दक्षिण भारत के समृद्ध स्थापत्य इतिहास में विशाल मूर्तियां अमूमन बड़े मंदिरों के गर्भगृहों की शोभा बढ़ाती हैं, लेकिन तेलंगाना में एक ऐसी ऐतिहासिक और दुर्लभ प्रतिमा मौजूद है जो किसी भव्य देवालय के बजाय सीधे खुले खेतों के बीच नजर आती है। नागरकर्नूल जिले के तिम्माजीपेटा मंडल में पड़ने वाले आवांचा गांव में स्थित इस विग्रह को ऐश्वर्य गणपति के नाम से पुकारा जाता है। यह समूचे देश के भीतर एक ही पत्थर से तराशी गई सबसे विशाल गणेश प्रतिमाओं में गिनी जाती है, जहां आज भी इतिहास और आस्था का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
एकल ग्रेनाइट शिला और रिलीफ शिल्प का अद्भुत नमूना
इस ऐतिहासिक मूर्ति की सबसे प्रमुख विशेषता इसका शिल्प विधान है, जिसमें किसी भी प्रकार के जोड़ का प्रयोग नहीं किया गया है। शिल्पकारों ने जमीन से जुड़ी एक विशाल प्राकृतिक ग्रेनाइट शिला को तराशकर इसे यह रूप दिया था। भूमि की सतह से नापने पर इस पाषाण विग्रह की कुल ऊंचाई लगभग 30 फीट बैठती है, जबकि इसका फैलाव यानी चौड़ाई करीब 15 फीट दर्ज की गई है। स्थापत्य कला की दृष्टि से यह प्रतिमा रिलीफ शैली में गढ़ी गई है, जिसका सीधा अर्थ यह है कि सामने की तरफ से भगवान गणेश का संपूर्ण और अलौकिक रूप पूरी स्पष्टता के साथ उभरता है, जबकि शिला का पृष्ठ भाग अपनी मूल और प्राकृतिक पथरीली अवस्था में ही सुरक्षित बना हुआ है।
12वीं शताब्दी का चालुक्य कालीन इतिहास और अधूरा निर्माण
अभिलेखीय साक्ष्यों और इतिहासकारों के विश्लेषण के अनुसार, इस विग्रह की रचना 12वीं सदी के आरंभिक दौर में लगभग 1113 ईस्वी के आसपास की गई थी। उस दौर में इस क्षेत्र पर पश्चिमी चालुक्य राजवंश का शासन था। कल्याणी के प्रतापी चालुक्य शासक विक्रमादित्य-VI के पुत्र तैलप ने आवांचा इलाके को अपना प्रमुख प्रशासनिक ठिकाना बनाया था। तैलप के प्रशासनिक कालखंड में ही चालुक्य शिल्पियों ने इस महाकाय शिलाखंड पर गणपति के विग्रह को उकेरने की योजना पर काम शुरू किया था। ऐतिहासिक संदर्भों के मुताबिक उस समय अचानक उपजी राजनीतिक अस्थिरता अथवा सैन्य संघर्षों की वजह से नक्काशी का काम बीच में ही बाधित हो गया। इसी कारण सदियां बीत जाने के बाद भी यह प्रतिमा आंशिक तौर पर अधूरी ही प्रतीत होती है।
स्थानीय आस्था और हेरिटेज पर्यटन की अपार संभावनाएं
आसपास के ग्रामीण अंचलों में ऐश्वर्य गणपति के प्रति अटूट धार्मिक विश्वास जुड़ा हुआ है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इस पाषाण स्वरूप के दर्शन मात्र से परिवार में खुशहाली, शांति और धन-धान्य की वृद्धि होती है। सामान्य दिनों के अतिरिक्त संकष्टी चतुर्थी और वार्षिक गणेशोत्सव के पावन अवसरों पर यहां दूर-दराज से आने वाले भक्तों का भारी जमावड़ा लगता है। लगभग नौ शताब्दियों पुरानी यह अनमोल विरासत लंबे समय तक सरकारी संरक्षण के अभाव में उपेक्षित रही। मौसम के थपेड़ों, तेज धूप और मानसूनी बरसात से बचाने के उद्देश्य से गांव के लोगों ने आपसी तालमेल और निजी सहयोग से प्रतिमा के ऊपर एक साधारण टीन शेड स्थापित कर रखा है।
भौगोलिक दृष्टि से यह ऐतिहासिक धरोहर राज्य की राजधानी हैदराबाद से लगभग 80 से 85 किलोमीटर और निकटवर्ती जडचेर्ला कस्बे से सिर्फ 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। स्थानीय निवासियों के साथ-साथ पुरातत्व प्रेमियों का दृढ़ मत है कि यदि राज्य का पर्यटन विभाग और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इस अप्रतिम एकल पाषाण प्रतिमा की सुध ले, तो यह ग्रामीण क्षेत्र एक प्रमुख राष्ट्रीय धरोहर और आकर्षक हेरिटेज पर्यटन केंद्र के रूप में अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान बना सकता है।

















