दिवाली पर कांच के गिलास में तैरते दीयों से सजाएं आशियाना, रसोई की 3 चीजों से मिनटों में करें तैयारदीपावली पर बीकानेर में मतीरे के पूजन का अनोखा विधान, जानिए क्यों मिला इसे ऋतुफल का दर्जासर्दियों की छुट्टियों में तस्वीरों के लिए कैसे तैयार करें परफेक्ट लुक, समझें स्टाइलिंग गाइडस्टील बर्ड के इस किफायती हेलमेट ने रचा इतिहास, 10 लाख से अधिक चालकों ने खरीदाग्लोबल करेंसी और कमोडिटी मार्केट में उठापटक: जापानी येन सीमित दायरे में अटका, सोने और एडीए में गिरावटरिज़र्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया की नरमी भरी ब्याज दर वृद्धि से ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में फिसलन, अमेरिकी डॉलर के सामने संघर्षस्विस फ्रैंक की तेजी से यूरो पर बना भारी दबाव, वैश्विक मुद्रा बाजार और सोने में भी हलचल तेजन्यूयॉर्क में खसरे के प्रकोप से बच्चे ने गंवाई जान, तीन दशकों में पहली बार सामने आई ऐसी त्रासदीलोकसभा चुनाव 2029 की डिजिटल बिसात: 50 हजार बूथों पर 1 लाख कार्यकर्ताओं को उतारेगी बीजेपी, इंस्टाग्राम और स्थानीय बोलियों पर जोरदैनिक राशिफल 4 नवंबर: मेष से मीन तक सभी 12 राशियों का दिनभर का हाल
डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और असम सरकार से मांगा जवाब, ऑयल इंडिया ने दी है अर्जीअसम
3 नव॰ 2026, 4:04 pm (9 मिनट पहले)· 0

डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और असम सरकार से मांगा जवाब, ऑयल इंडिया ने दी है अर्जी

सुप्रीम कोर्ट ने असम के डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के नीचे तेल व गैस निकालने की मंजूरी खारिज किए जाने के खिलाफ ऑयल इंडिया की याचिका पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर के बाद करेगी।

असम के तिनसुकिया जिले में स्थित डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के नीचे हाइड्रोकार्बन निकालने की अनुमति न मिलने के मामले में देश की शीर्ष अदालत ने कड़ा संज्ञान लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संरक्षित वन क्षेत्र के नीचे एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग तकनीक के जरिए तेल और प्राकृतिक गैस निकालने के प्रस्ताव को खारिज किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र सरकार और असम सरकार से औपचारिक जवाब मांगा है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ऑयल इंडिया की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी की दलीलें सुनने के बाद यह कदम उठाया। कंपनी की ओर से अदालत में दलील दी गई कि देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से यह परियोजना बेहद अहम है, इसलिए इस पर तत्काल विचार किया जाना जरूरी है।

संरक्षित वन क्षेत्र से बाहर रहकर भूमिगत खनन की योजना

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ऑयल इंडिया का कहना है कि उसकी प्रस्तावित योजना पारंपरिक खनन प्रक्रिया से पूरी तरह अलग है और इसके तहत राष्ट्रीय उद्यान के अंदरूनी हिस्से में किसी भी तरह की सीधी ड्रिलिंग या सतही गतिविधि नहीं की जाएगी। कंपनी की तकनीकी योजना के अनुसार, ड्रिलिंग से जुड़े सभी बुनियादी ढांचे और मुख्य कुएं राष्ट्रीय उद्यान की तय सीमा के बाहर स्थापित किए जाएंगे। वहां से लगभग 3,500 से 4,000 मीटर की गहराई तक लंबवत खुदाई करने के बाद उन्नत तकनीक के जरिए क्षैतिज यानी हॉरिजॉन्टल दिशा में पाइपलाइन बिछाकर जंगल के नीचे मौजूद हाइड्रोकार्बन भंडारों तक पहुंचा जाएगा।

ये भी पढ़ें

वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने अदालत के समक्ष स्पष्ट किया कि डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान से सटे इस पूरे इलाके में देश के कुल हाइड्रोकार्बन भंडार का लगभग तीन प्रतिशत हिस्सा मौजूद होने का अनुमान है। उन्होंने पीठ को आश्वस्त किया कि एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग तकनीक के इस्तेमाल से सतह पर रहने वाले किसी भी वन्यजीव, जंतु या वहां की वनस्पति को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। अदालत ने इन दलीलों पर गौर करते हुए संकेत दिया कि वह पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय सहित अन्य संबंधित प्राधिकरणों की रिपोर्टों और अनुसंधान व विकास के तकनीकी निष्कर्षों की गहन जांच करने के बाद ही इस परियोजना पर कोई अंतिम फैसला लेगी। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर के बाद निर्धारित की है।

