेज़ी में करेगा बातचीतअमेरिकी अर्थव्यवस्था में स्थिरता के संकेतों के बीच डॉलर मजबूत, सोने और प्रमुख मुद्राओं पर बढ़ा दबावनागालैंड लोक सेवा आयोग के कामकाज का राज्यपाल ने लिया जायजा, भर्ती सुधारों और नए इंफ्रास्ट्रक्चर पर चर्चाअमेरिकी डॉलर की मजबूती के बीच वैश्विक बाजारों में हलचल, ट्रंप और शी जिनपिंग की अहम बैठक पर टिकी नजरेंपरिजनों के विरोध से परेशान दो युवतियों ने उठाया आत्मघाती कदम, कोटा के एमबीएस अस्पताल में उपचार जारीकमजोर पीएमआई आंकड़ों और मजबूत डॉलर के चलते ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में फिसलन, नौकरियों के आंकड़ों से पहले दबाव
तेलंगाना के खेतों में मौजूद 900 साल पुरानी ऐश्वर्य गणपति प्रतिमा, एक ही ग्रेनाइट शिला पर उकेरा गया 30 फीट का स्वरूपभारत
23 सित॰ 2026, 3:13 pm (20 मिनट पहले)· 0

तेलंगाना के खेतों में मौजूद 900 साल पुरानी ऐश्वर्य गणपति प्रतिमा, एक ही ग्रेनाइट शिला पर उकेरा गया 30 फीट का स्वरूप

तेलंगाना के आवांचा गांव में पश्चिमी चालुक्य काल की 30 फीट ऊंची एकल पाषाण गणेश प्रतिमा स्थापित है, जिसे ग्रामीण आज भी खुले खेत में टीन शेड लगाकर संरक्षित कर रहे हैं।

दक्षिण भारत के समृद्ध स्थापत्य इतिहास में विशाल मूर्तियां अमूमन बड़े मंदिरों के गर्भगृहों की शोभा बढ़ाती हैं, लेकिन तेलंगाना में एक ऐसी ऐतिहासिक और दुर्लभ प्रतिमा मौजूद है जो किसी भव्य देवालय के बजाय सीधे खुले खेतों के बीच नजर आती है। नागरकर्नूल जिले के तिम्माजीपेटा मंडल में पड़ने वाले आवांचा गांव में स्थित इस विग्रह को ऐश्वर्य गणपति के नाम से पुकारा जाता है। यह समूचे देश के भीतर एक ही पत्थर से तराशी गई सबसे विशाल गणेश प्रतिमाओं में गिनी जाती है, जहां आज भी इतिहास और आस्था का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

एकल ग्रेनाइट शिला और रिलीफ शिल्प का अद्भुत नमूना

इस ऐतिहासिक मूर्ति की सबसे प्रमुख विशेषता इसका शिल्प विधान है, जिसमें किसी भी प्रकार के जोड़ का प्रयोग नहीं किया गया है। शिल्पकारों ने जमीन से जुड़ी एक विशाल प्राकृतिक ग्रेनाइट शिला को तराशकर इसे यह रूप दिया था। भूमि की सतह से नापने पर इस पाषाण विग्रह की कुल ऊंचाई लगभग 30 फीट बैठती है, जबकि इसका फैलाव यानी चौड़ाई करीब 15 फीट दर्ज की गई है। स्थापत्य कला की दृष्टि से यह प्रतिमा रिलीफ शैली में गढ़ी गई है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि सामने की तरफ से भगवान गणेश का संपूर्ण और अलौकिक रूप पूरी स्पष्टता के साथ उभरता है, जबकि शिला का पृष्ठ भाग अपनी मूल और प्राकृतिक पथरीली अवस्था में ही सुरक्षित बना हुआ है।

