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ट्रेन में तेज शोर और अनियंत्रित बर्ताव पर शिवश्री स्कंदप्रसाद ने जताई चिंता, पब्लिक स्पेस में सिविक सेंस पर उठाए सवालभारत
24 सित॰ 2026, 4:52 pm (15 मिनट पहले)· 0

ट्रेन में तेज शोर और अनियंत्रित बर्ताव पर शिवश्री स्कंदप्रसाद ने जताई चिंता, पब्लिक स्पेस में सिविक सेंस पर उठाए सवाल

बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या की पत्नी और संगीतकार शिवश्री स्कंदप्रसाद ने रेल यात्रा के दौरान यात्रियों के तेज शोर और सिविक सेंस की कमी पर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि पांच घंटे के सफर में बड़े समूह के हंगामे और टीटीई के ढुलमुल रवैये से अन्य यात्रियों को भारी असुविधा झेलनी पड़ी।

सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते वक्त दूसरों की निजता और शांति का ख्याल रखना एक बुनियादी नागरिक कर्तव्य माना जाता है। इसी विषय पर मशहूर संगीतकार और बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या की पत्नी शिवश्री स्कंदप्रसाद ने रेल यात्रा के दौरान सामने आए अपने एक बेहद असहज अनुभव को साझा किया है। करीब पांच घंटे लंबे इस सफर में उन्हें सहयात्रियों के अनियंत्रित शोर और गैरजिम्मेदाराना व्यवहार का सामना करना पड़ा। उन्होंने इस पूरे प्रकरण को रेखांकित करते हुए कहा कि एक समाज के तौर पर हम सभी बुनियादी नागरिक बोध यानी सिविक सेंस के मामले में पीछे छूट रहे हैं।

कोच में लगातार हंगामे से परेशान हुए अन्य मुसाफिर

शिवश्री स्कंदप्रसाद के अनुसार, वह जिस रेल कोच में यात्रा कर रही थीं, उसमें कुल 56 सीटें थीं। उस डिब्बे में करीब 40 मध्यम आयु वर्ग के लोग एक बड़े समूह में सफर कर रहे थे। किसी लंबी यात्रा की शुरुआत में दोस्तों या परिजनों के बड़े दल में उत्साह होना स्वाभाविक है, लेकिन समस्या तब गंभीर हो गई जब यह समूह लगातार पांच घंटे तक बेहद तेज आवाज में बातें और हंसी-मजाक करता रहा। उनकी आवाज इतनी ज्यादा थी कि पूरे डिब्बे का माहौल अशांत हो गया और बाकी यात्रियों का सफर करना दूभर हो गया।

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उन्होंने कहा कि एक कलाकार के रूप में अक्सर मन में कई तरह के रचनात्मक विचार चलते रहते हैं, जिसके लिए मानसिक शांति और सुकून की आवश्यकता होती है। मगर सार्वजनिक जगहों पर लोग दूसरों के निजी दायरे और अधिकारों का बिल्कुल ध्यान नहीं रखते। देश में यह एक अघोषित नियम सा बन गया है कि अगर किसी सार्वजनिक वाहन में कोई बड़ा समूह हंगामा कर रहा हो, तो उस समूह से बाहर के बाकी बचे 16 यात्रियों को मजबूरी में सिर्फ परेशानी झेलनी पड़ती है, क्योंकि कोई भी उन्हें टोकने या रोकने का साहस नहीं जुटा पाता।

सीट बदलने की कोशिश और टीटीई का हस्तक्षेप

लगातार हो रहे शोरगुल से तंग आकर उन्होंने टिकट चेकिंग स्टाफ यानी टीटीई से मदद मांगी। उन्होंने टीटीई से आग्रह किया कि यदि संभव हो तो उन्हें किसी दूसरे शांत कोच में सीट आवंटित कर दी जाए। टीटीई ने अन्य डिब्बों में जगह तलाशने का प्रयास किया, लेकिन पूरी ट्रेन खचाखच भरी होने के कारण कोई विकल्प उपलब्ध नहीं था। इस वजह से उन्हें उसी डिब्बे में किसी अन्य सीट पर बैठकर सफर पूरा करने के लिए विवश होना पड़ा।

कुछ समय बाद उस दल में से करीब 8 यात्रियों ने अचानक यूएनओ ताश का खेल खेलना शुरू कर दिया, जिससे शोर और अधिक बढ़ गया। इसके बाद जब दोबारा टीटीई का ध्यान इस समस्या की ओर आकर्षित कराया गया, तो रेलकर्मी ने उन यात्रियों से खेल रोकने को कहा। शुरुआत में यात्रियों ने उस निर्देश को मानकर खेल बंद कर दिया, मगर इसके तुरंत बाद जो हुआ उसने स्थिति को और निराशाजनक बना दिया।

गंभीरता बरतने के बजाय मजाक में उड़ाया गया नियम

कुछ ही पलों में टीटीई वहां दोबारा पहुंचे और उन यात्रियों से कन्नड़ भाषा में हल्के-फुल्के अंदाज में कहने लगे कि वे इतना शोर क्यों मचा रहे हैं। टीटीई के इस दोस्ताना रुख को देखकर वह समूह जोर-जोर से हंसने लगा और उसने टीटीई को भी अपने साथ खेल में शामिल होने का न्योता दे दिया। समस्या का समाधान कराने के बजाय रेल अधिकारी द्वारा मामले को इस तरह हंसी-मजाक में उड़ाए जाने से नियमों के पालन की उम्मीद पूरी तरह खत्म हो गई।

शिवश्री स्कंदप्रसाद ने कहा कि यह मसला किसी खेल में हारने या जीतने का बिल्कुल नहीं है, बल्कि सच्चाई यह है कि भारतीय होने के नाते हम सभी सार्वजनिक शिष्टाचार की कसौटी पर विफल रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि एक जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में हम सार्वजनिक स्थानों पर शालीन और मर्यादित आचरण करना कब शुरू करेंगे।

सवाल-जवाब

शिवश्री स्कंदप्रसाद ने ट्रेन सफर को लेकर क्या अनुभव साझा किया?
उन्होंने बताया कि पांच घंटे के रेल सफर के दौरान एक बड़े समूह के तेज शोर और हंगामे के कारण उन्हें और अन्य यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा।
कोच में कितने यात्री थे और शोर मचाने वाला समूह कितना बड़ा था?
कोच में कुल 56 सीटें थीं, जिनमें से करीब 40 यात्री मध्यम आयु वर्ग के एक ही बड़े समूह से जुड़े हुए थे।
क्या शिकायत के बाद शिवश्री को दूसरी सीट या कोच मिल सका?
पूरी ट्रेन खचाखच भरी होने के कारण टीटीई उन्हें किसी अन्य कोच में जगह नहीं दिला सका, जिससे उन्हें उसी डिब्बे में रहना पड़ा।
यात्रियों के समूह ने कौन सा खेल खेलना शुरू किया था?
लगातार तेज बातचीत के बीच उस समूह के करीब 8 लोगों ने यूएनओ ताश का खेल खेलना शुरू कर दिया था।
टीटीई की भूमिका पर क्या सवाल उठे?
टीटीई ने पहले खेल बंद कराया लेकिन कुछ ही देर बाद वह खुद उस समूह के साथ कन्नड़ में हंसी-मजाक करने लगा, जिससे नियमों का पालन नहीं हो सका।
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