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यूपीआई ट्रांजैक्शन फीस विवाद पर उमर अब्दुल्ला का रुख, केंद्र के फैसले का किया समर्थनजम्मू-कश्मीर
17 सित॰ 2026, 12:21 am (5 दिन पहले)· 0

यूपीआई ट्रांजैक्शन फीस विवाद पर उमर अब्दुल्ला का रुख, केंद्र के फैसले का किया समर्थन

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाने के केंद्र सरकार के कदम का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था को चलाने में भारी खर्च आता है, लेकिन आम नागरिकों को इसके बोझ से बचाना जरूरी है।

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने यूपीआई के जरिए होने वाले लेन-देन पर संभावित शुल्क को लेकर चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार के रुख का समर्थन किया है। मीडिया से चर्चा के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के वृहद डिजिटल भुगतान तंत्र का रखरखाव और संचालन करना खर्चीला होता है, जिसके लिए वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है।

शुल्क के दायरे और श्रेणियों की स्थिति

इस विषय पर विस्तार से बताते हुए उमर अब्दुल्ला ने साफ किया कि यह वित्तीय प्रभार हर नागरिक पर लागू नहीं होने जा रहा है। उन्होंने रेखांकित किया कि एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को यानी पीटूपी माध्यम से भेजी जाने वाली राशि पर किसी प्रकार का शुल्क नहीं वसूला जाएगा। इसके अतिरिक्त, सामान्य उपयोगकर्ताओं को भी तब तक कोई अतिरिक्त राशि नहीं चुकानी होगी जब तक उनका लेन-देन निर्धारित सीमा के भीतर रहता है।

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बुनियादी ढांचे की लागत और कंपनियों की भूमिका

मुख्यमंत्री ने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी लागत का जिक्र करते हुए कहा कि जब नागरिकों को कोई सुविधा पूरी तरह निशुल्क मिलती है, तो कई बार उसकी वास्तविक लागत का अनुमान लगाना कठिन होता है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि इस प्रणाली के माध्यम से बड़ी कंपनियां पर्याप्त लाभ अर्जित करती हैं, इसलिए यदि उन पर कुछ शुल्क लगाया जाता है तो इसमें कोई अनुचित बात नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि केंद्रीय प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश के आम उपभोक्ताओं की जेब पर इसका प्रतिकूल असर न पड़े।

नया नियम और एमडीआर का दायरा

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने आगामी 15 अक्टूबर 2026 से दो हजार रुपये से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट लेन-देन पर अधिकतम शून्य दशमलव चार फीसदी एमडीआर लागू करने का निर्णय लिया है। यह व्यवस्था सीधे तौर पर सामान्य उपभोक्ताओं पर नहीं डाली जाएगी और आम ग्राहकों के लिए व्यक्तिगत लेनदेन पहले की तरह पूरी तरह निःशुल्क बने रहेंगे।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और मंत्रालय का स्पष्टीकरण

इस नीतिगत निर्णय के सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में विपक्ष ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाई है और इस कदम पर सवाल खड़े किए हैं। इन तमाम प्रतिक्रियाओं के बीच वित्त मंत्रालय ने स्थिति को पूरी तरह साफ करते हुए बयान दिया है कि देश में डिजिटल भुगतान से जुड़े सभी नीतिगत फैसले पूरी तरह स्वतंत्र रूप से लिए जाते हैं। मंत्रालय ने जोर देकर कहा कि एमडीआर लागू करने का यह निर्णय किसी भी बाहरी या विदेशी दबाव के प्रभाव में नहीं लिया गया है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य इस विशाल डिजिटल भुगतान तंत्र को आर्थिक रूप से दीर्घकालिक और मजबूत बनाना है।

सवाल-जवाब

उमर अब्दुल्ला ने यूपीआई शुल्क विवाद पर क्या कहा है?
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार का समर्थन करते हुए कहा है कि डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को चलाना खर्चीला होता है।
क्या आम नागरिकों को एक-दूसरे को पैसे भेजने पर कोई शुल्क देना होगा?
नहीं, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को पैसे भेजने पर किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाएगा।
एमडीआर किस प्रकार के लेनदेन पर लागू होगा?
केंद्र सरकार ने 15 अक्टूबर 2026 से दो हजार रुपये से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर अधिकतम शून्य दशमलव चार फीसदी एमडीआर लागू करने का फैसला किया है।
क्या यह शुल्क सीधे आम उपभोक्ताओं से वसूला जाएगा?
नहीं, यह शुल्क सीधे आम उपभोक्ता से नहीं लिया जाएगा और सामान्य ग्राहकों के लिए व्यक्तिगत लेनदेन शुल्क मुक्त रहेंगे।
वित्त मंत्रालय ने इस फैसले को लेकर क्या स्पष्टीकरण दिया है?
वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यूपीआई नीतियां स्वतंत्र रूप से तय होती हैं और यह फैसला किसी विदेशी दबाव में नहीं लिया गया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Sophie Laurent@sophie-laurent·5 दिन पहले

