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उत्तराखंड के गंगोत्री ग्लेशियर पर नई झीलों की खबर से सतर्कता, वैज्ञानिकों ने GLOF खतरे पर दी बड़ी जानकारीउत्तराखंड
3 सित॰ 2026, 8:19 am (19 दिन पहले)· 2

उत्तराखंड के गंगोत्री ग्लेशियर पर नई झीलों की खबर से सतर्कता, वैज्ञानिकों ने GLOF खतरे पर दी बड़ी जानकारी

गंगोत्री ग्लेशियर में छोटी झीलें दिखने के बाद उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने वाडिया इंस्टीट्यूट से रिपोर्ट मांगी है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये अस्थायी झीलें हैं और इनसे फिलहाल GLOF या बाढ़ का कोई तत्काल खतरा नहीं है।

नेपाल में ग्लेशियर फटने के कारण आई भीषण तबाही के बाद अब उत्तराखंड के संवेदनशील हिमालयी इलाकों को लेकर प्रशासनिक और वैज्ञानिक सतर्कता बढ़ा दी गई है। गंगोत्री ग्लेशियर के ऊपरी हिस्से में पानी के छोटे-छोटे निकाय यानी ग्लेशियल झीलें दिखाई देने की खबरों ने स्थानीय निवासियों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी थी। इन रिपोर्टों का संज्ञान लेते हुए उत्तराखंड स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी से गंगोत्री ग्लेशियर क्षेत्र का वैज्ञानिक आकलन करने और मौजूदा स्थितियों पर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का अनुरोध किया है। राज्य सरकार का यह कदम इसलिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उच्च हिमालयी ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी झीलों में होने वाले सूक्ष्म बदलावों पर लगातार नजर रखना जनसुरक्षा और आपदा प्रबंधन के लिहाज से बेहद जरूरी है।

गंगोत्री की झीलों पर वाडिया इंस्टीट्यूट का वैज्ञानिक आकलन

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों और भूगर्भशास्त्रियों ने गंगोत्री ग्लेशियर क्षेत्र की प्रारंभिक जांच के बाद स्थिति स्पष्ट की है। वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लेशियर की सतह पर दिखाई दे रही ज्यादातर झीलें अस्थायी यानी सुपरग्लेशियल झीलें हैं। इनका निर्माण मुख्य रूप से तापमान बढ़ने के कारण बर्फ और ग्लेशियर के पिघलने से बने छोटे-छोटे गड्ढों में पानी जमा होने से होता है। शोध में पाया गया कि इन सतह पर बने गड्ढों में पानी की कुल मात्रा बेहद कम है। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि ग्लेशियर की सतह पर पानी का कोई छोटा हिस्सा दिखाई देने मात्र से ही किसी बड़ी आपदा का संकेत नहीं माना जा सकता। विशाल ग्लेशियल झीलों के विपरीत इन छोटी झीलों में अत्यधिक पानी जमा करने की क्षमता नहीं है, इसलिए इनसे फिलहाल बड़े पैमाने पर बाढ़ या ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का कोई तत्काल खतरा नहीं है।

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हिमालयी ग्लेशियरों और झीलों का परिवर्तनशील स्वरूप

भूवैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय में ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों का स्वरूप कभी भी एक समान या स्थिर नहीं रहता। स्थानीय मौसम, वायुमंडलीय तापमान, बर्फ पिघलने की गति और वर्षा के स्तर में होने वाले बदलाव इन झीलों के आकार तथा इनमें मौजूद जलस्तर को सीधे प्रभावित करते हैं। ग्लेशियर की सतह में दरारें पड़ने, पानी के नीचे की ओर बह जाने या फिर तापमान गिरने पर पानी के दोबारा जमने की प्रक्रिया से ये झीलें कुछ समय बाद स्वतः ही समाप्त भी हो जाती हैं। हालांकि वर्तमान में ये झीलें आकार में छोटी और अस्थायी दिखाई दे रही हैं, फिर भी वैज्ञानिक इनका नियमित रिकॉर्ड रखना आवश्यक मानते हैं। ग्लेशियर के आंतरिक जल विज्ञान में होने वाले सूक्ष्म बदलावों को समय रहते दर्ज करना भविष्य की सुरक्षा योजनाओं के लिए अनिवार्य है।

सैटेलाइट और फील्ड स्तर पर जारी है लगातार निगरानी

वैज्ञानिक आकलन में भले ही किसी बड़े और तुरंत खतरे की आशंका को खारिज कर दिया गया हो, लेकिन उत्तराखंड सरकार और आपदा प्रबंधन तंत्र ने निगरानी ढीली नहीं की है। देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और उत्तराखंड स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (USDMA) मिलकर गंगोत्री ग्लेशियर की सैटेलाइट तस्वीरों और धरातलीय स्तर यानी फील्ड निरीक्षण के जरिए निरंतर निगरानी कर रहे हैं। इस संयुक्त ट्रैकिंग का मुख्य उद्देश्य यह देखना है कि आने वाले समय में इन झीलों के आकार में क्या बदलाव आता है, इनमें जल संचयन कितना बढ़ता है और ग्लेशियर के आसपास की प्राकृतिक संरचना किस प्रकार बदलती है। उच्च तकनीक और वैज्ञानिक विश्लेषण के माध्यम से स्थिति पर बारीक नजर रखी जा रही है ताकि यदि मौसम या ग्लेशियर की संरचना में कोई प्रतिकूल परिवर्तन आए, तो समय रहते आवश्यक एहतियाती कदम उठाए जा सकें।

सवाल-जवाब

गंगोत्री ग्लेशियर में किस तरह की झीलें दिखाई दी हैं?
गंगोत्री ग्लेशियर की सतह पर मुख्य रूप से छोटी और अस्थायी सुपरग्लेशियल झीलें दिखाई दी हैं, जो बर्फ पिघलने से बने गड्ढों में पानी एकत्र होने से बनती हैं।
क्या गंगोत्री की इन झीलों से तत्काल बाढ़ या GLOF का खतरा है?
वैज्ञानिकों के अनुसार इन झीलों में पानी की मात्रा बहुत कम है, इसलिए इनसे फिलहाल बड़े पैमाने पर बाढ़ या GLOF का कोई तुरंत खतरा नहीं है।
उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने क्या कदम उठाया है?
प्राधिकरण ने देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी से गंगोत्री ग्लेशियर की वर्तमान स्थिति पर वैज्ञानिक रिपोर्ट और अपडेट मांगा है।
क्या ये झीलें हमेशा बनी रहेंगी या गायब हो सकती हैं?
मौसम, तापमान और ग्लेशियर की सतह में बदलाव के साथ ये छोटी झीलें स्वतः ही सूख सकती हैं, जम सकती हैं या गायब हो सकती हैं।
गंगोत्री ग्लेशियर की निगरानी किस प्रकार की जा रही है?
वाडिया इंस्टीट्यूट और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण मिलकर सैटेलाइट तस्वीरों और फील्ड निरीक्षण के माध्यम से ग्लेशियर की लगातार निगरानी कर रहे हैं।
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