आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच राष्ट्रीय राजनीति में आस्था और क्षेत्रीय पहचान को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी द्वारा भगवान राम और भगवान शिव को लेकर की गई एक विवादास्पद टिप्पणी के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। राजधानी दिल्ली में सोमवार, 29 सितंबर 2026 को दिए गए अपने बयान में तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने धार्मिक प्रतीकों को सामाजिक और भौगोलिक विभाजन से जोड़ते हुए भाजपा पर गंभीर आरोप लगाए थे। इसके जवाब में भाजपा ने इसे हिंदू समाज को विखंडित करने का प्रयास करार दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह खींचतान आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की चुनावी बिसात पर गहरा असर छोड़ सकती है।
धार्मिक प्रतीकों पर शुरू हुआ तीखा टकराव
राष्ट्रीय राजधानी में संवाददाताओं से चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने सत्ताधारी दल के राजनीतिक प्रभाव पर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने उत्तर और दक्षिण के बीच सांस्कृतिक भिन्नता का उल्लेख करते हुए एक विवादास्पद तुलना प्रस्तुत की। अपने संबोधन में उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने एक खास धार्मिक प्रतीक पर एकाधिकार स्थापित कर लिया है। उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा, 'शिव गरीबों के देवता हैं और राम अमीरों के देवता हैं।' इसके साथ ही उन्होंने सवाल उठाया कि भाजपा के मंचों पर अन्य पारंपरिक जयघोष क्यों सुनाई नहीं देते। उन्होंने दावा किया कि दक्षिण भारत की परंपराएं भगवान शिव से जुड़ी हैं, जबकि उत्तर में अन्य परंपराओं का अधिक प्रभाव देखा जाता है।
सत्तारूढ़ दल का पलटवार और तीखे आरोप
इस बयान के सार्वजनिक होते ही भाजपा की तरफ से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस नेतृत्व और तेलंगाना के मुख्यमंत्री की मंशा पर सवाल उठाए। सुधांशु त्रिवेदी ने कड़े शब्दों में कहा, 'कांग्रेस पार्टी हिंदू समाज को बांटने की कोशिश कर रही है।' उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दल राजनीतिक लाभ के लिए अब आस्था के केंद्रों और आराध्यों के बीच भी खाई खोदने की कोशिश कर रहा है। भाजपा प्रवक्ता ने यह भी दावा किया कि कांग्रेस की राजनीति केवल तुष्टिकरण पर आधारित है और पार्टी के शीर्ष नेता राहुल गांधी पर नास्तिक होने का आरोप मढ़ते हुए कहा कि विपक्षी दलों को भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं की वास्तविक समझ नहीं है।
बयान के पीछे छिपा रणनीतिक गुणा-गणित
सियासी जानकारों के मुताबिक, यह बयान महज किसी नेता की जुबान फिसलने का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सुविचारित वैचारिक रणनीति दिखाई देती है। पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण भारत के राज्य परिसीमन और केंद्रीय करों के वितरण जैसे आर्थिक और प्रशासनिक मसलों पर एकजुट होकर केंद्र की नीतियों का विरोध करते रहे हैं। ऐसे माहौल में क्षेत्रीय अस्मिता और शैव परंपरा को उभारना भाजपा के आक्रामक राष्ट्रवाद के मुकाबले एक नया मोर्चा खोलने की कोशिश मानी जा रही है। विपक्षी रणनीति यह संदेश देने की प्रतीत होती है कि मौजूदा व्यवस्था केवल एक विशिष्ट वर्ग के हितों का पोषण करती है, जबकि बहुजन और वंचित तबके अन्य सांस्कृतिक धाराओं से जुड़े हुए हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति पर संभावित असर
उत्तर प्रदेश का चुनावी इतिहास गवाह रहा है कि राज्य की सियासत में सामाजिक और धार्मिक मुद्दे बेहद संवेदनशील भूमिका निभाते हैं। अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के बाद से ही भाजपा ने इस मुद्दे को सांस्कृतिक गौरव के रूप में मतदाताओं के बीच मजबूती से रखा है। राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी आगामी चुनावी तैयारियों को लेकर दिल्ली में लगातार महत्वपूर्ण बैठकें कर रहे हैं। ऐसे संवेदनशील दौर में भगवान राम को संपन्न वर्ग का और भगवान शिव को निर्धन वर्ग का आराध्य बताए जाने से सियासी समीकरण बदल सकते हैं। भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को सनातन परंपरा का अपमान बताकर भुनाने की पूरी तैयारी में है, जिससे ग्रामीण इलाकों और पिछड़े वर्गों में ध्रुवीकरण तेज हो सकता है।
विपक्षी गठबंधन के सामने खड़ी हो सकती हैं मुश्किलें
इस नए विवाद से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ गठबंधन में मौजूद समाजवादी पार्टी जैसे सहयोगियों के लिए असहज स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उत्तर प्रदेश की पावन धरती पर भगवान राम और भगवान शिव दोनों के प्रति जनता की आस्था समान रूप से अटूट है। वाराणसी में काशी विश्वनाथ धाम का प्रतिनिधित्व स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करते हैं, इसलिए शिव परंपरा को भाजपा से अलग दिखाने की कोशिश राज्य में उलटी भी पड़ सकती है। यदि भाजपा इस विमर्श को हिंदू समाज को बांटने की दक्षिण भारतीय साजिश के रूप में स्थापित करने में सफल रहती है, तो स्थानीय विपक्षी दलों को रक्षात्मक रुख अपनाना पड़ सकता है। 2027 के चुनाव से पहले यह बहस साबित करती है कि आस्था, संस्कृति और वर्ग संघर्ष की राजनीति अभी और गर्माएगी।