डिजिटल भुगतान ढांचे को दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ बनाने के लिए वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता एक वैश्विक आर्थिक सच्चाई है। यूरोपीय संघ के नियमन और वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था के अनुभवों से स्पष्ट है कि आम उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करते हुए बड़े व्यावसायिक तंत्र पर सीमित प्रभार लगाना बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद करता है। इस नीति पर राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर समर्थन मिलना यह दर्शाता है कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी संचालन लागत को लेकर अब एक व्यावहारिक और नीतिगत सहमति बन रही है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 दिन पहले

उमर अब्दुल्ला का यह रुख राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से दिलचस्प है। एक तरफ जहां विपक्ष इसे आम जनता पर बोझ मान रहा है, वहीं मुख्यमंत्री का यह बयान कि बुनियादी ढांचे के रखरखाव और मर्चेंट कंपनियों की भूमिका के लिए वित्तीय संसाधनों की जरूरत है, डिजिटल इकॉनमी की व्यावहारिक जमीनी हकीकत को दर्शाता है। 2026 से लागू होने वाले एमडीआर और वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन साधना अब केंद्र सरकार के लिए मुख्य चुनौती होगी।

Ravikash Gupta@ravikash·5 दिन पहले

उमर अब्दुल्ला का समर्थन इस बात को रेखांकित करता है कि फिनटेक और डिजिटल एसेट्स के विशाल नेटवर्क को बिना टिकाऊ वित्तीय मॉडल के अनिश्चितकाल तक नहीं चलाया जा सकता। 2026 से लागू होने वाले 0.4 प्रतिशत एमडीआर के जरिए पेमेंट गेटवे और मर्चेंट कंपनियों पर यह वित्तीय दायित्व तय करना डिजिटल अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए एक व्यावहारिक कदम है। हालांकि, बाजार में यह भी देखना होगा कि इस शुल्क का अप्रत्यक्ष असर खुदरा विक्रेताओं की मूल्य निर्धारण नीति पर किस प्रकार पड़ता है, क्योंकि फिनटेक बुनियादी ढांचे की लागत का प्रबंधन अंततः आपूर्ति श्रृंखला के माध्यम से घूमकर बाजार में ही समायोजित होता है।

Rohan Verma@rohan-verma·5 दिन पहले

उमर अब्दुल्ला द्वारा डिजिटल बुनियादी ढांचे के रख-रखाव और मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर एमडीआर के समर्थन से यह स्पष्ट होता है कि देश के वित्तीय तंत्र को दीर्घकालिक रूप से मजबूत बनाने के लिए संसाधन जुटाना जरूरी है। हालांकि यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जब 2026 में दो हजार रुपये से अधिक के चुनिंदा व्यावसायिक लेन-देन पर यह शुल्क लागू होगा, तो बड़े व्यापारी और कंपनियां इसे किस प्रकार प्रबंधित करती हैं और क्या इसका कोई अप्रत्यक्ष असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है या नहीं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 दिन पहले

एक क्राइम और आर्थिक मामलों के विश्लेषक के रूप में, मेरा मानना है कि भले ही सरकार और वित्त मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया हो कि आम नागरिकों पर सीधा बोझ नहीं आएगा, लेकिन कानून-व्यवस्था और सुरक्षा एजेंसियों के लिहाज से ऐसे बड़े वित्तीय बदलावों पर कड़ी नजर रखनी होगी। जब 2026 में मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू होगा, तो यह देखना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा कि क्या कॉर्पोरेट घराने इस लागत को किसी छिपे हुए मूल्य या सेवा शुल्क के जरिए अंततः आम जनता तक ट्रांसफर करते हैं या नहीं। वित्तीय अपराधों और डिजिटल धोखाधड़ी के इस दौर में, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा और पारदर्शिता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी, जिस पर विनियामक निकायों को सतर्क रहना होगा।

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