ये भी पढ़ें

12वीं शताब्दी का चालुक्य कालीन इतिहास और अधूरा निर्माण

अभिलेखीय साक्ष्यों और इतिहासकारों के विश्लेषण के अनुसार, इस विग्रह की रचना 12वीं सदी के आरंभिक दौर में लगभग 1113 ईस्वी के आसपास की गई थी। उस दौर में इस क्षेत्र पर पश्चिमी चालुक्य राजवंश का शासन था। कल्याणी के प्रतापी चालुक्य शासक विक्रमादित्य-VI के पुत्र तैलप ने आवांचा इलाके को अपना प्रमुख प्रशासनिक ठिकाना बनाया था। तैलप के प्रशासनिक कालखंड में ही चालुक्य शिल्पियों ने इस महाकाय शिलाखंड पर गणपति के विग्रह को उकेरने की योजना पर काम शुरू किया था। ऐतिहासिक संदर्भों के मुताबिक उस समय अचानक उपजी राजनीतिक अस्थिरता अथवा सैन्य संघर्षों की वजह से नक्काशी का काम बीच में ही बाधित हो गया। इसी कारण सदियां बीत जाने के बाद भी यह प्रतिमा आंशिक तौर पर अधूरी ही प्रतीत होती है।

स्थानीय आस्था और हेरिटेज पर्यटन की अपार संभावनाएं

आसपास के ग्रामीण अंचलों में ऐश्वर्य गणपति के प्रति अटूट धार्मिक विश्वास जुड़ा हुआ है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इस पाषाण स्वरूप के दर्शन मात्र से परिवार में खुशहाली, शांति और धन-धान्य की वृद्धि होती है। सामान्य दिनों के अतिरिक्त संकष्टी चतुर्थी और वार्षिक गणेशोत्सव के पावन अवसरों पर यहां दूर-दराज से आने वाले भक्तों का भारी जमावड़ा लगता है। लगभग नौ शताब्दियों पुरानी यह अनमोल विरासत लंबे समय तक सरकारी संरक्षण के अभाव में उपेक्षित रही। मौसम के थपेड़ों, तेज धूप और मानसूनी बरसात से बचाने के उद्देश्य से गांव के लोगों ने आपसी तालमेल और निजी सहयोग से प्रतिमा के ऊपर एक साधारण टीन शेड स्थापित कर रखा है।

भौगोलिक दृष्टि से यह ऐतिहासिक धरोहर राज्य की राजधानी हैदराबाद से लगभग 80 से 85 किलोमीटर और निकटवर्ती जडचेर्ला कस्बे से सिर्फ 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। स्थानीय निवासियों के साथ-साथ पुरातत्व प्रेमियों का दृढ़ मत है कि यदि राज्य का पर्यटन विभाग और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इस अप्रतिम एकल पाषाण प्रतिमा की सुध ले, तो यह ग्रामीण क्षेत्र एक प्रमुख राष्ट्रीय धरोहर और आकर्षक हेरिटेज पर्यटन केंद्र के रूप में अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान बना सकता है।

सवाल-जवाब

ऐश्वर्य गणपति की यह ऐतिहासिक प्रतिमा कहां स्थित है?
यह प्रतिमा तेलंगाना के नागरकर्नूल जिले में तिम्माजीपेटा मंडल के अंतर्गत आवांचा गांव के खेतों में स्थित है।
इस पाषाण प्रतिमा की कुल ऊंचाई और चौड़ाई कितनी है?
जमीन से इस मूर्ति की ऊंचाई लगभग 30 फीट और इसकी चौड़ाई करीब 15 फीट है।
इस मूर्ति का निर्माण किस राजवंश के शासनकाल में हुआ था?
इसका निर्माण 12वीं शताब्दी की शुरुआत यानी लगभग 1113 ईस्वी में पश्चिमी चालुक्य राजवंश के काल में शुरू हुआ था।
यह विशाल गणेश प्रतिमा अधूरी क्यों दिखाई देती है?
इतिहासकारों के अनुसार तत्कालीन राजनीतिक उथल-पुथल या युद्ध छिड़ जाने के कारण शिल्पकार इसका निर्माण कार्य पूरा नहीं कर सके थे।
हैदराबाद से इस ऐतिहासिक स्थल की दूरी कितनी है?
यह स्थल हैदराबाद से लगभग 80 से 85 किलोमीटर और जडचेर्ला से महज 12 किलोमीटर दूर स्थित है।
धूप और बारिश से बचाने के लिए मूर्ति पर शेड किसने लगवाया?
स्थानीय ग्रामीणों ने आपसी सहयोग और तालमेल से इस अनमोल प्रतिमा के ऊपर टीन का शेड बनवाया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp