उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर हलचल तेज हो चुकी है और प्रमुख राजनीतिक खेमों के बीच जुबानी वार-पलटवार का दौर नए सिरे से शुरू हो गया है। कई वर्षों से एक-दूसरे के प्रति मौन सहमति या नरम रुख रखने के आरोपों का सामना कर रही भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अब सीधे टकराव की मुद्रा में दिखाई दे रही हैं। नई दिल्ली में विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन की अहम रणनीतिक मुलाकातों और विपक्षी गोलबंदी के बीच उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने एक बेहद तीखा हमला बोला है। उन्होंने समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस की तुलना विभिन्न विषैले सांपों से करते हुए चुनावी विमर्श को पूरी तरह गरमा दिया है।
उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने विपक्षी दलों के समीकरणों पर तंज कसते हुए कहा, “सपा सांपनाथ है, बसपा नागनाथ है और कांग्रेस कालिया नाग है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि ये तीनों ही राजनीतिक दल पूरी तरह भाजपा-विरोधी हैं। उनका कहना था कि ये पार्टियां चाहे एक मंच पर आकर संयुक्त रूप से चुनाव मैदान में उतरें अथवा अलग-अलग अपनी चुनावी राह चुनें, दोनों ही सूरतों में इनकी करारी हार तय है। उपमुख्यमंत्री ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश की जनता वर्ष 2027 के चुनाव में एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी को भारी और प्रचंड बहुमत सौंपने का मन बना चुकी है।
बयान के गहरे राजनीतिक मायने और चुनावी संदर्भ
साल 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद जब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन टूटा, तब से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम रहती थी कि बहुजन समाज पार्टी का रुख भारतीय जनता पार्टी के प्रति काफी नरम रहता है। इस कथित नरम रुख के चलते गैर-यादव और गैर-जाटव मतों में लगातार बिखराव देखने को मिलता था। हालांकि, 2027 के महासमर से पहले राज्य के सामाजिक और राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं।
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव का ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला और दूसरी तरफ कांग्रेस का दलित समुदाय के प्रति लगातार बढ़ता झुकाव अब बहुजन समाज पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा रहा है। बहुजन समाज पार्टी का आधार माना जाने वाला जाटव और गैर-जाटव दलित वर्ग का मतदाता अब इन नए राजनीतिक गठजोड़ों की ओर आकर्षित होता दिख रहा है, जिससे जमीनी समीकरणों में उथल-पुथल मची है।
सालों बाद टकराव की राह पर क्यों आए दोनों दल?
इस बदलते राजनीतिक परिदृश्य में बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती के सामने अपने राजनीतिक अस्तित्व और पार्टी के आधार को बचाए रखने की गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है। पहले जहां मायावती अपने बयानों में ज्यादातर समाजवादी पार्टी को ही निशाने पर रखती थीं, वहीं बीते एक-दो महीनों से वे खुलकर भारतीय जनता पार्टी की नीतियों और शासन पर सीधा हमला बोल रही हैं। खुद को एकमात्र मजबूत विपक्ष के रूप में पेश करने के लिए उन्हें दोनों प्रतिद्वंद्वियों पर एक साथ हमलावर होना पड़ रहा है।
दूसरी ओर, लोकसभा चुनाव के नतीजों से सबक लेते हुए भारतीय जनता पार्टी को भी यह स्पष्ट समझ आ चुका है कि यदि दलित मतदाता पूरी तरह से खिसककर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन के खाते में चला गया, तो पार्टी को भारी राजनीतिक नुकसान झेलना पड़ सकता है। इसी वजह से भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीति बदलते हुए बहुजन समाज पार्टी को भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ एक ही कतार में खड़ा कर दिया है, ताकि मतदाताओं के बीच यह संदेश दिया जा सके कि ये सभी विरोधी दल वस्तुतः एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
चुनावी नफा-नुकसान और वोटों का ध्रुवीकरण रोकने का दांव
बहुजन समाज पार्टी पर काफी समय से विपक्षी खेमों द्वारा सत्ताधारी दल की ‘बी-टीम’ होने का आरोप मढ़ा जाता रहा है। ऐसे में वर्ष 2027 के संग्राम में मायावती जहां खुद को मुख्य विपक्षी शक्ति साबित करने के लिए सत्तापक्ष पर तीखे वार कर रही हैं, वहीं भारतीय जनता पार्टी भी उनके हर वार का जवाब बेहद आक्रामक अंदाज में दे रही है।
उपमुख्यमंत्री का यह विवादित उपमा वाला बयान महज एक तात्कालिक जुबानी टिप्पणी नहीं है, बल्कि इसे रणनीतिकारों की एक सोची-समझी योजना का हिस्सा माना जा रहा है। इसका प्राथमिक उद्देश्य विपक्ष के पक्ष में होने वाले वोटों के एकतरफा ध्रुवीकरण को रोकना है। सभी विपक्षी दलों को एक जैसा बताकर भारतीय जनता पार्टी अपने समर्थकों और मतदाताओं को यह समझाने का प्रयास कर रही है कि जनता के पास एकमात्र वास्तविक और सकारात्मक विकल्प केवल भाजपा ही है, जबकि बाकी सभी दल एक ही श्रेणी में आते हैं।
2027 में सीधे मुकाबले बनाम त्रिकोणीय संघर्ष की जंग
इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ हो जाता है कि भारतीय जनता पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव को ‘भाजपा बनाम अन्य सभी’ की लड़ाई में तब्दील करने का ताना-बाना बुन रही है। चुनावी मैदान में समाजवादी पार्टी जहां मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर डटी हुई है, वहीं बहुजन समाज पार्टी की आक्रामकता मुकाबले को त्रिकोणीय रूप देने की पुरजोर कोशिश कर रही है। नेताओं की यह तीखी बयानबाजी दर्शाती है कि आगामी विधानसभा चुनाव किसी भी दल के लिए आसान नहीं होने वाला है और आने वाले दिनों में बयानों की यह तल्खी और अधिक बढ़ने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं।



