वन मंजूरी खारिज करने के फैसले पर कानूनी विवाद

ऑयल इंडिया की इस कानूनी चुनौती की मुख्य जड़ तिनसुकिया जिले में प्रस्तावित ड्रिलिंग अभियान के लिए 0.069 हेक्टेयर वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग यानी डायवर्जन की अनुमति न मिलना है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, जिसे कंपनी ने अदालत में चुनौती दी है। कंपनी ने वन सलाहकार समिति की सिफारिशों के साथ-साथ मंत्रालय द्वारा 2 अगस्त 2024 को लिए गए नकारात्मक फैसले और 4 जुलाई 2024 को हुई समिति की बैठक के कार्यवृत्त को रद्द करने की मांग की है। इसके अतिरिक्त, कंपनी ने वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 की धारा 2(1)(ii) के तहत इस वन भूमि के उपयोग के लिए आवश्यक वैधानिक स्वीकृति देने का अनुरोध किया है।

पूरे विवाद का केंद्र सुप्रीम कोर्ट का 26 अप्रैल 2023 का वह ऐतिहासिक फैसला है, जिसमें देश भर के सभी राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के भीतर तथा उनकी सीमाओं से एक किलोमीटर के दायरे में सभी प्रकार की खनन गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। ऑयल इंडिया का तर्क है कि यह न्यायिक प्रतिबंध एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग पर लागू नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस तकनीक में संरक्षित क्षेत्र की जमीन पर कोई गतिविधि नहीं होती बल्कि बाहर से ही भूमिगत भंडारों का दोहन किया जाता है। कंपनी का यह भी पक्ष है कि तेल और प्राकृतिक गैस की खोज व उत्पादन का विनियामक ढांचा पूरी तरह अलग है, इसलिए इसे पारंपरिक पत्थर या कोयला खनन के बराबर नहीं माना जा सकता।

पुरानी मंजूरियों और वैधानिक प्रक्रियाओं का संदर्भ

अपनी याचिका के समर्थन में ऑयल इंडिया ने शीर्ष अदालत के 2017 के पूर्व आदेशों का हवाला दिया है, जब आवश्यक पर्यावरण और वन्यजीव सुरक्षा उपायों की शर्त पर डिब्रू-सैखोवा के नीचे भूमिगत हाइड्रोकार्बन दोहन की अनुमति दी गई थी। इसके साथ ही राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति द्वारा पहले दी गई सिफारिश का भी उल्लेख किया गया है। कंपनी ने जनवरी 2020 में डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के लिए जारी पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र यानी इको-सेंसिटिव जोन की अधिसूचना की ओर भी ध्यान दिलाया, जिसमें सीमा के विभिन्न हिस्सों के आधार पर यह दायरा शून्य से 8.7 किलोमीटर तक निर्धारित किया गया है।

कंपनी के अनुसार, संरक्षित क्षेत्र के नीचे सात अलग-अलग स्थानों पर एक्सटेंशन ड्रिलिंग और हाइड्रोकार्बन परीक्षण के लिए मई 2020 में पर्यावरण मंजूरी मिल चुकी थी, हालांकि वन भूमि से जुड़ी गतिविधियों के लिए अलग से वन मंजूरी लेना अनिवार्य था। इससे पहले 2 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने ऑयल इंडिया को अपनी पुरानी अंतरिम अर्जी वापस लेकर एक नई याचिका दाखिल करने की अनुमति दी थी। उस दौरान कंपनी ने स्पष्ट किया था कि पाइपलाइन और ड्रिलिंग ढांचा पार्क से बाहर रहेगा और केवल भूमिगत ड्रिलिंग ही जंगल के नीचे जाएगी। अदालत ने नई वजह के आधार पर नई याचिका दायर करने की छूट दी थी। यह पूरा मामला ऐतिहासिक टीएन गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ मुकदमे का हिस्सा है, जो 1995 से देश में वन संरक्षण के मानकों को तय कर रहा है।

सवाल-जवाब

ऑयल इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट में क्या याचिका दायर की है?
ऑयल इंडिया ने असम के डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के नीचे एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग से हाइड्रोकार्बन निकालने के प्रस्ताव को पर्यावरण मंत्रालय द्वारा खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती दी है।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई कौन सी पीठ कर रही है?
इस मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की तीन सदस्यीय पीठ कर रही है।
कंपनी किस तकनीक से तेल और गैस निकालना चाहती है?
कंपनी एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग तकनीक का उपयोग कर राष्ट्रीय उद्यान के बाहर से 3,500 से 4,000 मीटर गहरी और फिर क्षैतिज खुदाई करके हाइड्रोकार्बन तक पहुंचेगी।
इस क्षेत्र में देश के कितने हाइड्रोकार्बन भंडार मौजूद होने का अनुमान है?
कंपनी के अनुसार डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान से सटे इस इलाके में भारत के कुल हाइड्रोकार्बन भंडार का लगभग तीन प्रतिशत हिस्सा मौजूद है।
पर्यावरण मंत्रालय ने कंपनी के प्रस्ताव को कब खारिज किया था?
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 2 अगस्त 2024 को वन भूमि डायवर्जन के प्रस्ताव को खारिज करने का निर्णय लिया था।
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई कब होगी?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर के बाद निर्धारित की है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp